MP govt medicine tracking system: मध्य प्रदेश के सरकारी अस्पतालों से अक्सर दवाइयां न मिलने या दवाओं की क्वालिटी खराब होने की शिकायतें आती रहती हैं। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।
मध्य प्रदेश सरकार सरकारी अस्पतालों में दवाओं के वितरण (डिस्ट्रीब्यूशन) को लेकर एक बेहद सख्त और नई व्यवस्था लागू करने जा रही है।
इस नई व्यवस्था के तहत सरकार की नजर दवाओं की खरीदी से लेकर, अस्पताल के काउंटर से मरीज के हाथ में पहुंचने वाली आखिरी गोली तक पर रहेगी।
यानी अब हर एक दवाई को ट्रैक किया जाएगा।
आखिर क्यों पड़ी इस नई व्यवस्था की जरूरत?
दरअसल, हाल ही में राज्य में एक बड़ा और चौंकाने वाला मामला सामने आया था।
सरकारी सप्लाई की जांच में कफ सिरप सहित करीब 27 दवाइयां अमानक (घटिया क्वालिटी की) पाई गईं।
सबसे बड़ी दिक्कत यह रही कि जब तक इन दवाओं की लैब रिपोर्ट आई और गड़बड़ी का पता चला, तब तक ये दवाइयां बहुत से मरीजों को बांटी जा चुकी थीं।
इस गंभीर लापरवाही से सबक लेते हुए सरकार अब पूरे सिस्टम को पूरी तरह से ऑनलाइन और ‘एंड-टू-एंड’ इंटीग्रेट (शुरुआत से अंत तक आपस में जोड़ना) करने जा रही है, ताकि भविष्य में मरीजों की सेहत के साथ ऐसा खिलवाड़ न हो।
डिप्टी सीएम की दो टूक: पहले टेस्टिंग, फिर बांटना
इस नए सिस्टम को लेकर मंगलवार को स्वास्थ्य विभाग के बड़े अधिकारियों ने उप मुख्यमंत्री (डिप्टी सीएम) राजेंद्र शुक्ल के सामने एक प्रजेंटेशन दिया।
नई व्यवस्था को देखने के बाद डिप्टी सीएम ने साफ शब्दों में निर्देश दिए कि दवाओं की टेस्टिंग में बिल्कुल भी देरी नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि जब तक कोई दवा लैब टेस्ट में 100% सही साबित न हो जाए, तब तक उसे अस्पतालों में मरीजों को न बांटा जाए।
इसके साथ ही उन्होंने अधिकारियों को ताकीद की कि अस्पतालों में दवाओं का स्टॉक हमेशा पर्याप्त होना चाहिए, ताकि मरीजों को खाली हाथ न लौटना पड़े।
नई व्यवस्था में कैसे काम करेगी सप्लाई चेन?
स्वास्थ्य आयुक्त धनराजू एस के मुताबिक, अब दवाओं की मांग और सप्लाई पर नजर रखने के लिए आधुनिक तकनीक (सॉफ्टवेयर) का इस्तेमाल होगा।
* सेंट्रलाइज्ड खरीदी: ‘मध्य प्रदेश पब्लिक हेल्थ सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड’ सीधे कंपनियों से दवाएं खरीदेगा।
* सीधे वेयरहाउस: कंपनियां दवाओं को सीधे सरकारी वेयरहाउस (गोदामों) में पहुंचाएंगी।
* लैब टेस्ट अनिवार्य: वेयरहाउस में आते ही दवाओं के सैंपल लिए जाएंगे और उन्हें एनएबीएल (NABL) से मान्यता प्राप्त लैब में जांच के लिए भेजा जाएगा।
* अस्पताल में एंट्री: जब दवा टेस्ट में पास हो जाएगी, तभी उसे अस्पतालों में भेजा जाएगा। जैसे ही डॉक्टर की पर्ची देखकर मरीज को दवा दी जाएगी, उसकी जानकारी तुरंत कंप्यूटर या ऑनलाइन सिस्टम में दर्ज हो जाएगी।
मौजूदा सिस्टम की कमियां और बदलाव
फिलहाल की व्यवस्था में हेल्थ कॉर्पोरेशन सिर्फ दवाओं के रेट तय करता है। इसके बाद जिलों के सीएमएचओ (CMHO) और सिविल सर्जन अपनी जरूरत के हिसाब से ऑर्डर देते हैं।
इस पुरानी कागजी और सुस्त प्रक्रिया के कारण कंपनियों से अस्पतालों तक दवाएं पहुंचने में 45 से 60 दिन यानी करीब दो महीने का समय लग जाता था।
इस देरी की वजह से अस्पतालों में अक्सर दवाइयां खत्म हो जाती थीं।
इसके अलावा, अभी जिला स्तर पर बने गोदामों में दवाओं को रखने के सही इंतजाम नहीं हैं।
दवाएं बेतरतीब ढंग से रखी रहती हैं, जिससे वे वक्त से पहले खराब या एक्सपायर हो जाती हैं।
अब इस समस्या को खत्म करने के लिए मध्य प्रदेश के सभी संभागीय मुख्यालयों पर कुल 10 बड़े और आधुनिक (हाईटेक) वेयरहाउस बनाए जा रहे हैं।
इन वेयरहाउसों में दवाओं को सुरक्षित और सही तापमान में रखने के पुख्ता इंतजाम होंगे।
आम जनता और मरीजों को क्या होगा फायदा?
इस नई और पारदर्शी व्यवस्था से सबसे बड़ा फायदा गरीब मरीजों को होगा:
* अस्पतालों में जरूरी दवाइयों की कभी किल्लत (कमी) नहीं होगी।
* स्टॉक खत्म होने से पहले ही सिस्टम अलर्ट भेज देगा, जिससे नई दवाएं तुरंत आ जाएंगी।
* दवाएं सुरक्षित माहौल में रहेंगी, जिससे उनकी ताकत और असर बना रहेगा।
* सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मरीजों को पूरी तरह से सुरक्षित और जांची-परखी दवाएं ही मिलेंगी, जिससे नकली या अमानक दवाओं का खतरा हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।
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