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कैश कांड में पूर्व जस्टिस यशवंत वर्मा पर तीनों आरोप साबित: नोटों से भरी बोरी पर नहीं दे पाए जवाब, सबूत मिटाने में भी पाए गए दोषी

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Justice Yashwant Verma Cash Case: साल 2025 के सबसे चर्चित मामलों में से एक ‘कैश कांड’ में पूर्व जस्टिस यशवंत वर्मा की मुश्किलें अब बढ़ चुकी हैं।

इस पूरे मामले की पड़ताल कर रही संसदीय जांच समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट लोकसभा के पटल पर रख दी है।

समिति ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में साफ कर दिया है कि पूर्व जज पर लगाए गए सभी तीनों आरोप पूरी तरह सही और साबित पाए गए हैं।

जांच समिति के मुताबिक, पूर्व न्यायाधीश अपने ही सरकारी बंगले में पाई गई भारी-भरकम नकदी, उसके स्रोत और उसके मालिकाना हक को लेकर कोई भी तर्कसंगत या संतोषजनक जवाब नहीं दे सके।

इसके अलावा घटना के बाद साक्ष्यों को सुरक्षित रखने में बेहद गंभीर लापरवाही बरती गई और रात के अंधेरे में सबूतों से छेड़छाड़ की गई।

क्या था पूरा मामला?

यह पूरा विवाद 14 अगस्त 2025 का है, जब दिल्ली स्थित जज के सरकारी आवास के स्टोर रूम में अचानक आग लग गई थी।

आग बुझाने पहुंचे अग्निशमन दल और पुलिस अधिकारियों ने वहां जो नजारा देखा, उसने सभी को हैरान कर दिया।

स्टोर रूम के अंदर भारतीय मुद्रा के 500 रुपये के नोटों से भरी हुई बोरियां और अधजले बंडल बिखरे पड़े थे।

मामला सामने आने के बाद संसद ने इस पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया था।

आइए समझते हैं कि जांच समिति ने पूर्व जस्टिस पर लगे तीनों प्रमुख आरोपों पर अपनी क्या राय दी है:

आरोप 1: सरकारी बंगले में मिला बेहिसाब कैश का अंबार

जांच समिति की पड़ताल में यह तथ्य सामने आया कि आग लगने के समय स्टोर रूम में 500-500 रुपये के नोटों के ढेरों बंडल मौजूद थे।

मौके पर पहुंचे दिल्ली फायर सर्विस के कर्मचारी अंकित सहगल ने समिति को दिए बयान में बताया कि स्टोर रूम के अंदर 500 रुपये के नोटों के बंडल लगभग 7 से 8 फीट के दायरे में फैले हुए थे।

वहीं, मामले की जांच करने पहुंचे पुलिस अधिकारी रूपचंद से जब पूछा गया कि क्या वहां मौजूद रकम ₹5 लाख से अधिक थी, तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि 5 लाख रुपये की बात करना बहुत छोटी बात होगी, वहां उससे कहीं अधिक बड़ी मात्रा में नकदी बिखरी हुई थी।

हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संदिग्ध पहलू यह रहा कि उस समय पुलिस या प्रशासन द्वारा नोटों की औपचारिक जब्ती नहीं की गई, न ही उनकी गिनती हुई और न ही कोई सैंपल सुरक्षित रखा गया।

इस लापरवाही के कारण समिति यह तो तय नहीं कर पाई कि वहां कुल कितने करोड़ रुपये थे, लेकिन बेहिसाब कैश की मौजूदगी का आरोप पूरी तरह साबित माना गया।

आरोप 2: आग बुझते ही रातों-रात मिटा दिए गए सबूत

समिति ने अपनी रिपोर्ट में इस बात पर गहरा असंतोष व्यक्त किया कि घटना के तुरंत बाद उस स्टोर रूम को सील क्यों नहीं किया गया।

सुरक्षाकर्मियों के बयानों से पता चला है कि आग बुझने के बाद देर रात करीब 3 बजे पूर्व जस्टिस वर्मा का अमला और स्टाफ उस कमरे की सफाई में जुटा हुआ था।

अगली सुबह होने तक कमरे का सारा जला और अधजला सामान बाहर फेंक दिया गया और पूरे कमरे को धोकर साफ कर दिया गया।

कमरे में मिले अधजले नोटों को सुरक्षित करने के बजाय गायब कर दिया गया, जो बाद में जांच अधिकारियों को कहीं नहीं मिले।

समिति ने माना कि महत्वपूर्ण साक्ष्यों को नष्ट करने और उनसे छेड़छाड़ करने का आरोप पूरी तरह सच है।

आरोप 3: जांच में टालमटोल और गुमराह करने वाला रवैया

शुरुआती पूछताछ के दौरान पूर्व जस्टिस वर्मा ने दावा किया था कि उन्हें कमरे में रखे किसी भी कैश के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है।

लेकिन बाद में उन्होंने अपना रुख बदलते हुए कहा कि यह उनके खिलाफ कोई बड़ी साजिश हो सकती है या फिर वहां रखा कैश नकली हो सकता है।

हालांकि, जांच समिति ने पाया कि पूर्व जज अपने इन दावों के समर्थन में न तो कोई एफआईआर दर्ज करा सके और न ही कोई लिखित शिकायत दर्ज कराई।

हैरानी की बात यह भी रही कि उन्होंने अपना पक्ष रखने के लिए खुद समिति के सामने गवाही नहीं दी और न ही अपने परिवार या घरेलू स्टाफ में से किसी को गवाह के तौर पर पेश किया।

समिति ने उनके इस रवैये को जांच को भटकाने और गुमराह करने की कोशिश माना।

दबाव के बीच दिया था पद से इस्तीफा

जांच की आंच तेज होते देख, जस्टिस यशवंत वर्मा ने इसी साल 9 अप्रैल 2026 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद से अपना त्यागपत्र सौंप दिया था।

अपने इस्तीफे में उन्होंने लिखा था कि वे राष्ट्रपति कार्यालय को उन परिस्थितियों से परेशान नहीं करना चाहते जिनकी वजह से उन्हें यह पत्र लिखना पड़ रहा है, लेकिन भारी मन से वे अपने पद से इस्तीफा दे रहे हैं।

संसदीय जांच समिति की इस रिपोर्ट के बाद अब न्यायपालिका की साख और जजों की जवाबदेही को लेकर एक बार फिर देश में नई बहस छिड़ गई है।

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