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योगिनी एकादशी: इस व्रत से मिलेगा 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने जितना पुण्य, भूलकर भी न करें ये 4 गलतियां

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Yogini Ekadashi Vrat Katha: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का बहुत बड़ा धार्मिक महत्व है।

साल भर में आने वाली सभी 24 एकादशी तिथियों में आषाढ़ महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है।

जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित यह व्रत इंसान के सभी दुखों और पापों को दूर करने वाला माना गया है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, योगिनी एकादशी का व्रत रखने से न केवल शारीरिक कष्ट दूर होते हैं, बल्कि जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है।

आइए जानते हैं साल 2026 में योगिनी एकादशी कब है, इसके नियम क्या हैं और इससे जुड़ी पौराणिक कथा क्या है।

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10 जुलाई को रखा जाएगा व्रत: जानें सही तिथि और शुभ मुहूर्त

वैदिक पंचांग की गणना के अनुसार, साल 2026 में आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 10 जुलाई 2026 को सुबह 08:16 बजे से हो रही है।

इस तिथि का समापन अगले दिन 11 जुलाई 2026 को सुबह 05:22 बजे होगा।

हिंदू धर्म में उदयातिथि (सूर्योदय के समय मौजूद तिथि) के नियम को सर्वोपरि माना जाता है, इसलिए योगिनी एकादशी का व्रत 10 जुलाई, शुक्रवार को ही रखा जाएगा।

इस व्रत का नियम बेहद कड़ा होता है। व्रत का संयम एक दिन पहले यानी दशमी तिथि की रात से ही शुरू हो जाता है और अगले दिन द्वादशी तिथि को शुभ मुहूर्त में पारण (व्रत खोलने) के बाद ही यह पूरा होता है।

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व्रत के दौरान भूलकर भी न करें ये 4 गलतियां

शास्त्रों में एकादशी व्रत को लेकर कुछ बहुत जरूरी नियम बताए गए हैं।

अगर आप व्रत के दौरान अनजाने में भी ये गलतियां करते हैं, तो आपका व्रत खंडित हो सकता है और आपको इसका पुण्य नहीं मिलेगा।

1. तुलसी दल (पत्ते) तोड़ना सख्त मना है

एकादशी के दिन सबसे पहली और जरूरी सावधानी यह है कि इस दिन भूलकर भी तुलसी के पौधे से पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसी जी भगवान विष्णु की परम प्रिया हैं और वे स्वयं एकादशी के दिन श्री हरि के लिए निर्जला व्रत रखती हैं।

ऐसे में इस दिन तुलसी के पत्ते तोड़ने से उनका व्रत भंग होता है, जिससे इंसान को पाप लग सकता है।

आप पूजा के लिए एक दिन पहले ही पत्ते तोड़कर रख सकते हैं।

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2. खान-पान में लहसुन-प्याज और चावल से दूरी

एकादशी के दिन भोजन की शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है।

इस दिन घर में तामसिक भोजन जैसे लहसुन, प्याज, मांस और मदिरा का इस्तेमाल पूरी तरह वर्जित होता है।

इसके अलावा, एकादशी के दिन चावल खाना सबसे बड़ा दोष माना गया है।

शास्त्रों के अनुसार, इस दिन चावल खाना रेंगने वाले जीव के मांस के समान माना जाता है, इसलिए व्रत रखने वाले और न रखने वाले, दोनों को ही इस दिन चावल नहीं खाना चाहिए।

3. सादे नमक के इस्तेमाल से बचें

कई लोग व्रत के फलाहार में अनजाने में सादे (सफेद) नमक का इस्तेमाल कर लेते हैं। एकादशी के व्रत में सामान्य नमक खाना वर्जित है।

यदि आप व्रत में नमक का सेवन करना चाहते हैं, तो केवल सात्विक और शुद्ध सेंधा नमक का ही प्रयोग करें।

4. वाणी पर नियंत्रण और व्यवहार में शालीनता

एकादशी का व्रत केवल भूखे रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह मन और व्यवहार के संयम का भी व्रत है।

इस दिन किसी से भी लड़ाई-झगड़ा, वाद-विवाद या किसी की चुगली नहीं करनी चाहिए।

बातचीत के दौरान किसी को भी कड़वे या अपशब्द बोलने से बचना चाहिए। ऐसा करने से व्रत का सारा फल नष्ट हो जाता है।

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88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने जितना फल

महाभारत काल में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को योगिनी एकादशी का महत्व बताते हुए कहा था कि इस व्रत को विधि-विधान से करने से इंसान को 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर पुण्य मिलता है।

यह व्रत जाने-अनजाने में हुए बड़े से बड़े पापों के प्रभाव को खत्म कर देता है।

विशेष रूप से, यह व्रत त्वचा संबंधी रोगों (जैसे कुष्ठ रोग या कोढ़) से मुक्ति दिलाने में बेहद चमत्कारी माना गया है।

जो भक्त पूरी श्रद्धा से इस दिन भगवान विष्णु की आराधना करते हैं, उन्हें जीवन के अंत में वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।

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कुबेर के श्राप से हेमा माली को मिली मुक्ति: पौराणिक कथा

पद्म पुराण में योगिनी एकादशी को लेकर एक बेहद रोचक कथा मिलती है।

अलकापुरी नगरी में राजा कुबेर रहा करते थे, जो भगवान शिव के परम भक्त थे।

कुबेर की पूजा के लिए ‘हेमा’ नाम का एक माली रोज मानसरोवर से सुंदर फूल लाया करता था।

हेमा माली अपनी पत्नी विशालाक्षी से अगाध प्रेम करता था और उसी के ख्यालों में खोया रहता था।

एक दिन वह मानसरोवर से फूल तो ले आया, लेकिन राजा के दरबार में जाने के बजाय अपनी पत्नी के पास घर पर ही रुक गया।

उधर, राजा कुबेर दोपहर तक पूजा के फूलों का इंतजार करते रहे। जब राजा को पता चला कि हेमा माली अपनी पत्नी के साथ आमोद-प्रमोद में व्यस्त है, तो वे क्रोधित हो उठे।

उन्होंने हेमा को दरबार में बुलाकर श्राप दे दिया, “तुमने पूजा के कार्य में लापरवाही की है, इसलिए तुम पत्नी के वियोग में तड़पोगे और धरती पर जाकर कुष्ठ रोगी बन जाओगे।”

श्राप के प्रभाव से हेमा माली स्वर्ग से सीधे धरती पर आ गिरा और उसके पूरे शरीर में कोढ़ हो गया। वह कई दिनों तक जंगलों में भूख-प्यास से तड़पता रहा।

भटकते-भटकते एक दिन वह मार्कंडेय ऋषि के आश्रम पहुंचा। हेमा ने रोते हुए ऋषि के चरणों में गिरकर अपनी गलती स्वीकार की।

मार्कंडेय ऋषि को उस पर दया आ गई। ऋषि ने कहा, “तुम आषाढ़ मास की योगिनी एकादशी का पूरी श्रद्धा से व्रत करो, तुम्हारे सभी पाप और रोग नष्ट हो जाएंगे।”

हेमा माली ने ऋषि के कहे अनुसार नियमपूर्वक व्रत रखा।

व्रत के प्रभाव से उसका कुष्ठ रोग पूरी तरह ठीक हो गया और वह वापस अपने दिव्य रूप में आकर स्वर्ग लोक अपनी पत्नी के पास लौट गया।

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