Jitu Patwari Arrest Warrant: मध्य प्रदेश की राजनीति से इस वक्त की एक बहुत बड़ी खबर सामने आ रही है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी की कानूनी मुश्किलें काफी ज्यादा बढ़ गई हैं।
ग्वालियर की विशेष एमपी-एमएलए (MP-MLA) कोर्ट ने कांग्रेस नेता के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया है।
यह पूरा मामला साल 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए एक विवादित बयान से जुड़ा हुआ है।इस मामले में कोर्ट का रुख बेहद सख्त नजर आ रहा है।

अदालत ने भिंड के पुलिस अधीक्षक (SP) को सीधे और कड़े निर्देश दिए हैं कि आगामी सुनवाई पर जीतू पटवारी की कोर्ट में मौजूदगी हर हाल में सुनिश्चित की जाए।
अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल, लगाई कड़ी फटकार
इस मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट में एक बेहद दिलचस्प और हैरान करने वाला नजारा देखने को मिला।
पुलिस ने जब अदालत के सामने अपनी दलील रखते हुए कहा कि उन्हें जीतू पटवारी का पता नहीं चल पा रहा है, तो इस पर कोर्ट भड़क गई।
अदालत ने पुलिस के इस सुस्त और गैर-जिम्मेदाराना रवैये पर तीखी टिप्पणी की।
कोर्ट ने पुलिस से सवाल किया: “जब जीतू पटवारी लगातार मीडिया के सामने आ रहे हैं, टीवी पर दिख रहे हैं और हर जगह उनकी राजनीतिक गतिविधियां धड़ल्ले से चल रही हैं, तो फिर पुलिस उन्हें ढूंढ क्यों नहीं पा रही है?”

अदालत ने साफ तौर पर पुलिस की जांच की गंभीरता पर सवाल खड़े कर दिए।
कोर्ट ने भिंड पुलिस को अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि अब इस मामले में कोई बहानेबाजी नहीं चलेगी।
मामले की अगली सुनवाई 27 जुलाई को तय की गई है, और तब तक पुलिस को पटवारी को कोर्ट के सामने हाजिर करना होगा।
क्या है पूरा विवाद? जानिए 27 अप्रैल 2024 की चुनावी सभा के बारे में
इस पूरे विवाद की जड़ें साल 2024 के लोकसभा चुनावों से जुड़ी हैं।
तारीख थी 27 अप्रैल 2024, जब देश में आम चुनाव का प्रचार पूरे शबाब पर था।
मध्य प्रदेश कांग्रेस के मुखिया जीतू पटवारी भिंड जिले के दौरे पर थे। वे वहां भिंड-दतिया लोकसभा सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार फूल सिंह बरैया के पक्ष में माहौल बनाने पहुंचे थे।
भिंड के ऊमरी कस्बे में एक बड़ी चुनावी सभा का आयोजन किया गया था।

इसी मंच से भाषण देते हुए जीतू पटवारी ने कुछ ऐसी बातें कह दीं, जो अब उनके गले की फांस बन गई हैं।
दरअसल, चुनाव से ठीक पहले देवाशीष जरारिया ने कांग्रेस छोड़ दी थी और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के टिकट पर भिंड-दतिया सीट से चुनाव मैदान में उतर गए थे।
इस बात से नाराज जीतू पटवारी ने मंच से देवाशीष जरारिया पर सीधे और बेहद गंभीर व्यक्तिगत आरोप लगा दिए।
उन्होंने बिना किसी पुख्ता सबूत या तथ्यों के सार्वजनिक मंच से कह दिया कि देवाशीष जरारिया “भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से माल लेकर आए हैं।”

इसके साथ ही उन्होंने जरारिया पर भाजपा के साथ अंदरूनी सांठगांठ करने का आरोप भी लगाया।
‘तू-तड़ाक’ की भाषा और मतदाताओं से अपील
बात सिर्फ आरोपों तक ही सीमित नहीं रही। शिकायत के मुताबिक, जीतू पटवारी ने मंच से भाषण देते हुए बेहद अमर्यादित और ‘तू-तड़ाक’ वाली भाषा का इस्तेमाल किया, जो किसी भी वरिष्ठ नेता को शोभा नहीं देती।
इसके अलावा, पटवारी ने वहां मौजूद जनता और मतदाताओं से अपील करते हुए कहा था कि “बसपा को एक भी वोट देने का मतलब है अपना वोट सीधे बीजेपी के खाते में डालना।”
उन्होंने लोगों से बसपा उम्मीदवार को वोट न देने की खुलकर बात कही थी।

FIR से कोर्ट के वारंट तक
इस अपमानजनक भाषण और बिना सबूत के लगाए गए गंभीर आरोपों से नाराज होकर बसपा उम्मीदवार देवाशीष जरारिया ने कानूनी रास्ता चुनने का फैसला किया।
देवाशीष जरारिया के इलेक्शन एजेंट (निर्वाचन अभिकर्ता) ने इस पूरी चुनावी सभा की एक वीडियो सीडी तैयार की और सबूत के तौर पर पुलिस को सौंपी।
वीडियो की जांच और शुरुआती जांच के बाद, 4 मई 2024 को भिंड के उमरी थाने में जीतू पटवारी के खिलाफ नामजद एफआईआर (FIR) दर्ज कर ली गई।
इसके बाद मामला कोर्ट पहुंचा।
ग्वालियर की विशेष एमपी-एमएलए कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जीतू पटवारी को समन भेजा और उन्हें 16 जनवरी 2026 को अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया था।
हालांकि, जीतू पटवारी उस तय तारीख पर अदालत के सामने हाजिर नहीं हुए।

अब आगे क्या होगा?
जीतू पटवारी का कोर्ट के आदेश के बाद भी पेश न होना और पुलिस का यह कहना कि ‘नेताजी मिल नहीं रहे’, कोर्ट को बिल्कुल रास नहीं आया।
इसी वजह से अदालत को अंततः गिरफ्तारी वारंट जारी करने का कड़ा कदम उठाना पड़ा।
अब पूरी गेंद भिंड पुलिस के पाले में है। एक तरफ जहां मध्य प्रदेश की सियासत में इस वारंट के बाद भूचाल आ गया है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस खेमे में भी खलबली मची हुई है।
देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या भिंड पुलिस 27 जुलाई से पहले कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष को कोर्ट में पेश कर पाती है, या फिर जीतू पटवारी इस कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए ऊपरी अदालत या जमानत का रुख करते हैं।
फिलहाल, इस पूरे घटनाक्रम ने एमपी की राजनीति में गरमाहट ला दी है।
