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ईरान से जंग के बीच रूस से ‘यारी’? आखिर अमेरिका ने क्यों बदली ऑयल पॉलिसी, जानें असली वजह

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

US Russian Oil Relief: कच्चे तेल की कीमतें देखते ही देखते 100 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गई हैं।

आलम यह है कि ईरान ने चेतावनी दे दी है कि अगर हालात नहीं सुधरे तो यह आंकड़ा 200 डॉलर भी छू सकता है।

ऐसे में दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, अमेरिका को अपने सख्त रुख में नरमी लानी पड़ी है।

ट्रंप प्रशासन ने एक बड़ा फैसला लेते हुए रूसी तेल की खरीद पर लगी पाबंदी में 30 दिनों की अस्थायी छूट दे दी है।

क्या है अमेरिकी ट्रेजरी का नया आदेश?

अमेरिकी वित्त मंत्रालय (Treasury Department) ने गुरुवार को एक विशेष लाइसेंस जारी किया।

इसके तहत उन रूसी तेल टैंकरों को अपना माल बेचने और डिलीवरी करने की इजाजत दी गई है, जो 12 मार्च की आधी रात से पहले ही समुद्र में निकल चुके थे।

आसान भाषा में कहें तो, जो तेल रास्ते में फंसा हुआ था, उसे अब बाजार में आने दिया जाएगा।

यह छूट 11 अप्रैल तक लागू रहेगी।

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अमेरिका ने क्यों बदला मन? 

  1. होर्मुज (Strait of Hormuz) का संकट: ईरान और इजराइल के बीच जारी तनाव की वजह से दुनिया का सबसे व्यस्त तेल मार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ लगभग ठप है। दुनिया का 20% कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है। अगर यहां से सप्लाई रुकी रही, तो दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की किल्लत हो जाएगी। रूस का तेल इस कमी को पूरा करने का एक जरिया बना है।

  2. कीमतों को $200 होने से रोकना: मिडिल ईस्ट में तेल के कुओं और इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतें अचानक 9% बढ़ गईं। अमेरिका को डर है कि अगर कच्चा तेल $150-$200 के पार गया, तो पूरी दुनिया में मंदी आ जाएगी। रूसी तेल को बाजार में उतारकर सप्लाई बढ़ाई जा रही है ताकि कीमतें नीचे आ सकें।

  3. फंसे हुए सप्लाई चेन को खोलना: रूस के कई तेल टैंकर फिलहाल समुद्र के बीचों-बीच खड़े हैं। अमेरिकी पाबंदियों के डर से कोई उन्हें खरीद नहीं रहा था। ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट का कहना है कि यह एक शॉर्ट-टर्म फैसला है ताकि बाजार में स्थिरता आए। उनका दावा है कि इससे रूस को ज्यादा फायदा नहीं होगा क्योंकि यह तेल पहले ही निकाला जा चुका है।

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भारत का स्टैंड क्या है?

भारत शुरू से ही कहता रहा है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए किसी भी देश से तेल खरीदने को स्वतंत्र है।

भारतीय अधिकारियों ने साफ कर दिया है कि उन्हें रूसी तेल खरीदने के लिए किसी की ‘परमिशन’ की जरूरत नहीं है।

हालांकि, अमेरिका की इस आधिकारिक छूट से भारतीय रिफाइनरियों के लिए पेमेंट और इंश्योरेंस की बाधाएं कम हो जाएंगी, जिससे भारत को सस्ता तेल मिलना आसान होगा।

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