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भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर में आयुष्मान योजना के नियम बदले, अब निजी अस्पतालों में NABH अनिवार्य

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Ayushman Yojana MP New Rules: मध्य प्रदेश सरकार ने आयुष्मान भारत योजना के तहत इलाज कराने वाले मरीजों के लिए एक बड़ा और कड़ा फैसला लिया है।

अब राज्य के चार सबसे बड़े शहरों भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर में केवल वही निजी अस्पताल आयुष्मान कार्ड पर इलाज कर पाएंगे, जिनके पास गुणवत्ता का प्रमाण यानी NABH (National Board of Hospital and Healthcare Accreditation) सर्टिफिकेट होगा।

1 अप्रैल 2026 से यह नियम सख्ती से लागू कर दिया जाएगा।

इस फैसले का सीधा असर इन चार शहरों के 395 अस्पतालों पर पड़ने वाला है।

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सरकार का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आयुष्मान योजना के नाम पर केवल खानापूर्ति न हो, बल्कि मरीजों को प्राइवेट अस्पतालों में वर्ल्ड क्लास सुविधाएं और सुरक्षित इलाज मिले।

क्या है नया नियम और किन शहरों पर होगा असर?

राज्य कार्यकारिणी समिति की बैठक में लिए गए निर्णय के अनुसार, अब ‘बिना सर्टिफिकेट, नो एंट्री’ वाली स्थिति है।

भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर में जो अस्पताल अभी तक बिना किसी मान्यता के चल रहे थे, उन्हें अब योजना से बाहर का रास्ता देखना पड़ सकता है।

सरकार ने अस्पतालों को दो श्रेणियों में बांटा है:

  1. फुल NABH वाले अस्पताल: इन्हें सीधे योजना में शामिल (Empanel) किया जाएगा।
  2. एंट्री लेवल NABH वाले अस्पताल: इनका पहले निरीक्षण होगा, फिर इन्हें शामिल किया जाएगा।

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एंट्री लेवल बनाम फुल NABH: क्या है फर्क?

आम जनता के मन में सवाल हो सकता है कि ये सर्टिफिकेट क्या बला हैं? सरल भाषा में कहें तो:

  • एंट्री लेवल NABH: यह एक तरह का ‘स्टार्टर पैक’ है। इसमें करीब 50 मानक होते हैं। यह उन अस्पतालों को मिलता है जो अभी अपनी क्वालिटी सुधारना शुरू कर रहे हैं। इसकी मान्यता 2 साल की होती है।

  • फुल NABH: यह टॉप क्वालिटी का सर्टिफिकेट है। इसमें 100 से ज्यादा कड़े मानक और 600 से ज्यादा चेकपॉइंट्स होते हैं। यहां साफ-सफाई, ऑपरेशन की तकनीक, स्टाफ की ट्रेनिंग और मरीज की सुरक्षा को बहुत बारीकी से परखा जाता है।

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अस्पतालों को क्या फायदा होगा?

सरकार ने इस कड़वे नियम के साथ एक मीठा ऑफर भी दिया है। जो अस्पताल अपनी क्वालिटी सुधारेंगे, उन्हें ज्यादा पैसे मिलेंगे:

  • फुल NABH अस्पतालों को: आयुष्मान के तय रेट से 15% ज्यादा भुगतान (115% क्लेम) मिलेगा।

  • एंट्री लेवल अस्पतालों को: तय रेट से 10% ज्यादा भुगतान मिलेगा।

नर्सिंग होम एसोसिएशन और सरकार के बीच समझौता

शुरुआत में सरकार चाहती थी कि केवल ‘फुल NABH’ वाले अस्पताल ही काम करें।

लेकिन छोटे और मध्यम दर्जे के अस्पतालों ने चिंता जताई कि वे इतना भारी खर्चा और कड़े नियम तुरंत नहीं मान पाएंगे।

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इसके बाद नर्सिंग होम एसोसिएशन की मांग पर सरकार ने बीच का रास्ता निकाला।

अब एंट्री लेवल सर्टिफिकेट वाले अस्पताल भी काम कर सकते हैं, लेकिन उन्हें 2 साल के भीतर खुद को ‘फुल NABH’ लेवल पर अपग्रेड करना होगा।

अगर वे ऐसा नहीं करते, तो उनकी छुट्टी कर दी जाएगी।

आंकड़ों की जुबानी: चुनौती बड़ी है

इन चार बड़े शहरों में कुल 395 अस्पताल आयुष्मान योजना से जुड़े हैं।

चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से केवल 59 अस्पतालों के पास ही ‘फुल NABH’ सर्टिफिकेट है। वहीं, 212 अस्पताल एंट्री लेवल पर हैं।

बाकी अस्पतालों पर अब खुद को बचाने के लिए जल्द से जल्द मानकों को पूरा करने का भारी दबाव है।

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सिस्टम होगा ‘फेसलेस’ और पारदर्शी

आयुष्मान भारत के सीईओ डॉ. योगेश भारसट के अनुसार, अब मरीजों का फीडबैक पोर्टल पब्लिक किया जाएगा।

यानी जनता देख सकेगी कि किस अस्पताल की रेटिंग कैसी है।

साथ ही, क्लेम की प्रक्रिया को भी ऑटोमैटिक और ‘फेसलेस’ बनाया जा रहा है, ताकि 10 मिनट के भीतर इलाज की मंजूरी मिल सके।

विपक्ष की चिंता

हालांकि, पूर्व मंत्री जयवर्धन सिंह ने इस पर चिंता जताई है।

उनका कहना है कि अचानक इतने सारे अस्पतालों को बाहर करने से स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा सकती है और मरीजों को भटकना पड़ सकता है।

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