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कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय बोले- अब जात-पात की नहीं, Gen-Z और Gen-Alpha की है लड़ाई, इंदौर में युवाओं से की खास चर्चा

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Indresh Upadhyay Gen-Z Charcha: इंदौर के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (DAVV) के तक्षशिला परिसर में हाल ही में एक खास कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसका नाम ‘Gen-Z चर्चा’ था।

इस कार्यक्रम में जाने-माने कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय ने शिरकत की और आज की युवा पीढ़ी (Gen-Z और Gen-Alpha) के साथ खुलकर बातचीत की।

इस दौरान उन्होंने करियर, रिश्ते, जीवन के उद्देश्य, संस्कार और युवाओं की बदलती सोच जैसे कई जरूरी मुद्दों पर अपने विचार रखे।

कार्यक्रम में युवाओं को सीधे अपने सवाल पूछने का मौका भी मिला, जिससे माहौल काफी दिलचस्प हो गया।

अब जातियों की नहीं, पीढ़ियों की है लड़ाई

कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय ने अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए एक बहुत बड़ा बयान दिया।

उन्होंने कहा कि अब समाज में पुरानी लड़ाइयों यानी राजपूत और ब्राह्मण जैसी जातियों के दौर से आगे बढ़कर वक्त बदल चुका है।

आज की असल लड़ाई किसी जाति की नहीं, बल्कि Gen-Z (आज के युवा) और Gen-Alpha (आने वाली पीढ़ी) के बीच शुरू हो गई है।

उनका कहना था कि हमें समय के साथ अपनी सोच को बदलना होगा और नई पीढ़ी की जरूरतों को समझना होगा।

धोनी, सचिन और विराट की सफलता का मंत्र

युवाओं को सफलता का पाठ पढ़ाते हुए उन्होंने भारत के महान क्रिकेटर्स—महेंद्र सिंह धोनी, सचिन तेंदुलकर और विराट कोहली का उदाहरण दिया।

उन्होंने बताया कि ये खिलाड़ी अपनी फील्ड में इतने सफल क्यों हैं? इसका मुख्य कारण यह है कि वे मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में भी कभी टूटे नहीं, बल्कि डटे रहे।

उन्होंने आज के युवाओं और बच्चों में घटते हुए पैशेंस (धैर्य) और सहनशक्ति पर गहरी चिंता जताई।

उनके मुताबिक, आज की युवा पीढ़ी में सहनशक्ति लगातार कम होती जा रही है और पैशेंस का स्तर लगभग शून्य पर पहुंच गया है, जिसे उन्होंने पश्चिमी संस्कृति (विदेशियों) का प्रभाव बताया।

हालांकि, उन्होंने यह भी समझाया कि जीवन में बड़ी सफलता हासिल करने के लिए मुश्किल समय में टिके रहना और हार न मानना सबसे जरूरी है।

Gen-Z यूजलेस नहीं, बस सही इस्तेमाल की है जरूरत

आजकल अक्सर युवाओं को लेकर यह धारणा बनाई जाती है कि वे किसी काम के नहीं हैं या उनका इस्तेमाल नहीं हो सकता, लेकिन इंद्रेश उपाध्याय ने इस सोच का कड़ा विरोध किया।

उन्होंने साफ कहा कि Gen-Z यूजलेस (बेकार) नहीं है, बल्कि समस्या यह है कि उनकी ऊर्जा और क्षमता का सही इस्तेमाल बहुत कम हो रहा है।

उन्होंने इस अहम मुद्दे पर भारत सरकार से विशेष ध्यान देने की अपील की, ताकि देश के युवाओं की ताकत का सही दिशा में उपयोग किया जा सके।

साथ ही, उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि युवाओं को राजनीति और संवैधानिक व्यवस्थाओं में आगे लाना चाहिए ताकि देश के विकास में उनकी सीधी भागीदारी हो सके।

देवी अहिल्याबाई होलकर से सीख

इंदौर की धरती का जिक्र करते हुए उन्होंने देवी अहिल्याबाई होलकर के जीवन पर प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि एक आदर्श बहू वही है जो शादी से पहले अपने पिता और भाई का सम्मान करे और ससुराल जाने के बाद वहां का नाम रोशन करे।

देवी अहिल्याबाई ने न सिर्फ होलकर वंश, बल्कि पूरे देश में अपने बेहतरीन कामों से एक मिसाल कायम की थी और अपनी अलग पहचान बनाई थी।

कलयुग में भगवान का नाम ही लाएगा बदलाव

कार्यक्रम के दौरान धार्मिक और आध्यात्मिक पहलुओं पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि आज के कलयुग में भगवान सीधे रूप में प्रकट होने नहीं आएंगे और न ही कल्कि भगवान अभी बहुत जल्दी आ रहे हैं।

हमारे आसपास आज भी कई रूप में रावण और कंस मौजूद हैं, जिनका नाश करने के लिए कोई चमत्कारिक शक्ति नहीं आएगी।

उन्होंने युवाओं को सलाह दी कि कलयुग में केवल भगवान का नाम लेने से ही जीवन में सकारात्मक बदलाव आ सकता है।

उन्होंने बच्चों और युवाओं को एक आदत डालने की सलाह दी कि वे रोज कम से कम एक भगवान के नाम का जाप करें।

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उन्होंने 30 दिन तक लगातार इसका ट्रायल करने को कहा और दावा किया कि 31वें दिन व्यक्ति को अपने जीवन में खुद-ब-खुद बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।

यह पूरा कार्यक्रम युवाओं के लिए बेहद प्रेरणादायक रहा, जहां उन्हें अपनी जिंदगी की उलझनों को सुलझाने और सही दिशा में आगे बढ़ने के कई महत्वपूर्ण गुरुमंत्र मिले।

कार्यक्रम में प्रवेश पूरी तरह से निःशुल्क रखा गया था, जिससे बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं शामिल हो सकें।

इस दौरान एक भावुक पल भी आया जब कथावाचक से मिलकर एक छात्रा की आंखें नम हो गईं और वह रो पड़ी।

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