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चिप्स और कोल्ड ड्रिंक्स के पैकेट पर लगेगा ‘रेड अलर्ट’: ज्यादा शक्कर, तेल और नमक वाले खाने पर छपेगा लाल षटकोण

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

FSSAI Red Label Proposal: अगर आप या आपके बच्चे चिप्स, नमकीन, बिस्कुट या कोल्ड ड्रिंक्स के शौकीन हैं, तो आने वाले दिनों में इन सामानों को खरीदते समय आपको पैकेट पर एक बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।

अगर किसी डिब्बाबंद या पैकेट बंद खाने-पीने की चीज़ में शक्कर, नमक या सैचुरेटेड फैट की मात्रा तय सीमा से अधिक पाई जाती है, तो उसके पैकेट के ठीक सामने लाल रंग का एक 6 कोनों वाला (Hexagonal) चेतावनी निशान अनिवार्य रूप से छापना होगा।

खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण यानी FSSAI (Food Safety and Standards Authority of India) ने यह नया प्रस्ताव देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के समक्ष पेश किया है।

इस कदम का मुख्य उद्देश्य आम नागरिकों को खाद्य पदार्थों में मौजूद अस्वस्थ तत्वों के प्रति पहले ही सचेत करना है, ताकि वे अपनी सेहत को ध्यान में रखकर सही निर्णय ले सकें।

सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद आया प्रस्ताव

यह पूरा मामला तब सामने आया जब ‘3S एंड अवर हेल्थ सोसाइटी’ नाम के एक चैरिटेबल ट्रस्ट ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर डिब्बाबंद खान-पान पर सख्त वार्निंग लेबल लगाने की गुहार लगाई थी।

मामले की पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने FSSAI और सरकार को चेतावनी लेबल के नियम लागू करने में हो रही देरी पर कड़ा रुख अपनाया था और पूछा था कि क्या आम नागरिकों के स्वास्थ्य को लेकर सरकार गंभीर नहीं है?

कोर्ट की इस फटकार के बाद FSSAI ने अपना यह नया हलफनामा (Affidavit) कोर्ट में दाखिल किया है।

क्या है ‘फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग’ (FOPL) और क्यों है इसकी जरूरत?

वर्तमान में पैकेज्ड फूड पर पोषण से जुड़ी सारी जानकारियां (Nutritional Values) पैकेट के पीछे या साइड में बहुत छोटे-छोटे अक्षरों में लिखी होती हैं।

अक्सर आम ग्राहक उस तालिका (Table) को या तो पढ़ते नहीं हैं या फिर उसमें लिखे कठिन तकनीकी शब्दों को समझ नहीं पाते।

इसी समस्या का समाधान है ‘फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग’ (FOPL)।

* इसका सीधा मतलब यह है कि पैकेट के ठीक सामने एक ऐसा साफ़ और बड़ा निशान बनाया जाएगा, जिसे देखते ही खरीदार समझ जाए कि यह प्रोडक्ट उसकी सेहत के लिए कितना मुफ़ीद या नुकसानदायक है।

* इस व्यवस्था के लागू होने से सबसे ज़्यादा फ़ायदा बच्चों और उन लोगों को होगा, जो अनजाने में रोज़ाना बहुत अधिक मात्रा में प्रोसेस्ड शुगर और फैट का सेवन कर रहे हैं।

दो चरणों (Phase) में लागू होगी नई व्यवस्था

FSSAI ने फ़ूड इंडस्ट्री को अपने प्रोडक्ट्स की रेसिपी और गुणवत्ता सुधारने का अवसर देने के लिए इस योजना को दो अलग-अलग चरणों में लागू करने की सिफारिश की है:

* पहला चरण (Phase 1): पहले फेज़ में उन सभी खाद्य पदार्थों पर लाल रंग का हेक्सागोनल लेबल अनिवार्य रूप से लगाया जाएगा, जिनमें फैट, शुगर या साल्ट में से कोई भी ‘दो या दो से ज्यादा’ चीज़ें तय सीमा से अधिक होंगी।

मीठी कोल्ड ड्रिंक्स और हैवी स्नैक्स तुरंत इस दायरे में आएंगे।

* दूसरा चरण (Phase 2): दूसरे फेज़ में नियम और कड़े कर दिए जाएंगे। इसके तहत यदि किसी प्रोडक्ट में फैट, शुगर या साल्ट में से कोई ‘एक’ चीज़ भी तय लिमिट से ज़्यादा पाई गई, तो उस पर भी यह लाल वार्निंग मार्क छापना ही होगा।

मानक कैसे तय होंगे और किन्हें मिलेगी छूट?

कोई भी फ़ूड आइटम ‘हाई फैट, हाई शुगर या हाई साल्ट’ (HFSS) की श्रेणी में आता है या नहीं, इसका निर्णय ICMR-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन (ICMR-NIN) की ‘डायट्री गाइडलाइंस 2024’ के आधार पर किया जाएगा।

इन चीज़ों को मिलेगी छूट:

ऐसे प्राकृतिक खाद्य पदार्थ जो सिंगल-इंग्रीडिएंट (केवल एक सामग्री वाले) हैं, उन्हें इस लाल निशान से अलग रखा जाएगा।

उदाहरण के लिए—शुद्ध देशी घी, खाने का तेल, साधारण नमक, पैक्ड चीनी, गुड़ और शहद। चूंकि ये उत्पाद मूल रूप से प्राकृतिक रूप से फैट या शुगर से भरपूर होते हैं, इसलिए इन पर फ्रंट वार्निंग लागू नहीं होगी।

स्वास्थ्य के लिए क्यों ज़रूरी है यह पहल?

आजकल बाज़ार में मिलने वाले अधिकतर प्रोसेस्ड फूड में सैचुरेटेड फैट की मात्रा बहुत अधिक होती है।

* सैचुरेटेड फैट (जो घी, मक्खन, चीज़, पाम ऑयल और फैटी मीट में होता है) का अत्यधिक सेवन शरीर में ‘ खराब कोलेस्ट्रॉल’ (LDL) को बढ़ाता है, जिससे दिल की बीमारियां, हाई ब्लड प्रेशर और ओबेसिटी (मोटापा) का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

 * इसके विपरीत, अनसैचुरेटेड फैट (जो मूंगफली, बादाम, अखरोट, जैतून के तेल और मछली में होता है) सीमित मात्रा में लेने पर दिल की सेहत के लिए बेहतर माना जाता है।

FSSAI के इस प्रस्तावित कदम से भारतीय खाद्य बाज़ार में एक बड़ा पारदर्शिता का युग शुरू होगा, जिससे आम उपभोक्ता बाज़ार के आकर्षक विज्ञापनों के झांसे में आने से बचेंगे और स्वस्थ जीवनशैली की ओर कदम बढ़ा सकेंगे।

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