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OTT से हटाई गई ‘सतलुज’: अब पंजाब के गुरुद्वारों में फ्री स्क्रीनिंग शुरू, स्कूल-कॉलेजों में भी दिखाई जाएगी जसवंत खालड़ा की कहानी

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Satluj Screening Punjab Gurudwara: मशहूर पंजाबी एक्टर और सिंगर दिलजीत दोसांझ की नई फिल्म ‘सतलुज’ इन दिनों देश के सियासी और सामाजिक गलियारों में जबरदस्त चर्चा का विषय बनी हुई है।

हाल ही में इस फिल्म को ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया था, जिसके बाद इसे लेकर विवाद और बढ़ गया है।

लेकिन अब फिल्म को लोगों तक पहुंचाने के लिए एक नया रास्ता निकाला गया है।

पंजाब के गुरुद्वारों में इस फिल्म की ‘फ्री स्क्रीनिंग’ (मुफ्त प्रदर्शन) शुरू कर दी गई है, ताकि आम लोग और युवा पीढ़ी इस कहानी को देख सकें।

गुरुद्वारों से हुई शुरुआत, गांव-गांव तक ले जाने की तैयारी

इस मुहिम की शुरुआत पंजाब के गुरदासपुर जिले से हुई है।

वहां के गांव मानचोपड़ा में गुरुद्वारा साहिब से बाकायदा लाउडस्पीकर पर अनाउंसमेंट (घोषणा) की गई और ग्रामीणों को इकट्ठा करके यह फिल्म दिखाई गई।

इसके बाद मोगा के एक गुरुद्वारे में भी फिल्म की स्क्रीनिंग की गई।

अब इस कड़ी में पठानकोट का नाम भी जुड़ गया है।

पठानकोट के दो बड़े और प्रमुख गुरुद्वारों—मॉडल टाउन स्थित ‘गुरुद्वारा सिंह सभा’ और रानीपुर स्थित ‘गुरुद्वारा सिंह सभा सेंट्रल’ में बुधवार और गुरुवार को इस फिल्म को दिखाने का ऐलान किया गया है।

भारतीय किसान यूनियन के पंजाब यूथ प्रेसिडेंट इंद्रपाल सिंह बैंस ने इस बारे में बात करते हुए कहा कि इस फिल्म को सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं रखा जाएगा।

इसे पंजाब के कोने-कोने और हर गांव तक ले जाया जाएगा ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग सच से रूबरू हो सकें।

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दिल्ली कमेटी का बड़ा फैसला: स्कूल-कॉलेजों में भी दिखेगी फिल्म

मामला सिर्फ पंजाब तक ही सिमटा नहीं है, बल्कि देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंच चुका है।

दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (DSGMC) भी इस फिल्म के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई है।

कमेटी के अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका ने साफ शब्दों में कहा कि इस फिल्म को रोकना इतिहास को दबाने की एक सोची-समझी कोशिश है।

उन्होंने घोषणा की है कि दिल्ली के गुरुद्वारों में तो यह फिल्म दिखाई ही जाएगी, साथ ही दिल्ली के सिख स्कूल और कॉलेजों में जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन, उनके संघर्ष और मानवाधिकारों पर विशेष सेमिनार भी आयोजित किए जाएंगे।

फिल्म की कहानी और वो विवादित सीन जिस पर मचा है बवाल

आखिर इस फिल्म में ऐसा क्या है जिसे लेकर इतना बड़ा विवाद खड़ा हो गया है?

दरअसल, यह फिल्म 1990 के दशक में पंजाब के काले दौर (आतंकवाद के समय) पर आधारित है।

फिल्म की मुख्य कहानी मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ता (Human Rights Activist) जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और उनके संघर्ष को दिखाती है।

जसवंत सिंह खालड़ा ने दावा किया था कि पंजाब में पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ों (Encounters) में करीब 25 हजार युवाओं की हत्या कर दी और लावारिस बताकर उनका अंतिम संस्कार कर दिया।

 

फिल्म में कुछ बेहद संवेदनशील दृश्य (Scenes) दिखाए गए हैं:

सीएम बेअंत सिंह की हत्या: फिल्म में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की बम धमाके में हुई हत्या का सीन दिखाया गया है। इसे कहानी में पुलिसिया कार्रवाई के टर्निंग पॉइंट के रूप में पेश किया गया है।

पुलिस की क्रूरता: फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह पुलिस के कथित अत्याचारों से तंग आकर एक आम इंसान भी बागी या चरमपंथी बनने पर मजबूर हो जाता है।

केपीएस गिल का किरदार: पंजाब के तत्कालीन डीजीपी के.पी.एस. गिल के किरदार को फिल्म में ‘आईपीएस बिट्टा’ के नाम से दिखाया गया है।

जसवंत खालड़ा का किडनैप: फिल्म के मुताबिक, 31 अगस्त 1995 को सीएम बेअंत सिंह की हत्या होती है और उसके ठीक एक हफ्ते बाद, यानी 6 सितंबर 1995 को जसवंत सिंह खालड़ा का अचानक अपहरण कर लिया जाता है।

फिल्म में दावा किया गया है कि पुलिस को डर था कि राजनीतिक माहौल बदलने के बाद खालड़ा 25 हजार शवों के अवैध दाह-संस्कार का राज दुनिया के सामने न खोल दें।

क्या गुरुद्वारों में फिल्म दिखाना गैरकानूनी है? कानून क्या कहता है

ओटीटी से हटने के बाद इस तरह सार्वजनिक जगहों पर फिल्म दिखाए जाने को लेकर कानूनी सवाल भी उठ रहे थे।

इस पर पठानकोट के वरिष्ठ वकील (सीनियर एडवोकेट) विशाल कोहली ने स्थिति साफ की है।

उनका कहना है कि गुरुद्वारों में संगत (लोगों) के लिए इस फिल्म को दिखाना किसी भी कानून का उल्लंघन नहीं है।

उन्होंने दलील दी कि इस फिल्म का कंटेंट पहले से ही इंटरनेट के अलग-अलग माध्यमों पर मौजूद है और लोग इसे देख चुके हैं।

ऐसे में समाज को जागरूक करने के मकसद से अगर गुरुद्वारे में इसे दिखाया जा रहा है, तो इसे गैरकानूनी नहीं ठहराया जा सकता।

कुल मिलाकर, ‘सतलुज’ फिल्म को डिजिटल स्क्रीन से भले ही हटा दिया गया हो, लेकिन जमीन पर इसे दिखाने की मुहिम अब एक बड़े आंदोलन का रूप लेती जा रही है।

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