OBC Reservation MP: मध्यप्रदेश की राजनीति और युवाओं के भविष्य से जुड़ा ओबीसी आरक्षण का मुद्दा इस समय निर्णायक मोड़ पर है।
साल 2019 में तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने ओबीसी आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% करने का निर्णय लिया था।
तब से यह मामला कानूनी दांव-पेंच में फंसा हुआ है। वर्तमान में जबलपुर हाईकोर्ट में कुल 86 याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई हो रही है।

जीतू पटवारी के सरकार पर तीखे वार
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
उन्होंने कहा कि सरकार की ढुलमुल कार्यप्रणाली के कारण ओबीसी वर्ग के साथ अन्याय हो रहा है।

पटवारी के आरोपों के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
वकीलों को लेकर अनिश्चितता:
पटवारी ने दावा किया कि सरकार इतनी लापरवाह है कि उसे यह तक स्पष्ट नहीं है कि कोर्ट में बहस कौन सा वकील करेगा। एडवोकेट जनरल भी इस पर स्पष्टता नहीं दे पा रहे हैं।
आर्थिक बोझ और तारीखें:
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी वकील भारी भरकम फीस (50 लाख से 1 करोड़ रुपये तक) ले रहे हैं, लेकिन मामला सिर्फ तारीखों पर टल रहा है। यह जनता के पैसे की बर्बादी है।
युवाओं की पीड़ा:
पटवारी ने भावुक होते हुए कहा कि आरक्षण रुकने और भर्तियां अटकने से युवा मानसिक तनाव में हैं और आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हो रहे हैं।

हाईकोर्ट में आज क्या हुआ? (28 अप्रैल की अपडेट)
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार, हाईकोर्ट को 3 महीने के भीतर इस मामले का निपटारा करना है।
इसी कड़ी में 27, 28 और 29 अप्रैल को लगातार तीन दिन की विशेष सुनवाई तय की गई थी।
आज सुबह 11:15 बजे जैसे ही चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की बेंच ने सुनवाई शुरू की, एक तकनीकी पेंच सामने आ गया।
पता चला कि कुल 86 याचिकाओं में से 4 महत्वपूर्ण याचिकाएं (WP 866/2025, 496/2025 आदि) आज की लिस्ट में शामिल नहीं थीं।

ओबीसी पक्ष के वकील वरुण ठाकुर ने बहस शुरू करने की अपील की, लेकिन कोर्ट ने नियमों का हवाला देते हुए कहा कि जब तक सभी संबंधित पक्षों को नोटिस नहीं मिल जाता और सुप्रीम कोर्ट के दस्तावेज स्पष्ट नहीं हो जाते, तब तक सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकती।
इस कारण सुनवाई को दोपहर 2:30 बजे तक के लिए टाल दिया गया।
लाखों अभ्यर्थियों का भविष्य दांव पर
पिछले 6 सालों से चल रहे इस विवाद के कारण मध्यप्रदेश में सरकारी भर्तियों की प्रक्रिया पूरी तरह प्रभावित है।
कई परीक्षाओं के परिणाम ‘होल्ड’ पर हैं, तो कहीं नियुक्तियां रुकी हुई हैं।

14% बनाम 27%: मूल विवाद इसी आंकड़े पर है। क्या आरक्षण की सीमा 50% से ऊपर जा सकती है? यह एक बड़ा संवैधानिक सवाल है।
अंतिम सुनवाई: कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि वह सभी पहलुओं को सुनकर जल्द ही अंतिम फैसला सुनाएगा।
