RSS organizational structure change: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) अपने कामकाज और प्रशासनिक ढांचे को और ज्यादा मजबूत तथा प्रभावी बनाने के लिए एक बड़े बदलाव की तैयारी कर रहा है।
संघ के इस नए संगठनात्मक स्वरूप के तहत प्रशासनिक व्यवस्थाओं का विकेंद्रीकरण किया जाएगा, ताकि देश के अलग-अलग हिस्सों में गतिविधियों का संचालन और बेहतर तरीके से हो सके।
इस बदलाव से जुड़ी रूपरेखा और अहम प्रस्तावों पर इंदौर में होने वाली अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में चर्चा की जाएगी।

क्या होंगे मुख्य संगठनात्मक बदलाव?
संघ के सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, आरएसएस के मौजूदा ढांचे में बड़े फेरबदल किए जा रहे हैं:
* क्षेत्रों की संख्या घटेगी: अब तक संघ के कामकाज के लिए देश भर में 11 क्षेत्र बनाए गए थे, जिन्हें घटाकर अब 9 किया जा रहा है।
* संभागों का विस्तार: मौजूदा समय में संगठन के पास 46 प्रांत हैं, जिनकी जगह अब लगभग 90 नए संभाग बनाए जाएंगे।
संभागों की संख्या बढ़ने से स्थानीय स्तर पर कार्यक्रमों और प्रशासनिक गतिविधियों का प्रबंधन संभालना काफी आसान हो जाएगा।
* पहली बार बनेंगी राज्य इकाइयां: आरएसएस के इतिहास में यह पहला मौका होगा जब औपचारिक तौर पर राज्य स्तर पर संगठनात्मक इकाइयां गठित की जाएंगी।

इस नई व्यवस्था के तहत हर राज्य में केवल ‘राज्य प्रचारक’ और ‘राज्य कार्यवाह’ की जिम्मेदारी होगी, हालांकि इस स्तर पर ‘राज्य संघचालक’ का पद नहीं रखा गया है।
* बैठकों की अवधि में बदलाव: संघ की सबसे बड़ी नीतिगत निर्णय लेने वाली संस्था ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ की बैठक अब हर साल के बजाय हर तीन साल में नागपुर में आयोजित की जाएगी।
इसके अलावा, क्षेत्रीय स्तर की बैठकें अब हर दो साल पर होंगी, जिससे विभिन्न स्तरों के बीच आपसी तालमेल और मजबूत हो सके।

इंदौर में होगी महत्वपूर्ण कार्यकारी मंडल की बैठक
आरएसएस की तीन दिवसीय ‘अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल’ (ABKM) की बैठक मध्य प्रदेश के आर्थिक शहर इंदौर में आयोजित की जा रही है।
यह महत्वपूर्ण बैठक 2 से 4 नवंबर तक चलेगी।
इस बैठक में संघ के पुनर्गठन के इन सभी प्रस्तावों पर गंभीरता से विचार किया जाएगा।
इसके साथ ही, बैठक में संघ के शताब्दी वर्ष (100 साल पूरे होने) के उपलक्ष्य में चल रही गतिविधियों की गहन समीक्षा होगी।
इस उच्च-स्तरीय बैठक में आरएसएस प्रमुख (मोहन भागवत), सरकार्यवाह (दत्तात्रेय होसबाले) और सभी छह सह-सरकार्यवाह के साथ-साथ सभी अखिल भारतीय विभागों के प्रमुख और कार्यकारी सदस्य भी शिरकत करेंगे।

एक नजर में RSS का इतिहास और सफर
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के पावन दिन नागपुर में डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने की थी।
शुरुआती दौर में 1926 में इसका नाम तय हुआ और शाखा प्रणाली की शुरुआत हुई।
समय के साथ संघ ने देश और दुनिया भर में अपनी मजबूत पकड़ बनाई:
* 1931: संघ की पहली निश्चित गणवेश (खाकी नेकर और टोपी) तय की गई।
* 1948 और 1975: महात्मा गांधी की हत्या के बाद और आपातकाल (इमरजेंसी) के दौरान संघ पर प्रतिबंध लगाया गया, लेकिन दोनों ही बार संघ ने इन कठिन दौर का सामना किया और पाबंदियां हटने के बाद संगठन और अधिक तेजी से उभरा।
* राजनीतिक प्रभाव: संघ की वैचारिक प्रेरणा से 1951 में भारतीय जनसंघ और 1980 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की स्थापना हुई, जिसने आगे चलकर देश की राजनीति में एक निर्णायक भूमिका निभाई।
* वैश्विक विस्तार: अपनी स्थापना के 90 वर्ष पूरे होने पर (2015 तक) संघ का विस्तार दुनिया के 39 देशों तक हो चुका है, जहां ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ’ के रूप में शाखाएं संचालित होती हैं।
* शताब्दी वर्ष: साल 2025 में विजयादशमी के अवसर पर संघ ने अपनी स्थापना के गौरवशाली 100 वर्ष पूरे कर लिए हैं।

इन सभी नए संगठनात्मक बदलावों के लागू होने के बाद आरएसएस के प्रशासनिक और क्षेत्रीय तालमेल में एक नया युग शुरू होने की उम्मीद है, जिससे संगठन के जमीनी कार्यों को और अधिक गति मिलेगी।
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