Nalkheda Baglamukhi Mandir: मध्य प्रदेश के आगर-मालवा जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध मां बगलामुखी मंदिर अपनी तांत्रिक शक्तियों और धार्मिक आस्था के लिए पहचाना जाता है।
हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर रील और वीडियो बनाने के बढ़ते चलन के कारण मंदिर की पवित्रता और ध्यान लगाने वाले भक्तों को असुविधा हो रही थी।
इसी को देखते हुए प्रशासन ने एक बड़ा कदम उठाया है।

नियम तोड़ने पर होगी कड़ी कार्रवाई
तहसीलदार प्रियंक श्रीवास्तव द्वारा जारी नए निर्देशों के अनुसार, अब मंदिर के गर्भगृह में फोटो खींचना या वीडियो बनाना पूरी तरह प्रतिबंधित है।
अक्सर देखा जाता था कि लोग माता की मूर्ति के सामने खड़े होकर रील बनाने लगते थे, जिससे न केवल व्यवस्था बिगड़ती थी बल्कि मंदिर की मर्यादा भी आहत होती थी।
अब अगर कोई भी श्रद्धालु बिना अनुमति के कैमरा या मोबाइल का इस्तेमाल गर्भगृह के भीतर करता पाया गया, तो उस पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

केवल अनुमति पर ही शूटिंग संभव
प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि अगर किसी विशेष परिस्थिति में या धार्मिक कार्यक्रम के प्रचार के लिए शूटिंग की आवश्यकता होती है, तो इसके लिए मंदिर प्रबंधन समिति से लिखित अनुमति लेना अनिवार्य होगा।
यह अनुमति भी केवल उन्हीं लोगों को मिलेगी जो मंदिर के दिशा-निर्देशों का पालन करेंगे।
आम श्रद्धालुओं के लिए मोबाइल जेब में रखना ही एकमात्र विकल्प होगा।

मां बगलामुखी: क्यों कहते हैं इन्हें पीतांबरा?
आज (24 अप्रैल) पूरे देश में मां बगलामुखी जयंती मनाई जा रही है।
हिंदू धर्म की दस महाविद्याओं में माता का स्थान आठवां है।
इन्हें ‘पीतांबरा’ के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि माता को पीला रंग अत्यंत प्रिय है।
इनके वस्त्र, श्रृंगार, नैवेद्य और यहां तक कि पूजा में उपयोग होने वाले फूल भी पीले रंग के ही होते हैं।

मान्यता है कि माता का यह स्वरूप ब्रह्मांड की सबसे शक्तिशाली ऊर्जाओं में से एक है, जो किसी भी गतिमान वस्तु को ‘स्तंभित’ (रोकने) की शक्ति रखती है।
उत्पत्ति की कथा: जब भगवान विष्णु ने किया था तप
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सतयुग में एक समय ऐसा आया जब पूरे ब्रह्मांड में विनाशकारी तूफान उठा।
यह तूफान इतना भयानक था कि सृष्टि का अंत निकट दिखाई देने लगा।
समस्त देवता और चराचर जगत भयभीत हो गया। तब भगवान विष्णु ने सौराष्ट्र क्षेत्र (गुजरात) में स्थित ‘हरिद्रा सरोवर’ के तट पर कठोर तपस्या की।

विष्णु जी की भक्ति से प्रसन्न होकर वैशाख शुक्ल अष्टमी के दिन जल के बीच से देवी बगलामुखी प्रकट हुईं।
माता ने अपनी अलौकिक शक्ति से उस विनाशकारी तूफान को तुरंत रोक दिया और सृष्टि को नष्ट होने से बचा लिया।
तभी से माता को ‘स्तंभन’ की देवी कहा गया।
माता की पूजा का मुख्य उद्देश्य शत्रुओं की बुद्धि का स्तंभन करना और भक्तों को संकटों से उबारना है।

भारत के तीन सबसे जागृत सिद्धपीठ
मां बगलामुखी के भारत में तीन प्रमुख केंद्र हैं, जहां की गई साधना कभी खाली नहीं जाती:
1. नलखेड़ा (मध्य प्रदेश):
लखुंदर नदी के किनारे स्थित यह मंदिर महाभारत काल का माना जाता है।
कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने स्वयं पांडवों को यहां पूजा करने की सलाह दी थी ताकि वे कौरवों पर विजय प्राप्त कर सकें। यहाँ की मूर्ति स्वयंभू है।
2. पीतांबरा पीठ, दतिया (मध्य प्रदेश)
इसे ‘सत्ता की देवी’ का दरबार कहा जाता है।
1935 में स्वामीजी द्वारा स्थापित इस पीठ का राजनीतिक गलियारों में बहुत महत्व है।
यहाँ माता के साथ धूमावती देवी भी विराजमान हैं।
3. बनखंडी (हिमाचल प्रदेश):
कांगड़ा जिले में स्थित यह मंदिर एकांत और शांति का केंद्र है।
यहाँ विशेष रूप से कानूनी विवादों और अदालती मामलों में जीत के लिए ‘दीपक’ जलाने की परंपरा है।

शत्रु बाधा और कोर्ट-कचहरी में अचूक फल
मां बगलामुखी की साधना विशेष रूप से उन लोगों के लिए रामबाण मानी जाती है जो कानूनी पचड़ों, झूठे आरोपों या गुप्त शत्रुओं से परेशान हैं।
माता को वाणी की अधिष्ठात्री भी माना जाता है; वे शत्रुओं की जुबान और बुद्धि को बांध देती हैं ताकि वे भक्त का अहित न कर सकें।
आज के दौर में भी राजनीति, खेल और व्यापार जगत के दिग्गज गुप्त रूप से माता के अनुष्ठान करवाते हैं।
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