Jabalpur Bargi Cruise Accident: 30 अप्रैल 2026 की शाम को जबलपुर कभी नहीं भूल पाएगा।
बरगी बांध की लहरों पर सैर करने निकले पर्यटकों को अंदाज़ा भी नहीं था कि जिस क्रूज पर वे सवार हैं, वह असल में एक ‘तैरता हुआ ताबूत’ है।
हाल ही में सामने आए गोपनीय दस्तावेजों ने यह साबित कर दिया है कि यह कोई प्राकृतिक आपदा या महज एक दुर्घटना नहीं थी, बल्कि मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग (MPT) के आला अधिकारियों की आपराधिक लापरवाही का नतीजा था।
गोपनीय पत्र ने खोली पोल: अफसरों को पता था ‘खतरा’ है
इस हादसे की जांच के बीच एक ऐसा गोपनीय पत्र सामने आया है जिसने विभाग में हड़कंप मचा दिया है।
मैकल रिसॉर्ट बरगी के मैनेजर ने हादसे से ठीक दो महीने पहले, यानी 01 मार्च 2026 को जबलपुर स्थित क्षेत्रीय कार्यालय को एक लिखित चेतावनी भेजी थी।
इस पत्र में स्पष्ट तौर पर कहा गया था कि बरगी बांध में चल रहे क्रूज अपनी उम्र पूरी कर चुके हैं और कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है।
लेकिन अफ़सोस, अफसरों ने इस चेतावनी को रद्दी की टोकरी में डाल दिया।

20 साल पुराना ‘कबाड़’ ढो रहा था जिंदगियां
दस्तावेजों के अनुसार, ‘मैकल सुता’ क्रूज को साल 2006 में शुरू किया गया था।
किसी भी क्रूज की एक निर्धारित कार्यक्षमता और उम्र होती है, लेकिन यह क्रूज 20 साल पुराना हो चुका था।
हैरानी की बात यह है कि इसी के साथ चलने वाला ‘रेवा क्रूज’ अपनी खराब हालत के कारण 2025 में ही बंद कर दिया गया था।
जब रेवा क्रूज के इंजन खराब हुए थे, तब हैदराबाद की एक एक्सपर्ट बोट बिल्डर कंपनी ने साफ कहा था कि इन इंजनों के स्पेयर पार्ट्स अब बाजार में नहीं मिलते और इन्हें तुरंत बदलना जरूरी है।
इसके बावजूद, विभाग ने ‘मैकल सुता’ को केवल एक इंजन के भरोसे चलाना जारी रखा।
इंजन में खराबी और कंट्रोल की समस्या
मैनेजर द्वारा भेजे गए पत्रों (क्रमांक 45, 108 और 169) में लगातार यह शिकायत की जा रही थी कि क्रूज का इंजन लोड नहीं ले पा रहा है।
स्थिति इतनी गंभीर थी कि तेज हवा चलने पर क्रूज अनियंत्रित हो जाता था।
उसे किनारे तक लाने के लिए छोटी ‘स्पीड बोट’ का सहारा लेना पड़ता था।
सोचिए, जिस क्रूज को चलाने के लिए धक्का मारना पड़ रहा हो, उसमें पर्यटकों को बिठाना किसी सुसाइड मिशन से कम नहीं था।
मैनेजर ने साफ लिखा था कि क्रूज के ‘सेल्फ’ की गरारी बार-बार चढ़ जाती थी जिससे इंजन स्टार्ट नहीं होता था।
पर्यटन विभाग ने इन तकनीकी खामियों को सुधारने के बजाय, उसे ‘जुगाड़’ से चलाने की मौन अनुमति दे दी।
30 अप्रैल को क्या हुआ था?
हादसे वाले दिन शाम करीब 5:30 बजे अचानक मौसम बदला। तेज आंधी और लहरों ने क्रूज को घेर लिया।
चूँकि क्रूज का एक इंजन पहले से ही कमजोर था, वह लहरों का मुकाबला नहीं कर सका।
ऊपर से क्रूज अपनी क्षमता से अधिक भरा हुआ था (ओवरलोडिंग)।
प्रत्यक्षदर्शियों और जांच रिपोर्ट के अनुसार, जैसे ही क्रूज डगमगाया, वहां चीख-पुकार मच गई।
सबसे शर्मनाक बात यह रही कि यात्रियों के पास लाइफ जैकेट तक नहीं थे।
जब क्रूज डूबने लगा, तब आनन-फानन में लाइफ जैकेट बांटे गए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
दिल्ली और तिरुचिरापल्ली से आए एक ही परिवार के सदस्यों सहित 13 लोगों ने जलसमाधि ले ली।
मुनाफे की भूख और सुरक्षा से समझौता
आखिर क्यों एक अनफिट क्रूज को पानी में उतारा गया? इसका सीधा जवाब है—’कमाई’।
पर्यटन सीजन के दौरान ज्यादा से ज्यादा टिकटें बेचकर राजस्व जुटाने के चक्कर में पर्यटकों की सुरक्षा को ताक पर रख दिया गया।
पर्यटन विभाग के क्षेत्रीय प्रबंधक से लेकर मुख्यालय तक के अधिकारियों को स्थिति का पता था, फिर भी किसी ने संचालन रोकने की जहमत नहीं उठाई।
जांच के घेरे में ‘बड़े साहब’
अक्सर ऐसे मामलों में ड्राइवर या निचले स्तर के कर्मचारियों को सस्पेंड कर मामला दबा दिया जाता है।
लेकिन सामने आए पत्रों ने बड़े अधिकारियों को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
सवाल यह है कि जब तीन-तीन बार चेतावनी दी गई, तो नए इंजन क्यों नहीं खरीदे गए?
क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जा रहा था?
जवाबदेही तय होना जरूरी
सरकार ने हाई लेवल कमेटी तो बना दी है, लेकिन क्या इन 13 मौतों का हिसाब उन अफसरों से लिया जाएगा जिन्होंने फाइलों पर साइन तो किए पर सुरक्षा पर ध्यान नहीं दिया?
यह हादसा सरकारी तंत्र की उस सड़ांध को दर्शाता है जहां इंसानी जान की कीमत चंद रुपयों के राजस्व से कम आंकी जाती है।
जबलपुर के लोग अब इंसाफ मांग रहे हैं—सिर्फ जांच नहीं, दोषियों को सलाखों के पीछे देखना चाहते हैं।
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