SC ST Act Compensation New Rule: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (जबलपुर हाईकोर्ट) ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (SC-ST) अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत दिए जाने वाले सरकारी मुआवजे को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है।
कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अब सरकारी सहायता राशि (मुआवजा) की अगली किश्त जारी होने से पहले पीड़ित पक्ष को एक कानूनी शपथपत्र (Affidavit) देना होगा।
इस शपथपत्र में यह वचन देना होगा कि वे मुकदमे के दौरान अपनी गवाही से पीछे नहीं हटेंगे।

क्या है पूरा मामला और क्यों आया यह फैसला?
दरअसल, यह पूरा मामला तब सामने आया जब एक युवती ने जबलपुर हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी।
याचिका में मांग की गई थी कि उसके मामले में पुलिस द्वारा चार्जशीट (आरोप पत्र) दाखिल कर दी गई है, इसलिए नियम के मुताबिक उसे मुआवजे की अगली किश्त जारी की जाए।
इस मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत के सामने अपनी एक बड़ी चिंता और कड़वी सच्चाई रखी।
सरकार की तरफ से कहा गया कि ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें पीड़ित पक्ष शुरुआत में केस दर्ज कराकर और चार्जशीट दाखिल होने तक मिलने वाला भारी-भरकम मुआवजा उठा लेता है।
लेकिन जब अदालत में मुख्य ट्रायल (सुनवाई) शुरू होती है और गवाही का समय आता है, तो पीड़ित पक्ष या तो आरोपी से समझौता कर लेता है या फिर अपने बयानों से मुकर (होस्टाइल हो जाना) जाता है।

सरकार का तर्क था कि इससे सरकारी धन और सहायता का जो मुख्य उद्देश्य है, वही पूरी तरह विफल हो जाता है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा?
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट के जस्टिस विशाल मिश्रा की एकल पीठ ने एक कड़ा और स्पष्ट आदेश जारी किया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि:
- शपथपत्र देना अनिवार्य: संबंधित विभाग के अधिकारी आर्थिक सहायता की अगली किश्त जारी करने से पहले पीड़िता से एक विधिवत हलफनामा (शपथपत्र) लेंगे।
- समझौता न करने का वचन: इस शपथपत्र में स्पष्ट रूप से लिखा होगा कि पीड़िता मुकदमे के दौरान आरोपी से किसी भी प्रकार का कोई समझौता नहीं करेगी और न ही अपनी गवाही से पीछे हटेगी।
- 30 दिन में पैसा वापसी: यदि पीड़िता ट्रायल (अदालती कार्यवाही) के दौरान अपने आरोपों से मुकरती है या बयान बदलती है, तो अदालत के फैसले के 30 दिनों के भीतर उसे सरकार से मिली पूरी की पूरी सहायता राशि वापस लौटानी होगी।
- कड़ी वसूली और कानूनी एक्शन: यदि तय 30 दिनों के भीतर राशि जमा नहीं की जाती है, तो प्रशासन उस राशि की सख्ती से वसूली करेगा। इसके साथ ही, ट्रायल कोर्ट उपलब्ध तथ्यों के आधार पर पीड़िता के खिलाफ अन्य कानूनी कार्रवाई करने के लिए भी पूरी तरह स्वतंत्र रहेगी।

समझें SC-ST एक्ट में मुआवजे का पूरा ढांचा क्या है?
अत्याचार के मामलों में पीड़ितों को संबल देने के लिए सरकार द्वारा आर्थिक मदद दी जाती है।
मध्य प्रदेश में इस एक्ट के तहत अपराध की गंभीरता के आधार पर 85,000 रुपये से लेकर 8,85,000 रुपये तक की आर्थिक सहायता दी जाती है।
इस राशि का खर्च केंद्र और राज्य सरकार दोनों मिलकर आधा-आधा (50-50 के अनुपात में) उठाती हैं।
इस पूरी राशि का भुगतान तीन अलग-अलग चरणों में किया जाता है:
1. पहला चरण (25% राशि): जैसे ही मामले में एफआईआर (FIR) दर्ज होती है, कुल राशि का 25 प्रतिशत हिस्सा पीड़ित को मिल जाता है।
2. दूसरा चरण (50% राशि): जब पुलिस मामले की जांच पूरी कर अदालत में चार्जशीट (आरोप पत्र) दाखिल कर देती है, तब 50 प्रतिशत राशि दी जाती है।
3. तीसरा चरण (शेष 25% राशि): अदालत में ट्रायल पूरा होने के बाद यदि आरोपी को दोषी (दोष सिद्ध) करार दिया जाता है, तब बची हुई 25 प्रतिशत राशि मिलती है।
इस व्यवस्था का गणित समझें तो दोषी साबित होने से पहले ही (यानी शुरुआती दो चरणों में ही) पीड़ित को कुल मुआवजे का 75 प्रतिशत हिस्सा मिल जाता है।
सरकार का कहना है कि इसी कानूनी व्यवस्था का कुछ लोग गलत फायदा उठा रहे थे, जिस पर अब हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है।

इस आदेश का समाज और कानून पर क्या असर होगा?
मध्य प्रदेश के न्यायिक इतिहास में यह पहली बार है जब SC-ST मुआवजे के साथ इस तरह की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी को सीधे जोड़ा गया है। इस आदेश के दो पहलू देखे जा रहे हैं:
सकारात्मक पहलू: यह फैसला सरकारी खजाने के दुरुपयोग और टैक्सपेयर्स के पैसे को बर्बाद होने से बचाएगा।
साथ ही, उन लोगों पर लगाम कसेगा जो केवल मुआवजे के लालच में झूठे मुकदमे दर्ज कराते हैं और बाद में पैसे लेकर मुकर जाते हैं। इससे अदालतों का समय भी बचेगा।
चुनौतीपूर्ण पहलू: कानूनी विशेषज्ञों और समाजसेवियों का मानना है कि कई बार असली पीड़ित गरीब और ग्रामीण क्षेत्रों से होते हैं, जिन पर दबंग आरोपियों द्वारा गवाही बदलने या समझौता करने का भारी दबाव या जान का खतरा बनाया जाता है।
ऐसे में इस नए नियम का दबाव असली पीड़ितों पर न पड़े और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित हो, इस बात का ध्यान रखना भी प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।
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