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राम मंदिर के बाद अब MP के बगलामुखी मंदिर में चढ़ावा घोटाला, सरकारी खजाने की जगह ‘निजी खातों’ में जा रहा था दान का पैसा

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Baglamukhi Mandir Donation Case: मध्य प्रदेश के आगर-मालवा जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने न केवल प्रशासन को हिलाकर रख दिया है, बल्कि दूर-दूर से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं की आस्था को भी ठेस पहुंचाई है।

नलखेड़ा स्थित महाभारतकालीन सुप्रसिद्ध मां बगलामुखी मंदिर, जो अपनी तांत्रिक साधना और चमत्कारों के लिए देशभर में जाना जाता है, इस समय विवादों के घेरे में है।

आरोप है कि मंदिर में आने वाले करोड़ों रुपये के दान, सोने और चांदी की भारी अनियमितता की गई है।

श्रद्धालुओं की जेब पर डाका डालने का यह खेल कोई और नहीं, बल्कि मंदिर परिसर में ही सक्रिय एक अवैध समिति खेल रही थी।

कैसे हुआ इस बड़े खेल का भंडाफोड़?

इस पूरे मामले का खुलासा अचानक और बेहद नाटकीय ढंग से हुआ।

दरअसल, आगर-मालवा की कलेक्टर आईएएस प्रीति यादव रूटीन निरीक्षण के लिए नलखेड़ा स्थित मां बगलामुखी मंदिर पहुंची थीं।

कलेक्टर को अपने बीच पाकर वहां मौजूद कुछ स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं का सब्र टूट गया।

उन्होंने कलेक्टर के सामने ही मंदिर के वित्तीय लेन-देन और दान में हो रही गड़बड़ियों की मौखिक शिकायत कर दी।

शिकायत मिलते ही कलेक्टर ने मामले की गंभीरता को समझा और तुरंत एक्शन मोड में आ गईं।

हालांकि, यह बात अभी भी रहस्य बनी हुई है कि इस मामले की कोई लिखित शिकायत पहले क्यों नहीं की गई।

स्थानीय गलियारों में चर्चा है कि इस घोटाले को रसूखदार लोगों के दबाव में लंबे समय से दबाने की कोशिश की जा रही थी।

गैर-सरकारी समिति का ‘वसूली तंत्र’

इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि मंदिर के प्रबंधन के लिए एक आधिकारिक शासकीय समिति पहले से मौजूद है।

इसके बावजूद, मंदिर परिसर के भीतर ही एक गैर-शासकीय (प्राइवेट) समिति चुपचाप अपना जाल फैलाए हुए थी।

इस समिति का सरकारी प्रबंधन से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था।

यह अवैध समिति मंदिर में आने वाले वीआईपी और आम श्रद्धालुओं से नकद राशि, सोने के आभूषण और चांदी के बर्तनों के रूप में दान वसूल रही थी।

हद तो तब हो गई जब यह बात सामने आई कि इस चढ़ावे की रकम को मंदिर के आधिकारिक सरकारी खाते में जमा करने के बजाय, कुछ रसूखदार लोगों के निजी बैंक खातों (Personal Bank Accounts) में ट्रांसफर किया जा रहा था।

यानी भगवान के नाम पर आया पैसा सीधे तौर पर निजी जेबों को गर्म कर रहा था।

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गर्भगृह के सौंदर्यीकरण में भी ‘सोने की हेराफेरी’ का शक

मामला सिर्फ दैनिक चढ़ावे तक ही सीमित नहीं है। सूत्रों के हवाले से खबर है कि कुछ समय पहले मंदिर के मुख्य गर्भगृह को सोने और चांदी से सजाने (सौंदर्यीकरण) का काम किया गया था।

इस भव्य कार्य के लिए भी इसी विवादित और अपंजीकृत समिति ने देश-विदेश के श्रद्धालुओं से अलग से भारी मात्रा में सोना, चांदी और नकद चंदा इकट्ठा किया था।

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि इतना बड़ा निर्माण और सौंदर्यीकरण कार्य बिना किसी सरकारी अनुमति या प्रशासनिक निगरानी के कैसे पूरा हो गया?

जांच एजेंसियां अब इस सौंदर्यीकरण फंड के एक-एक पैसे का हिसाब खंगालने की तैयारी में हैं।

यदि इसमें गड़बड़ी साबित होती है, तो यह मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा धार्मिक घोटाला बन सकता है।

कलेक्टर की सख्त कार्रवाई: 7 दिन का अल्टीमेटम

मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर प्रीति यादव ने बिना वक्त गंवाए एक उच्च स्तरीय तीन सदस्यीय संयुक्त जांच दल का गठन कर दिया है।

इस जांच टीम की कमान जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) बी.एस. सोलंकी को सौंपी गई है।

 

उनके साथ टीम में जिला कोषालय अधिकारी मनीष सोलंकी और नगर परिषद नलखेड़ा की मुख्य नगरपालिका अधिकारी (CMO) मिनी अग्रवाल को शामिल किया गया है।

प्रशासन इस मूड में बिल्कुल नहीं है कि मामले को ठंडे बस्ते में डाला जाए।

यही वजह है कि जांच टीम को केवल 7 दिनों के भीतर अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपने का कड़ा निर्देश दिया गया है।

इतनी कम समयसीमा से साफ है कि दोषियों पर गाज गिरना तय है।

जांच के मुख्य बिंदु: किन कड़ियों को जोड़ेगी टीम?

जांच दल मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित करेगा:

  • अवैध रसीद बुक: क्या यह प्राइवेट समिति फर्जी रसीदें काटकर श्रद्धालुओं को दे रही थी?
  • बैंक खातों का ऑडिट: उन निजी बैंक खातों की डिटेल निकाली जाएगी जिनमें दान का पैसा ट्रांसफर हुआ।
  • अधिकारियों की संलिप्तता: जांच टीम इस बात का भी पता लगाएगी कि क्या इस पूरे खेल में मंदिर प्रबंधन या स्थानीय प्रशासन का कोई सरकारी अधिकारी/कर्मचारी शामिल था या नहीं।

जांच समिति के सदस्य मनीष सोलंकी ने मीडिया को आश्वस्त किया है कि उन्हें आदेश मिल चुके हैं और पूरी जांच पूरी पारदर्शिता और नियमों के दायरे में रहकर की जाएगी।

देशभर में गूंज रहा है मंदिरों में ‘चढ़ावा चोरी’ का मुद्दा

नलखेड़ा का यह मामला कोई अकेला मामला नहीं है। इन दिनों देशभर के बड़े धार्मिक स्थलों में पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

हाल ही में अयोध्या के भव्य राम मंदिर में भी करोड़ों रुपये के चढ़ावे में हेराफेरी की शिकायतें सामने आई थीं, जिसकी जांच वर्तमान में विशेष जांच टीम (SIT) कर रही है।

वहां भी बैंक कर्मियों और ट्रस्ट के लोगों से पूछताछ चल रही है।

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ऐसे में मां बगलामुखी मंदिर का यह विवाद यह साबित करता है कि धार्मिक स्थलों पर जमा होने वाले जन-धन की सुरक्षा के लिए अब कड़े और पारदर्शी नियमों की बेहद जरूरत है।

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