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झीरम घाटी नरसंहार में 13 साल बाद न्याय: NIA कोर्ट ने 10 दोषियों को सुनाई फांसी की सजा, 29 लोगों की हुई थी मौत

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Jhiram Ghati Naxal Attack Verdict: छत्तीसगढ़ के इतिहास के सबसे वीभत्स और खौफनाक झीरम घाटी नक्सली हमले में लगभग 13 साल लंबे इंतजार के बाद अदालत का बड़ा फैसला आ गया है।

जगदलपुर स्थित एनआईए (NIA) की विशेष अदालत ने मामले की सुनवाई पूरी करते हुए दोषी ठहराए गए सभी 10 माओवादियों को फांसी की सजा (मृत्युदंड) सुनाई है।

अदालत ने माना कि यह हमला एक बेहद क्रूर और सोची-समझी साजिश का हिस्सा था।

अदालत के इस ऐतिहासिक फैसले में कहा गया है कि मौत की सजा की पुष्टि के लिए इस आदेश को बिलासपुर हाईकोर्ट भेजा जाएगा।

इसके साथ ही, दोषियों के पास सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील करने के लिए 30 दिनों का समय है।

कैसे अंजाम दिया गया था वह खौफनाक कांड?

घटना 25 मई 2013 की है, जब बस्तर इलाके में विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस अपनी ‘परिवर्तन यात्रा’ निकाल रही थी।

शाम के वक्त जब परिवर्तन यात्रा का काफिला सुकमा से लौटते हुए दरभा क्षेत्र की झीरम घाटी से गुजर रहा था, तब घने जंगलों में घात लगाए बैठे सैकड़ों माओवादियों ने काफिले को घेर लिया।

हमले की शुरुआत एक भीषण आईईडी (IED) धमाके से की गई।

इसके तुरंत बाद नक्सलियों ने सड़क पर बड़े-बड़े पेड़ गिराकर गाड़ियों का रास्ता रोक दिया और चारों तरफ से अंधाधुंध गोलाबारी शुरू कर दी।

गोलीबारी बंद होने के बाद नक्सलियों ने नेताओं और उनके सुरक्षाकर्मियों को अलग किया और चुन-चुनकर हत्याएं कीं।

इस नरसंहार में छत्तीसगढ़ कांग्रेस की शीर्ष राजनीतिक लीडरशिप लगभग पूरी तरह खत्म हो गई। मरने वालों में प्रमुख रूप से:

* महेंद्र कर्मा: जिन्हें ‘सलवा जुड़ूम’ का संस्थापक माना जाता था और वे माओवादियों के मुख्य निशाने पर थे।

 * नंदकुमार पटेल: तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (उनके बेटे दिनेश पटेल की भी हत्या कर दी गई)।

 * विद्याचरण शुक्ल: पूर्व केंद्रीय मंत्री (हमले में गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया)।

 * अन्य नेता व जवान: उदय मुदलियार, गोपीचंद माधवानी, योगेंद्र शर्मा समेत कुल 29 लोग इस हमले में शहीद/मारे गए थे।

हथियार और बारूद लूट ले गए थे माओवादी

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की चार्जशीट के अनुसार, इस हमले के बाद माओवादियों ने केवल लोगों की जान ही नहीं ली, बल्कि मारे गए सुरक्षाकर्मियों के अत्याधुनिक हथियार भी लूट लिए।

इनमें AK-47 राइफलें, 9mm पिस्टल, सैकड़ों कारतूस और हैंड ग्रेनेड शामिल थे।

घटनास्थल से मिले अवशेषों की जांच में पाया गया कि हमले में अमोनियम नाइट्रेट और PETN जैसे बेहद घातक विस्फोटकों का प्रयोग हुआ था।

फैसले के साथ ही उठ खड़े हुए कई अनुत्तरित सवाल

भले ही कोर्ट ने 10 आरोपियों को मृत्युदंड दे दिया है, लेकिन कानूनी और राजनीतिक हलकों में इस फैसले को लेकर नए सवाल उठ रहे हैं:

1. क्या सिर्फ निचले कैडर के लोग ही जिम्मेदार थे?

वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिन 10 लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई है, वे मुख्य रूप से नक्सली संगठन के निचले कैडर (लोअर कैडर) के जमीनी कार्यकर्ता या लड़ाके हैं।

सवाल यह उठता है कि क्या इतने बड़े और सुनियोजित राजनीतिक हमले की पटकथा केवल इन 10 लोगों ने लिखी थी?

2. राजनीतिक साजिश का सच कब आएगा सामने?

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल लंबे समय से दावा करते रहे हैं कि झीरम घाटी कांड महज एक नक्सली हमला नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक गहरी राजनीतिक साजिश थी और इसके सबूत उनके पास हैं।

जब इतने बड़े स्तर पर पूरी टॉप लीडरशिप खत्म हो जाती है, तो सवाल उठता है कि काफिले की सटीक टाइमिंग और मूवमेंट की गोपनीय जानकारी माओवादियों तक कैसे पहुंची? इसका असली ‘मास्टरमाइंड’ कौन था?

3. फरार आरोपियों का क्या होगा?

इस पूरे मामले में 33 से ज्यादा आरोपी अब भी पुलिस और कानून की पहुंच से बाहर हैं।

माओवादी संगठन का शीर्ष नेता मुपल्ला लक्ष्मणा राव उर्फ ‘गणपति’ (जो घटना के समय सीपीआई-माओवादी का महासचिव था) अब भी फरार है।

वहीं, थिप्पिरी तिरुपति उर्फ ‘देवजी’ और बारसे सुक्का उर्फ ‘देवा’ जैसे शीर्ष कमांडरों ने तेलंगाना में आत्मसमर्पण तो कर दिया, लेकिन इस मामले में उन पर कार्रवाई की गति को लेकर सवाल बरकरार हैं।

झीरम घाटी का फैसला उन परिवारों के लिए एक राहत जरूर है जिन्होंने अपनों को खोया है, लेकिन जब तक इस हमले के पीछे छिपे असली मास्टरमाइंड और साजिश की हर परत सामने नहीं आती, तब तक झीरम का दर्द और इसके अनसुलझे सवाल छत्तीसगढ़ के सियासी और सामाजिक परिदृश्य में गूंजते रहेंगे।

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