MP Intern Doctors Strike: मध्य प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाएं बुरी तरह चरमरा गई हैं।
अपनी स्टाइपेंड (भत्ता) बढ़ाने की मांग को लेकर सूबे के इंटर्न डॉक्टर्स पिछले तीन दिनों से सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।
राजधानी भोपाल के कमला पार्क इलाके में डॉक्टरों का सबसे बड़ा धरना जारी है, जहां सैकड़ों इंटर्न सड़क पर ही बैठकर नारेबाजी कर रहे हैं।
इस आंदोलन का सीधा और सीधा असर राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ा है, जिससे दूर-दराज से आने वाले मरीजों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
हमीदिया अस्पताल की हालत खस्ता, भटकने को मजबूर मरीज
भोपाल के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल ‘हमीदिया’ की तस्वीर बेहद चिंताजनक बनी हुई है।
बुधवार को अस्पताल की ओपीडी (OPD) सेवा को दो बार खोला और बंद किया गया।
आमतौर पर जहां रोज सुबह 9 बजे ओपीडी शुरू होती है और दिनभर में लगभग 3,000 मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं, वहीं हड़ताल के चलते यह सिर्फ दो घंटे ही चल सकी और केवल 500 मरीज ही देखे जा सके।
अस्पताल में सीनियर डॉक्टर्स ने मोर्चा संभालने की कोशिश जरूर की, लेकिन डॉक्टरों की कमी की वजह से ओपीडी का कामकाज ठप ही रहा।
पर्चा बनवाने के बाद भी मरीज घंटों तक डॉक्टरों का इंतजार करते रहे और बाद में बिना इलाज कराए वापस लौटने को मजबूर हो गए।
अस्पताल की रूटीन सर्जरी (इलेक्टिव ऑपरेशन) पूरी तरह ठप हो गई हैं।
आम दिनों में जहां रोज 40 से ज्यादा ऑपरेशन होते थे, वहीं इस हड़ताल के कारण केवल 2 इमरजेंसी ऑपरेशन ही किए गए।
बाकी सभी सर्जरी को आगे की तारीखों के लिए टाल दिया गया है।
इसके अलावा अस्पताल की जांच लैब भी सुनसान पड़ी है और कुत्ते के काटने (एंटी-रेबीज) के इंजेक्शन जैसी मूलभूत सुविधाएं भी मरीजों को आसानी से नहीं मिल पा रही हैं।
दूर-दराज से आए मरीजों की आपबीती
डॉक्टरों की इस हड़ताल की सबसे बड़ी गाज उन गरीब और असहाय मरीजों पर गिरी है जो सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करके उम्मीद के साथ अस्पताल पहुंचे थे:
* सिंगरौली से आए मरीज: 720 किलोमीटर दूर सिंगरौली से दांत के दर्द का इलाज कराने आए एक मरीज पिछले दो दिनों से अस्पताल के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें कोई डॉक्टर नहीं मिला।
* विदिशा की मरीज: सीने में दर्द की शिकायत लेकर विदिशा से रेफर होकर आई कल्पना राय सुबह से बिना इलाज के भटकती नजर आईं।
* सीहोर के विजय सिंह: लिवर और किडनी की गंभीर बीमारी से जूझ रहे विजय सिंह का कहना है कि वे बहुत तकलीफ में हैं और उन्हें समझ नहीं आ रहा कि अब इलाज के लिए कहां जाएं।
* मासूम बच्चों का इलाज प्रभावित: फ्रैक्चर और एक्सीडेंट के मामलों में पहुंचे परिजनों को मजबूरी में अपने बच्चों को महंगे प्राइवेट अस्पतालों में ले जाना पड़ रहा है।
सड़क पर डटे डॉक्टर, ट्रैफिक हुआ डायवर्ट
कमला पार्क के पास मुख्य मार्ग पर डॉक्टरों के बैठने की वजह से भोपाल की यातायात व्यवस्था भी प्रभावित हुई है।
पुलिस और प्रशासन ने स्थिति को संभालने के लिए रास्ते को ‘वन-वे’ कर दिया है।
हालांकि, प्रदर्शन कर रहे डॉक्टरों ने संवेदनशीलता दिखाते हुए आपातकालीन वाहनों और एक्सीडेंट में घायल एक बच्ची को तुरंत रास्ता देकर जाने दिया।
डॉक्टरों का कहना है कि तेज धूप और भीषण गर्मी के बावजूद जब तक उनकी मांगें नहीं मानी जातीं, वे पीछे नहीं हटेंगे।
प्रदर्शनकारी डॉक्टरों के लिए उनके साथी, सीनियर डॉक्टर्स और स्थानीय नागरिक खाने-पीने का इंतजाम कर रहे हैं।
जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन (JDA) की 4 प्रमुख मांगें
जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. विक्रम सिंह सिद्धू और अन्य प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया है कि सरकार से वार्ता में कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकलने के कारण यह कदम उठाना पड़ा।
डॉक्टरों की चार मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं:
* वन नेशन, वन स्टाइपेंड: पूरे देश में डॉक्टरों के लिए एक समान स्टाइपेंड लागू किया जाए।
* लाठीचार्ज पर कार्रवाई: भोपाल में आंदोलन के दौरान डॉक्टरों पर हुए लाठीचार्ज और वाटर कैनन के इस्तेमाल के जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो और वे माफी मांगें।
* मुआवजा: पुलिस कार्रवाई में घायल हुए डॉक्टरों को उचित आर्थिक मुआवजा दिया जाए।
* कार्रवाई न हो: शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल किसी भी डॉक्टर पर कोई अनुशासनात्मक या कानूनी कार्रवाई न की जाए।
इमरजेंसी सेवाएं अभी चालू
डॉक्टरों ने स्पष्ट किया है कि आम जनता की जान को खतरे में न डालते हुए ICU, इमरजेंसी और कैजुअल्टी सेवाओं को हड़ताल से बाहर रखा गया है। यह सेवाएं सामान्य रूप से चल रही हैं।
लगभग 600 जूनियर रेजिडेंट और 250 इंटर्न डॉक्टर्स सिर्फ OPD और इलेक्टिव OT के कार्य का बहिष्कार कर रहे हैं।
डॉक्टरों का आरोप है कि यदि राज्य के स्वास्थ्य मंत्री समय रहते उनसे बात कर लेते तो उन्हें सड़क पर उतरने की जरूरत नहीं पड़ती।
अब जब तक ठोस समाधान नहीं निकलता, मध्य प्रदेश के सभी डॉक्टरों की सहमति से आंदोलन को आगे बढ़ाने की रणनीति बनाई जा रही है।
