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MP में अब ‘2 बच्चों’ की टेंशन खत्म: तीसरी संतान पर नहीं जाएगी सरकारी नौकरी, CM ने दी बड़ी राहत

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

MP Government Job Rules: मध्य प्रदेश के सरकारी गलियारों में इन दिनों एक ही चर्चा है— ‘दो बच्चों वाले नियम’ की विदाई।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एक ऐसा फैसला लिया है, जिससे प्रदेश के हजारों कर्मचारियों के सिर से बर्खास्तगी की तलवार हट गई है।

अब मध्य प्रदेश में तीन बच्चे होने पर किसी भी सरकारी कर्मचारी को नौकरी से नहीं निकाला जा सकेगा।

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क्या था वो नियम?

आज से करीब 25 साल पहले, साल 2001 में तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार ने एक नियम लागू किया था।

इसके तहत सिविल सेवा नियम 1961 में बदलाव किया गया था।

नियम यह था कि 26 जनवरी 2001 के बाद जिस भी सरकारी कर्मचारी की तीसरी संतान होगी, वह सेवा के लिए अयोग्य माना जाएगा।

यानी, अगर किसी के दो बच्चे पहले से हैं और तीसरा बच्चा होता है, तो उसे अपनी सरकारी नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता था।

यह नियम नई भर्तियों पर भी लागू था, जिससे कई योग्य उम्मीदवार परीक्षा देने से वंचित रह जाते थे।

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क्यों बदला जा रहा है यह नियम?

समय के साथ इस नियम की प्रासंगिकता पर सवाल उठने लगे थे।

इसे न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन माना गया, बल्कि सामाजिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी इस पर चर्चा शुरू हुई।

हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने जनसंख्या संतुलन पर जोर देते हुए कहा था कि समाज के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए प्रति परिवार तीन बच्चों का औसत जरूरी है।

उन्होंने तर्क देते हुए बताया कि 2.1 की प्रजनन दर से कम होने पर समाज धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच जाता है।

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इसी वैचारिक बदलाव और कर्मचारियों की मांग को देखते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने इस पाबंदी को हटाने का मन बनाया है।

किसे मिलेगा फायदा?

इस फैसले का सबसे बड़ा असर प्रदेश के शिक्षा विभाग पर पड़ेगा।

अकेले स्कूल शिक्षा विभाग में लगभग 30,000 ऐसे शिक्षक हैं जिनके दो से ज्यादा बच्चे हैं और वे डर-डर कर नौकरी कर रहे थे।

इसके अलावा उच्च शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग में भी हजारों मामले लंबित हैं।

सबसे बड़ी राहत उन लोगों के लिए है जिनके मामले कोर्ट में चल रहे हैं।

सीएमओ के प्रमुख सचिव नीरज मंडलोई के अनुसार, मुख्यमंत्री की मंजूरी के बाद अब यह प्रस्ताव कैबिनेट में जाएगा।

कैबिनेट यह तय करेगी कि जिन कर्मचारियों को पहले बर्खास्त किया जा चुका है या जिनके प्रमोशन रुके हुए हैं, उनके साथ क्या किया जाए। उम्मीद है कि उन सभी को न्याय मिलेगा।

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नियम का डर 

इस नियम का डर इतना ज्यादा था कि लोग अमानवीय कदम उठाने पर मजबूर हो जाते थे।

पिछले साल छिंदवाड़ा से एक दिल दहला देने वाली खबर आई थी।

वहां के एक शिक्षक बबलू डांडोलिया के पहले से तीन बच्चे थे। जब चौथी संतान हुई, तो नौकरी जाने के डर से उन्होंने नवजात को जंगल में पत्थरों के नीचे दबा दिया।

खुशकिस्मती से बच्चा जीवित मिल गया, लेकिन इस घटना ने समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया कि एक नियम इंसान को कितना मजबूर कर सकता है।

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अन्य राज्यों की राह पर मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश ऐसा करने वाला पहला राज्य नहीं है।

ससे पहले राजस्थान में वसुंधरा राजे सरकार और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह सरकार ने इस पाबंदी को खत्म कर दिया था।

अब मध्य प्रदेश भी इसी सूची में शामिल होने जा रहा है, जिससे न केवल वर्तमान कर्मचारियों को सुरक्षा मिलेगी, बल्कि नई भर्तियों में भी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी

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