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केन-बेतवा प्रोजेक्ट पर महासंग्राम: ICU में 17वें दिन भी भूख हड़ताल पर अमित भटनागर, 22 गांवों में महिलाओं का ‘चूल्हाबंदी’ आंदोलन शुरू

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Ken Betwa Link Project Protest: मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल में महत्वाकांक्षी ‘केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट’ को लेकर शुरू हुआ असंतोष का अब एक बड़े जनआंदोलन का रूप ले चुका है।

छतरपुर जिले के प्रभावित इलाकों में विस्थापन और जमीन छिनने के डर से ग्रामीण आर-पार की लड़ाई के मूड में आ गए हैं।

आंदोलन का नेतृत्व कर रहे जय किसान संगठन के प्रमुख अमित भटनागर का आमरण अनशन लगातार 17वें दिन भी जारी रहा।

स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण उन्हें जिला अस्पताल के आईसीयू (ICU) में भर्ती कराया गया है, लेकिन इसके बावजूद उनके तेवर में कोई कमी नहीं आई है।

दूसरी ओर, प्रशासन द्वारा आंदोलन को कुचलने की कोशिशों से ग्रामीण भड़क उठे हैं और अब 22 प्रभावित गांवों की महिलाओं ने एक अनूठा ‘चूल्हाबंदी’ आंदोलन शुरू कर दिया है।

चिता आंदोलन’ पर पुलिसिया कार्रवाई

इस पूरे घटनाक्रम में मोड़ 20 जुलाई की सुबह आया, जब कूपी गांव के पास बराना नदी घाट पर ग्रामीणों का अनोखा ‘चिता आंदोलन’ चल रहा था।

वहां प्रदर्शनकारी नदी किनारे चिता सजाकर प्रशासनिक अनदेखी का विरोध कर रहे थे।

आरोप है कि भारी पुलिस बल और प्रशासनिक अधिकारियों के दलबल ने मौके पर पहुंचकर इस प्रदर्शन को जबरन खत्म करा दिया और कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया।

प्रशासन ने दलील दी कि क्षेत्र में लगातार हो रही भारी बारिश और प्रदर्शनकारियों के गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए सुरक्षा के लिहाज से यह कदम उठाना पड़ा।

चूल्हाबंदी आंदोलन’ शुरू 

हालांकि, पुलिस और प्रशासन की इस कार्रवाई का उल्टा असर हुआ।

ग्रामीणों का गुस्सा दबा नहीं, बल्कि और भड़क गया।

कूपी गांव से शुरू हुई यह चिंगारी देखते ही देखते 22 प्रभावित गांवों तक फैल गई।

आंदोलन को नया जीवन देने के लिए इन गांवों की महिलाओं ने मोर्चा संभाला और ‘चूल्हाबंदी आंदोलन’ का ऐलान कर दिया।

कैसे काम करता है ‘चूल्हाबंदी’ आंदोलन?

‘चूल्हाबंदी’ का मतलब है कि गांवों की रसोइयों में आग नहीं जलेगी।

इस सत्याग्रह के तहत रणनीति बनाई गई है कि रोज अलग-अलग गांवों की 10 से 20 महिलाएं अपने-अपने घरों में चूल्हा नहीं जलाएंगी और खुद निर्जला या निराहार उपवास रखेंगी।

हालांकि, मानवीय संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए छोटे बच्चों, बुजुर्गों, बीमार व्यक्तियों और गर्भवती महिलाओं को इस उपवास से पूरी तरह दूर रखा गया है।

महिलाओं का कहना है कि अगर सरकार उनकी जमीन, जल और जंगल छीनने पर आमादा है, तो वे भी चुपचाप घुट-घुट कर नहीं मरेंगी, बल्कि अहिंसक तरीके से अपनी आवाज बुलंद करेंगी।

ICU में अनशन और 24 घंटे पुलिस की सख्त पहरेदारी

जिला अस्पताल के आईसीयू में भर्ती अमित भटनागर की स्थिति नाजुक लेकिन स्थिर बनी हुई है।

उनके साथी पवन पटेल ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि प्रशासन अमित भटनागर को पूरी तरह से अलग-थलग करने की कोशिश कर रहा है।

आईसीयू के बाहर 24 घंटे भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।

मीडियाकर्मियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और उनके नजदीकी समर्थकों तक को उनसे मिलने की इजाजत नहीं दी जा रही है।

समर्थकों का कहना है कि अमित भटनागर का स्वास्थ्य कैसा है, इसकी कोई पारदर्शी जानकारी बाहर नहीं आने दी जा रही है, जिससे परिजनों और गांव वालों में गहरी नाराजगी और आशंका बनी हुई है।

स्वास्थ्य विभाग का क्या कहना है?

अमित भटनागर के स्वास्थ्य को लेकर छतरपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. आर.के. गुप्ता ने स्थिति स्पष्ट की।

उन्होंने बताया कि अमित भटनागर को लो ब्लड प्रेशर (कम बीपी) की समस्या है, जिसके कारण उन्हें लगातार डॉक्टरों की गहन निगरानी में रखा गया है।

CMHO के अनुसार, अमित मुंह से कोई ठोस भोजन (ओरल फूड) या दवाइयां लेने से मना कर रहे हैं।

वे केवल पानी ले रहे हैं और डॉक्टरों की टीम उन्हें आईवी फ्लूइड्स (ड्रिप) के जरिए जरूरी पोषक तत्व और चिकित्सा सहायता दे रही है।

फिलहाल उनका ब्लड प्रेशर और अन्य वाइटल्स नियंत्रण में बताए जा रहे हैं।

फर्जी ग्रामसभा के सनसनीखेज दस्तावेज सार्वजनिक करने का दावा

इस पूरे आंदोलन की जड़ में सिर्फ विस्थापन ही नहीं, बल्कि प्रक्रियागत अनियमितताएं और भ्रष्टाचार के आरोप भी हैं।

अनशन पर बैठने से ठीक पहले अमित भटनागर ने केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट से जुड़े कई दस्तावेज सार्वजनिक किए थे।

उनका दावा है कि छतरपुर जिले के आधिकारिक सरकारी रिकॉर्ड्स में कई ग्रामसभाओं की फर्जी अनापत्ति (NOC) दिखाई गई है।

भटनागर का आरोप है कि जिन गांवों की जमीनें डुबोई जा रही हैं, वहां असल में कोई ग्रामसभा हुई ही नहीं, बल्कि कागजों पर फर्जी तरीके से ग्रामीणों की सहमति दिखा दी गई।

उन्होंने छतरपुर कलेक्टर से मांग की है कि प्रशासन इस मामले पर अपना रुख साफ करे और सार्वजनिक रूप से स्पष्टीकरण दे।

भटनागर का कहना है कि उनकी लड़ाई किसी व्यक्तिगत अधिकारी या नेता से नहीं, बल्कि विस्थापितों के मानवाधिकारों, संवैधानिक प्रक्रियाओं और पारदर्शिता को बचाने के लिए है।

कार्रवाई के बाद कलेक्टर और एसपी छुट्टी पर, उठ रहे सवाल

कूपी गांव में प्रदर्शनकारियों पर हुई कार्रवाई के बाद प्रशासनिक हलकों में भी हड़कंप मचा हुआ है।

खबर है कि 20 जुलाई की कार्रवाई के तुरंत बाद छतरपुर के कलेक्टर पार्थ जैसवाल सोमवार से अचानक अवकाश (छुट्टी) पर चले गए।

वहीं, जिले के पुलिस कप्तान (SP) भी कार्रवाई के बाद छुट्टी पर चले गए थे, जो बुधवार को वापस लौटे हैं।

इस तरह से शीर्ष अधिकारियों का अचानक छुट्टी पर चले जाना स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों के गले नहीं उतर रहा है।

लोग सवाल उठा रहे हैं कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर प्रशासन जवाबदेही से क्यों भाग रहा है?

आंदोलन को मिला राष्ट्रीय स्तर के सामाजिक कार्यकर्ताओं का समर्थन

अमित भटनागर के लगातार गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए देश के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ताओं और किसान नेताओं ने चिंता जताई है।

नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर, प्रफुल्ला समांतरा, सौम्या दत्ता, इंद्रजीत सिंह, अशोक चौधरी, विश्वनाथ तिर्की, कैलाश मीणा, नीलम अहलूवालिया और क्लाइमेट एक्टिविस्ट लोकेश भिवानी समेत कई प्रमुख हस्तियों ने वीडियो संदेश और ई-मेल भेजकर भटनागर से अपना आमरण अनशन समाप्त करने की अपील की है।

उनका कहना है कि जनहित की इस लड़ाई के लिए अमित भटनागर का जीवित और स्वस्थ रहना बेहद जरूरी है।

वहीं दूसरी ओर, इस मुद्दे ने राजनीतिक तूल भी पकड़ लिया है।

आदिवासी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रामू टेकाम ने इस आंदोलन को अपना खुला समर्थन देने का ऐलान किया है।

इससे केन-बेतवा प्रोजेक्ट से प्रभावित आदिवासियों और ग्रामीणों की आवाज अब भोपाल और दिल्ली के सियासी गलियारों तक गूंजने लगी है।

कुलमिलाकर, केन-बेतवा लिंक परियोजना को भले ही कागजों पर बुंदेलखंड के विकास की जीवनरेखा बताया जा रहा हो, लेकिन जमीन पर विस्थापन, पारदर्शिता की कमी और फर्जीवाड़े के आरोपों ने इसे विवादों के भंवर में ला खड़ा किया है।

एक तरफ ICU में जिंदगी और मौत से जूझते अमित भटनागर हैं, तो दूसरी तरफ रसोइयों में चूल्हा न जलाकर अपने हक की लड़ाई लड़तीं 22 गांवों की महिलाएं।

अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासनिक अधिकारी छुट्टी से लौटने के बाद संवाद का रास्ता चुनते हैं या विरोध की यह आग और विकराल रूप धारण करेगी।

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