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IOC ने 2028 ओलंपिक के लिए ट्रांसजेंडर महिलाओं पर लगाया बैन, अब बायोलॉजिकल फीमेल ही ले पाएंगी हिस्सा

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Transgender ban Olympics 2028: इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी (IOC) ने एक ऐतिहासिक और बड़ा फैसला लिया है।

2028 में अमेरिका के लॉस एंजिल्स में होने वाले ओलंपिक खेलों के लिए नियमों को पूरी तरह बदल दिया गया है।

अब ट्रांसजेंडर महिलाएं (वे जो जन्म के समय पुरुष थे लेकिन बाद में महिला बने) महिला कैटेगरी के मुकाबलों में हिस्सा नहीं ले सकेंगी।

IOC का स्पष्ट कहना है कि अब महिला वर्ग में केवल वही एथलीट खेल पाएंगे जो जन्म से ही महिला हैं, जिन्हें ‘बायोलॉजिकल फीमेल’ कहा जाता है।

क्या है नया नियम और क्यों पड़ी जरूरत?

अभी तक ट्रांसजेंडर एथलीट्स के लिए नियम थोड़े लचीले थे।

IOC टेस्टोस्टेरोन हार्मोन के लेवल को आधार बनाता था या फिर फैसला अलग-अलग खेल संघों (जैसे वर्ल्ड एथलेटिक्स या फीफा) पर छोड़ देता था।

लेकिन पेरिस ओलंपिक 2024 में हुए विवादों के बाद खेल जगत में निष्पक्षता (Fairness) को लेकर बड़े सवाल उठे।

इमान खलीफ और लिन यू-टिंग जैसे मुक्केबाजों की भागीदारी ने दुनिया भर में बहस छेड़ दी थी।

इसी को देखते हुए IOC अब एक ‘यूनिफॉर्म पॉलिसी’ यानी एक समान नियम लेकर आया है।

SRY जीन टेस्ट: अब DNA से होगी पहचान

नए नियमों के तहत, महिला वर्ग में हिस्सा लेने के लिए अब ‘SRY जीन स्क्रीनिंग’ अनिवार्य होगी।

  • SRY जीन क्या है? यह Y क्रोमोसोम पर पाया जाने वाला एक जीन है जो पुरुष लक्षणों को निर्धारित करता है।

  • कैसे होगा टेस्ट? यह टेस्ट बहुत आसान है। इसमें एथलीट के खून, थूक या गाल के अंदरूनी हिस्से (स्वैब) का सैंपल लिया जाएगा।

  • नतीजे का असर: अगर टेस्ट में Y क्रोमोसोम (पुरुष जीन) पाया जाता है, तो वह खिलाड़ी महिला वर्ग के ओलंपिक गोल्ड के लिए रेस नहीं लगा पाएगा। उसे केवल गैर-रैंकिंग या विशेष कैटेगरी में खेलने की अनुमति मिल सकती है।

शारीरिक बढ़त (Physical Advantage) का तर्क

IOC की प्रेसिडेंट कर्स्टी कोवेंट्री ने साफ किया है कि ओलंपिक में जीत और हार के बीच सेकंड के सौवें हिस्से का फर्क होता है।

वैज्ञानिक रिसर्च का हवाला देते हुए कमेटी ने कहा कि जो लोग जन्म से पुरुष होते हैं, उनके पास ‘बायोलॉजिकल एडवांटेज’ होता है।

उनकी हड्डियों की बनावट, मांसपेशियों की ताकत (Strength) और फेफड़ों की क्षमता (Endurance) जन्म से ही महिलाओं के मुकाबले ज्यादा होती है।

हार्मोन थेरेपी से टेस्टोस्टेरोन कम तो किया जा सकता है, लेकिन यह प्राकृतिक शारीरिक बढ़त पूरी तरह खत्म नहीं होती।

ऐसे में बायोलॉजिकल महिलाओं के साथ मुकाबला करना ‘अनफेयर’ हो जाता है।

ट्रांसजेंडर पुरुषों (Trans Men) के लिए क्या है नियम?

दिलचस्प बात यह है कि नियम का दूसरा पक्ष अलग है।

वे खिलाड़ी जो जन्म के समय महिला थे लेकिन अब खुद को पुरुष मानते हैं (ट्रांस पुरुष), वे महिला कैटेगरी में खेलना जारी रख सकते हैं।

इसका कारण यह है कि उनके पास जन्मजात कोई पुरुष शारीरिक बढ़त नहीं होती, जिससे प्रतियोगिता की निष्पक्षता प्रभावित नहीं होती।

ट्रम्प का ‘एग्जीक्यूटिव ऑर्डर’ और राजनीतिक दबाव

इस फैसले के पीछे केवल खेल ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति की भी झलक दिखती है।

पिछले साल फरवरी में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक आदेश जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि लॉस एंजिल्स ओलंपिक के दौरान उन ट्रांसजेंडर महिलाओं को वीजा नहीं दिया जाएगा जो महिला खेलों में हिस्सा लेना चाहती हैं।

IOC के इस कदम को उसी दिशा में बढ़ता हुआ कदम माना जा रहा है।

DSD एथलीटों पर भी गिरेगी गाज

यह नियम सिर्फ ट्रांसजेंडर एथलीटों के लिए नहीं है।

यह ‘डिफरेंस ऑफ सेक्स डेवलपमेंट’ (DSD) वाले खिलाड़ियों को भी प्रभावित करेगा।

दक्षिण अफ्रीका की मशहूर रनर कास्टर सेमेन्या, जिन्होंने दो बार ओलंपिक गोल्ड जीता है, इस नियम के दायरे में आ सकती हैं।

सेमेन्या जैसे खिलाड़ियों के शरीर में प्राकृतिक रूप से टेस्टोस्टेरोन ज्यादा होता है।

उन्होंने इस फैसले की कड़ी निंदा करते हुए इसे ‘भेदभावपूर्ण’ बताया है।

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क्या यह नियम हर जगह लागू होगा?

IOC ने साफ किया है कि यह पाबंदी केवल ‘प्रोफेशनल’ और ‘वर्ल्ड रैंकिंग’ वाले टूर्नामेंट्स पर लागू होगी।

जमीनी स्तर (Grassroot) पर होने वाले खेलों या लोकल कॉम्पिटिशन पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।

वहां Inclusivity को प्राथमिकता दी जाती रहेगी। IOC ने फिलहाल ‘फेयर प्ले’ का रास्ता चुना है।

लॉस एंजिल्स 2028 के ये नए नियम ओलंपिक के इतिहास में एक बड़ा मोड़ साबित होंगे।

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