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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बुजुर्ग माता-पिता अब परेशान करने वाले बच्चों को संपत्ति से निकाल सकेंगे बाहर

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Parents Evict children from property: बुजुर्गावस्था में सम्मान और सुरक्षा हर नागरिक का बुनियादी हक है।

देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि सीनियर सिटीजन्स अपनी शांति, सुरक्षा और भरण-पोषण के लिए अपने बच्चों और बहू को अपनी संपत्ति से बाहर निकाल सकते हैं।

कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि उम्र बढ़ने का मतलब असुरक्षा, बेबसी या अपमान सहना बिल्कुल नहीं है।

एक सभ्य समाज की सबसे बड़ी पहचान यही होती है कि वह अपने बुजुर्गों को कितनी गरिमा, सुरक्षा और सम्मान देता है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने पलटा

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने यह फैसला लखनऊ के एक परिवार से जुड़े मामले में सुनाया।

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को पूरी तरह रद्द कर दिया, जिसमें हाईकोर्ट ने बेटे और बहू को घर से निकालने के ट्रिब्यूनल कोर्ट (जिला प्रशासन) के आदेश पर रोक लगा दी थी।

सर्वोच्च अदालत ने साफ किया कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम (Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007) के तहत बनाए गए ट्रिब्यूनल के पास यह कानूनी अधिकार है कि वह बुजुर्गों की भलाई और सुरक्षा के लिए बच्चों को संपत्ति से बेदखल करने का आदेश दे सके।

क्या था लखनऊ का पूरा मामला?

यह पूरा विवाद लखनऊ के विकास नगर में रहने वाले रवि कांत गुप्ता और उनके बेटे-बहू के बीच का है।

रवि कांत गुप्ता का यह मकान उनकी खुद की मेहनत से खरीदी गई संपत्ति (Self-acquired Property) है।

घर के हालात इतने बिगड़ गए थे कि रवि कांत गुप्ता की 81 वर्षीय बुजुर्ग मां को मानसिक और शारीरिक परेशानी के कारण घर छोड़कर वृद्धाश्रम (Old Age Home) में शरण लेनी पड़ी थी।

इस दर्दनाक स्थिति से तंग आकर रवि कांत गुप्ता ने 5 जून 2022 को अपने बेटे और बहू को मकान से खाली कराने के लिए जिला मजिस्ट्रेट (DM) के पास आवेदन दिया।

मामले की गंभीरता को देखते हुए एसडीएम (SDM) ने 15 नवंबर 2022 को बेटे की बेदखली का स्पष्ट आदेश जारी किया।

बाद में, 9 अगस्त 2023 को जिला मजिस्ट्रेट ने भी एसडीएम के आदेश को सही ठहराते हुए बेटे और बहू को तुरंत मकान खाली करने का निर्देश दिया।

हाईकोर्ट ने क्यों लगाई थी रोक?

जिला प्रशासन के इस आदेश के खिलाफ बेटा और बहू इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचे।

हाईकोर्ट ने राहत देते हुए तर्क दिया था कि 2007 का वरिष्ठ नागरिक कानून बुजुर्गों को अपने बच्चों को घर से बाहर निकालने का सीधा अधिकार नहीं देता।

हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले को रद्द कर दिया था, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या तर्क दिया?

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की सोच को गलत ठहराते हुए कहा कि कानून का मुख्य उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों का कल्याण और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

* ट्रिब्यूनल के पास सिविल कोर्ट जैसी ताकत: कोर्ट ने कहा कि कानून की धारा 7 के तहत ट्रिब्यूनल गठित किए गए हैं और धारा 8 उन्हें सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां प्रदान करती है।

वहीं, धारा 27 सिविल कोर्ट को इस मामले में हस्तक्षेप करने से रोकती है।

इसलिए, बुजुर्गों की गरिमा बनाए रखने के लिए ट्रिब्यूनल जरूरत पड़ने पर बेदखली का कड़ा कदम उठा सकता है।

* पुराने फैसलों का हवाला: पीठ ने अपने 2021 के ऐतिहासिक फैसले (एस. वनिता बनाम डिप्टी कमिश्नर) का जिक्र किया, जिसमें कोर्ट ने माना था कि भरण-पोषण और गरिमा से जीने का अधिकार देने के लिए बच्चों को घर से हटाना भी बुजुर्गों की रक्षा का एक जरूरी जरिया है।

* Court ने यह भी स्पष्ट किया कि यह कानूनी स्थिति समटोला देवी बनाम यूपी सरकार (2025) और कमलकांत मिश्रा बनाम एडिशनल कलेक्टर (2025) के मामलों में भी दोहराई जा चुकी है।

बुजुर्गों के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट की सीधी सीख

इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने समाज को एक कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है।

खुद की कमाई संपत्ति पर माता-पिता का पूरा अधिकार है।

यदि बच्चे अपने बुजुर्ग माता-पिता का ध्यान नहीं रखते, उन्हें परेशान करते हैं या मानसिक तनाव देते हैं, तो कानून माता-पिता के साथ खड़ा है।

बढ़ती उम्र में शांति से जीने का हक हर बुजुर्ग का है, जिसे छीनने की इजाजत किसी भी बच्चे को नहीं दी जा सकती।

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