Balaghat Children Illness: मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले से एक बार फिर बेहद डरावनी और लाचारी से भरी खबर सामने आई है।
जिले के आदिवासी इलाकों में बीमारियों का प्रकोप थमने का नाम नहीं ले रहा है। पिछले कुछ हफ्तों के भीतर यहां 27 आदिवासी बच्चों की जान जा चुकी है।
अब एक बार फिर हालात इतने बिगड़ गए हैं कि जिला अस्पताल में 134 से ज्यादा बच्चे गंभीर हालत में भर्ती हैं।
अस्पताल में मरीजों का तांता लगा हुआ है, लेकिन इलाज देने के लिए संसाधन पूरी तरह से खत्म हो चुके हैं।
हालात इतने बदतर हैं कि अस्पताल के एक-एक बेड पर तीन से चार छोटे-छोटे मासूमों को लिटाकर इलाज किया जा रहा है।

जिन बच्चों को मां की गोद और साफ-सुथरे माहौल की जरूरत है, वे एक ही बिस्तर पर किसी तरह टिके हुए हैं।
अस्पताल में बेड खत्म, फर्श पर रात काटने को मजबूर परिवार
बालाघाट के जिला अस्पताल की क्षमता सिर्फ 50 बेड की है। सामान्य दिनों में यहां 20 से 30 बच्चे इलाज के लिए आते थे।
लेकिन इस समय अचानक बीमारियों का दौर ऐसा आया कि यह आंकड़ा कई गुना बढ़ गया।
अस्पताल के बच्चों के आईसीयू (PICU) में 13 मासूम बच्चे बहुत गंभीर हालत में भर्ती हैं।
अस्पताल के वार्डों में तिल रखने तक की जगह नहीं बची है। मरीजों के साथ आए परिजन और माता-पिता फर्श पर बैठकर या सोकर अपने बच्चों की देखभाल कर रहे हैं।

नर्सों और डॉक्टरों पर काम का दबाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है, जिससे सही देखभाल कर पाना बेहद मुश्किल साबित हो रहा है।
गंदा पानी बना बच्चों का दुश्मन
गांवों में बीमारियां फैलने की सबसे बड़ी वजह पीने के पानी की समस्या बताई जा रही है।
आदिवासी बहुल इलाकों में नल-जल योजनाएं सिर्फ कागजों या दावों तक सीमित रह गई हैं।
सोनगुड्डा गांव के रहने वाले साधुसिंह टेकाम अपनी बेटी मानसी को लेकर अस्पताल पहुंचे हैं।
उन्होंने बताया कि उनकी पंचायत में 14-15 वार्ड हैं, लेकिन ज्यादातर हिस्सों में साफ पानी की कोई व्यवस्था नहीं है।

लोग मजबूरी में हैंडपंप और खुले जल स्रोतों का दूषित पानी पीते हैं।
उनकी बेटी को पहले मलेरिया हुआ, फिर पीलिया हुआ और अब वह दोबारा मलेरिया की चपेट में आ गई है।
बरसात के दिनों में पानी में गंदगी मिल जाने से उल्टी-दस्त, डायरिया, खसरा और तेज बुखार का प्रकोप हर साल बढ़ जाता है।
इलाज के लिए 100 किलोमीटर का मुश्किल सफर
गांवों में स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र (PHC) सिर्फ नाम के रह गए हैं।
वहां न तो पर्याप्त दवाइयां मिलती हैं और न ही डॉक्टर उपलब्ध रहते हैं।
इस वजह से गांव के लोगों को अपने गंभीर बच्चों को लेकर 100-100 किलोमीटर दूर जिला अस्पताल भागना पड़ रहा है।

* कोरका गांव के टीकासिंह मरकाम अपनी दो छोटी बेटियों संतोषी और स्तुति को लेकर अस्पताल आए हैं, जिनके पूरे शरीर पर लाल दाने (खसरा के लक्षण) निकल आए हैं।
* कुंडेकसा गांव के सुक्कुसिंह धुर्वे अपने बेटे युवराज को लेकर पहुंचे हैं, जो लगातार उल्टी और दस्त से तड़प रहा है।
* सिजोरा गांव की मानसी टेकाम पिछले तीन दिनों से मलेरिया से जंग लड़ रही है।
टूटी-फूटी सड़कों और परिवहन के साधनों की कमी के बीच इतनी दूरी तय करके अस्पताल पहुंचने में ही कई बार बच्चों की हालत ज्यादा बिगड़ जाती है।

स्वास्थ्य विभाग ने मांगी अतिरिक्त मदद
अस्पताल की लाचारी पर सिविल सर्जन डॉ. निलय जैन का कहना है कि वे अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि, मरीजों की भारी संख्या को देखते हुए उन्होंने जबलपुर के ज्वाइंट डायरेक्टर को पत्र लिखकर अतिरिक्त बेड, डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ भेजने की मांग की है।
डॉक्टरों का यह भी कहना है कि पिछले करीब डेढ़ महीने से प्रभावित गांवों से लगातार मरीज आ रहे हैं।
कई बच्चे तो ऐसे हैं जो अस्पताल से ठीक होकर घर जाते हैं, लेकिन गांव जाकर दूषित पानी पीने से कुछ दिनों बाद दोबारा बीमार होकर लौट आते हैं।

27 मासूमों की मौत के बाद भी नहीं जागे जिम्मेदार
इस इलाके में जून के आखिरी हफ्ते से ही मौतों का सिलसिला जारी है। अब तक बैगा और गोंड जनजाति के 27 मासूम बच्चे अपनी जान गंवा चुके हैं।
29 जुलाई को 10 साल की बच्ची काजल सैयाम की मौत के बाद हड़कंप मचा था, लेकिन उसके बाद भी जमीनी स्तर पर कोई ठोस बदलाव नहीं आया।
स्थानीय लोगों का साफ कहना है कि केवल जिला अस्पताल में बेड बढ़ा देने या दवाइयां दे देने से यह मुसीबत खत्म नहीं होगी।
जब तक गांवों में पीने के लिए साफ पानी, नियमित सफाई और जमीनी स्तर पर सही स्वास्थ्य जांच नहीं होगी, तब तक मासूमों की जान पर यह खतरा ऐसे ही मंडराता रहेगा।
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