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वुहान लैब को लाखों डॉलर की फंडिंग और कोरोना का सच छिपाने का आरोप! अमेरिकी इंटेलिजेंस चीफ के इस्तीफे से पहले डॉ. फॉसी पर फूटा बम

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Tulsi Gabbard Corona Wuhan Lab: अमेरिका की राजनीति और वैज्ञानिक जगत में एक बार फिर कोरोना महामारी को लेकर भूचाल आ गया है।

इस बार यह तूफान अमेरिका की पूर्व ‘डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस’ (DNI) तुलसी गबार्ड के दावों से उठा है।

अपने पद पर रहते हुए आखिरी दिनों में गबार्ड ने कुछ बेहद संवेदनशील और गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक किए हैं।

इन दस्तावेजों के आधार पर उन्होंने अमेरिका के सबसे मशहूर और पूर्व मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. एंथनी फॉसी पर बेहद संगीन आरोप लगाए हैं।

डॉ. फॉसी पर कसम खाकर झूठ बोलने का आरोप: गबार्ड ने खोल दिए खुफिया दस्तावेज

तुलसी गबार्ड का सीधा कहना है कि डॉ. फॉसी ने अमेरिकी संसद (कांग्रेस) के सामने कसम खाने के बावजूद झूठ बोला था।

गबार्ड के मुताबिक, डॉ. फॉसी ने चीन की बदनाम हो चुकी ‘वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी’ (वुहान लैब) को अमेरिकी सरकार के खजाने से लाखों डॉलर की फंडिंग दिलवाई थी।

आरोप है कि जब साल 2020 में कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया में तबाही मचाई, तब डॉ. फॉसी ने सुनियोजित तरीके से इस बात को दबा दिया कि यह खतरनाक वायरस असल में उसी चीनी लैब से लीक हुआ था, जिसे वे खुद फंड कर रहे थे।

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क्या है ‘गेन-ऑफ-फंक्शन’ रिसर्च, जिससे चमगादड़ का वायरस बना काल?

इस पूरे विवाद की जड़ में एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसे ‘गेन-ऑफ-फंक्शन’ (Gain-of-Function) रिसर्च कहा जाता है।

आम बोलचाल की भाषा में समझें तो यह एक ऐसी वैज्ञानिक रिसर्च है जिसमें किसी साधारण वायरस को प्रयोगशाला के भीतर जानबूझकर ज्यादा ताकतवर, तेजी से फैलने वाला और जानलेवा बनाया जाता है।

वैज्ञानिक इसके पीछे यह दलील देते हैं कि ऐसा करने से वे यह समझ पाते हैं कि भविष्य में कोई वायरस इंसानों पर कितना बड़ा हमला कर सकता है और उसकी वैक्सीन पहले से कैसे तैयार की जाए।

लेकिन, इस रिसर्च के साथ एक बहुत बड़ा खतरा जुड़ा होता है—लैब से वायरस के दुर्घटनावश लीक होने का डर।

तुलसी गबार्ड का दावा है कि वुहान की लैब में चमगादड़ों के भीतर पाए जाने वाले कोरोना वायरस पर ठीक यही खतरनाक रिसर्च चल रही थी।

इसी रिसर्च के दौरान वायरस नियंत्रण से बाहर हो गया और पूरी दुनिया में महामारी के रूप में फैल गया।

जब साल 2021 में अमेरिकी संसद में इस मुद्दे पर सुनवाई हुई थी, तो डॉ. फॉसी ने साफ इनकार किया था कि उनकी एजेंसी ने वुहान लैब में वायरस को खतरनाक बनाने के लिए कोई पैसा दिया था।

मगर बाद में सामने आए दस्तावेजों और जांच रिपोर्टों ने उनके इस दावे की पोल खोल दी।

बताया जाता है कि अमेरिकी सरकार का पैसा सीधे चीन नहीं गया, बल्कि ‘ईकोहेल्थ एलायंस’ नाम की एक गैर-लाभकारी संस्था (NGO) के जरिए वुहान लैब तक पहुँचाया गया था।

सच दबाने के लिए धमकियां और फर्जी वैज्ञानिक पेपर का सहारा

गबार्ड के कार्यालय द्वारा जारी की गई जानकारियों के अनुसार, जब कोरोना वायरस पूरी दुनिया में फैला, तो डॉ. फॉसी ने अपनी गर्दन बचाने के लिए एक बड़ा खेल खेला।

उन्होंने कथित तौर पर एक ‘फर्जी वैज्ञानिक पेपर’ तैयार करवाया। इसके बाद अपने करीबी और पसंदीदा वैज्ञानिकों को अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के पास भेजा।

इन वैज्ञानिकों ने एक आधिकारिक रिपोर्ट तैयार की, जिसमें दावा किया गया कि कोरोना वायरस किसी लैब से नहीं निकला, बल्कि यह प्राकृतिक रूप से किसी जानवर के जरिए इंसानों में फैला है।

ऐसा सिर्फ इसलिए किया गया ताकि डॉ. फॉसी का यह सीक्रेट और खतरनाक रिसर्च प्रोजेक्ट दुनिया के सामने न आ सके।

इतना ही नहीं, इस मामले में व्हिसलब्लोअर्स (भेद खोलने वाले अधिकारियों) ने भी गवाही दी है।

गवाही के मुताबिक, जिन खुफिया विश्लेषकों और अधिकारियों ने डॉ. फॉसी की इस ‘प्राकृतिक उत्पत्ति’ वाली थ्योरी पर सवाल उठाने की कोशिश की, उन्हें बुरी तरह प्रताड़ित किया गया।

उन्हें करियर बर्बाद करने की धमकियां दी गईं और नौकरी में किनारे लगा दिया गया ताकि कोई भी सच बोलने की हिम्मत न कर सके।

पद छोड़ने से पहले गबार्ड ने किया बड़ा धमाका

आपको बता दें कि डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन में शीर्ष हिंदू अधिकारी रहीं तुलसी गबार्ड ने हाल ही में (22 मई को) अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।

वे अमेरिका की ‘डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस’ की हेड थीं और उनके अधीन अमेरिका की सभी 18 खुफिया एजेंसियां काम करती थीं।

फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, उनके पति एक बेहद गंभीर और दुर्लभ हड्डी के कैंसर से जूझ रहे हैं, जिसकी वजह से गबार्ड ने इस मुश्किल वक्त में परिवार के साथ रहने के लिए इस्तीफा दिया।

उन्होंने ओवल ऑफिस में राष्ट्रपति ट्रम्प से मुलाकात कर अपना इस्तीफा सौंपा था और देश की सेवा का मौका देने के लिए उनका आभार भी जताया था।

नाम से ‘भारतवंशी’ लगती हैं, पर हैं नहीं

तुलसी गबार्ड के नाम की वजह से अक्सर भारत और दुनिया भर में लोग उन्हें भारतीय मूल का मान लेते हैं।

लेकिन असलियत यह है कि वे भारतवंशी नहीं हैं और वे खुद भी कई बार इस बात को साफ कर चुकी हैं।

तुलसी का जन्म एक समोअन अमेरिकी परिवार में हुआ था।

उनकी मां पहले ईसाई थीं, जिन्होंने बाद में हिंदू धर्म अपना लिया। अपनी मां से प्रभावित होकर तुलसी ने भी हिंदू धर्म को अपनाया।

फिलहाल, डॉ. फॉसी इन सभी आरोपों को हमेशा की तरह खारिज कर रहे हैं।

उनका कहना है कि कोरोना की उत्पत्ति को लेकर अभी तक कोई भी वैज्ञानिक अंतिम नतीजे पर नहीं पहुँचा है।

लेकिन गबार्ड के इन नए दावों ने अमेरिकी प्रशासन और वैश्विक स्वास्थ्य संगठनों के सामने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

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