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जीतू पटवारी का CM मोहन से सवाल, बोले- कर्ज में डूबे MP के ₹7,669 करोड़ गुजरात को क्यों दे दिए?

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Sardar Sarovar Dam Dispute: दिल्ली में सरदार सरोवर परियोजना को लेकर हुए चार राज्यों के समझौते पर मध्य प्रदेश में सियासत पूरी तरह गरमा गई है।

मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इस मुद्दे को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पर सीधा और बड़ा हमला बोला है।

पटवारी ने मुख्यमंत्री को खुली चुनौती देते हुए कहा, “मुख्यमंत्री जी, आप राजा हरिश्चंद्र नहीं हो कि आपकी हर बात को जनता सच मान लेगी। आपको जवाब देना होगा कि मध्य प्रदेश के हक के करोड़ों रुपए क्यों छोड़ दिए गए।”

जीतू पटवारी ने सरकार से मांग की है कि इस पूरे समझौते को लेकर एक ‘श्वेत पत्र’ (White Paper) जारी किया जाए और विधानसभा में इस पर खुलकर चर्चा कराई जाए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।

क्या है जीतू पटवारी के गंभीर आरोप?

भोपाल में अपने निवास पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए जीतू पटवारी ने कहा कि नर्मदा नदी मध्य प्रदेश की जीवनरेखा है।

जब सरदार सरोवर बांध बना, तो इसका सबसे बड़ा खामियाजा मध्य प्रदेश की जनता, आदिवासियों और किसानों को भुगतना पड़ा।

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पटवारी ने सिलसिलेवार तरीके से सरकार को घेरा:

दावे पर चुप्पी क्यों?:

पटवारी का कहना है कि बांध की वजह से मध्य प्रदेश की उपजाऊ खेती की जमीन, घने जंगल डूबे और हजारों आदिवासी परिवारों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ा।

इस भारी नुकसान के मुआवजे के तौर पर मध्य प्रदेश ने तत्कालीन गणना के आधार पर 7,669 करोड़ रुपए का दावा ठोका था। लेकिन अब जो समझौता हुआ है, उसमें इस भारी-भरकम राशि का कोई जिक्र ही नहीं है।

अधिकारियों की तैयारी और सरकार का यू-टर्न:

कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष ने एक दिलचस्प वाकया साझा करते हुए दावा किया कि जब वह दिल्ली जा रहे थे, तो उसी विमान में इस बैठक में शामिल होने वाले मध्य प्रदेश के बड़े अधिकारी भी मौजूद थे।

अधिकारियों ने खुद उन्हें बताया था कि वे मध्य प्रदेश का पक्ष मजबूती से रखने के लिए करीब 7,500 करोड़ रुपए की देनदारियों के पूरे दस्तावेज और तैयारी के साथ जा रहे हैं।

फिर अचानक दिल्ली पहुंचते ही ऐसा क्या हुआ कि मध्य प्रदेश ने अपना दावा ही छोड़ दिया?

जनता से सच छिपाने का आरोप:

पटवारी ने आरोप लगाया कि मोहन सरकार इस बात का झूठा प्रचार कर रही है कि उन्होंने गुजरात की देनदारी को कम करवाकर मध्य प्रदेश के 1,268 करोड़ रुपए बचा लिए।

जबकि हकीकत यह है कि सरकार यह नहीं बता रही कि मध्य प्रदेश का जो हजारों करोड़ का जायज हक था, उसे किसके इशारे पर और क्यों खत्म कर दिया गया।

कर्ज के दलदल में धंसता मध्य प्रदेश

जीतू पटवारी ने इस दौरान राज्य की बदहाल आर्थिक स्थिति का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया।

उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश पर पहले ही 5.61 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का कर्ज है।

सरकार के पास अपनी योजनाओं को चलाने के लिए पैसे नहीं हैं और वह लगातार नया कर्ज ले रही है।

पटवारी ने तंज कसते हुए कहा कि सरकार कर्ज का पैसा प्रदेश के विकास में लगाने के बजाय अपनी ब्रांडिंग, विज्ञापनों और बड़े-बड़े सरकारी आयोजनों में उड़ा रही है।

हाल ही में लिए गए 3,600 करोड़ रुपए के नए कर्ज का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि सरकार के पास राज्य को आगे ले जाने का कोई स्पष्ट विजन नहीं है।

आखिर क्या है सरदार सरोवर विवाद?

इस पूरे मामले को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा।

नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध को लेकर पिछले करीब 30 सालों से चार राज्यों—मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के बीच पैसों के लेन-देन को लेकर विवाद चल रहा था।

मध्य प्रदेश का पक्ष: मध्य प्रदेश का तर्क था कि बांध बनने से सबसे ज्यादा नुकसान उसकी जमीन को हुआ है।

डूब क्षेत्र (Submergence Area) की कुल 37,533 हेक्टेयर जमीन में से 55.5% हिस्सा अकेले मध्य प्रदेश का था।

इसकी वजह से शुरुआत में 178 गांव डूबे, जिनकी संख्या बाद में बढ़कर 192 हो गई। साल 2014 में जब बांध की ऊंचाई और बढ़ाई गई, तो 5,000 हेक्टेयर से ज्यादा की अतिरिक्त जमीन और जलमग्न हो गई।

इतने बड़े नुकसान, पुनर्वास (Rehabilitation) के खर्च और जंगलों के खत्म होने के बदले मध्य प्रदेश गुजरात से 7,669 करोड़ रुपए के मुआवजे की मांग कर रहा था।

गुजरात का पक्ष: दूसरी तरफ, गुजरात का कहना था कि समय के साथ इस विशाल परियोजना को बनाने की लागत बहुत ज्यादा बढ़ गई है।

इसलिए नियमों के मुताबिक, परियोजना का लाभ लेने वाले अन्य राज्यों (मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान) को भी इस बढ़ी हुई लागत का अपना-अपना हिस्सा देना चाहिए।

दिल्ली समझौते में क्या तय हुआ?

इस दशकों पुराने विवाद को सुलझाने के लिए मंगलवार को दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में एक हाई-लेवल मीटिंग हुई।

इस बैठक में चारों राज्यों के बीच ‘वन टाइम सेटलमेंट’ (One Time Settlement) यानी एकमुश्त समाधान पर सहमति बनी और समझौते पर हस्ताक्षर किए गए।

इस समझौते की मुख्य शर्तें इस प्रकार हैं:

पैसों का भुगतान: तय हुआ कि मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान तीनों राज्य मिलकर गुजरात को 550-550 करोड़ रुपए देंगे। यानी गुजरात को कुल 1,650 करोड़ रुपए मिलेंगे।

पुराने दावे खत्म: इस समझौते के तहत केंद्र सरकार की मध्यस्थता में चारों राज्यों ने एक-दूसरे पर किए गए अपने सभी पुराने वित्तीय दावों को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।

इसी बिंदु पर कांग्रेस और जीतू पटवारी ने आपत्ति जताई है कि इस “ऑल क्लीयर” समझौते के चक्कर में मध्य प्रदेश का ₹7,669 करोड़ का दावा पूरी तरह डूब गया, जिससे राज्य को भारी वित्तीय नुकसान हुआ है।

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जीतू पटवारी के सरकार से 5 सीधे सवाल:

कांग्रेस ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सामने इन पांच सवालों के जवाब मांगे हैं:

  1. मध्य प्रदेश के हक के ₹7,669 करोड़ के दावे को आखिर किस आधार पर छोड़ दिया गया?
  2. मुख्यमंत्री ने इस घाटे वाले समझौते को मंजूरी देने से पहले क्या कैबिनेट में इस पर कोई चर्चा की थी?
  3. क्या इतने बड़े फैसले से पहले विधानसभा में विपक्ष या विषय विशेषज्ञों को विश्वास में लिया गया था?
  4. चार राज्यों के बीच हुए इस समझौते की पूरी शर्तें और नियम जनता के सामने सार्वजनिक क्यों नहीं किए जा रहे हैं?
  5.  सरकार इस पूरे मामले की हकीकत सामने लाने के लिए ‘श्वेत पत्र’ कब जारी करेगी?

अब देखना यह होगा कि कांग्रेस के इन तीखे सवालों और ‘श्वेत पत्र’ की मांग पर मोहन सरकार की तरफ से क्या सफाई या जवाब आता है।

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