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MP पुलिस ने बिना सरकारी मंजूरी के इजराइली कंपनी से खरीदा 69 लाख का सॉफ्टवेयर, गृह विभाग ने उठाए सवाल

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

MP Police Israel Software Deal: मध्यप्रदेश में इन दिनों पुलिस मुख्यालय (PHQ) और राज्य का गृह विभाग एक अजीबोगरीब टकराव के दौर से गुजर रहे हैं।

मामला किसी अपराधी को पकड़ने का नहीं, बल्कि अपराधी को पकड़ने के लिए खरीदे गए एक ‘महंगे हथियार’ यानी सॉफ्टवेयर का है।

मध्यप्रदेश की साइबर पुलिस ने इजराइल की मशहूर कंपनी ‘सेलेब्राइट’ (Cellebrite) से करीब 68.54 लाख रुपये का एक  सॉफ्टवेयर खरीदा है।

चौंकाने वाली बात यह है कि इतनी बड़ी खरीदारी के लिए सरकार से पहले अनुमति ही नहीं ली गई।

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क्या है ‘सेलेब्राइट’ सॉफ्टवेयर और यह क्यों जरूरी है?

आज के दौर में अपराधी जितने शातिर हैं, उनके मोबाइल फोन उतने ही सुरक्षित।

कई बार अपराधी अपने फोन को ऐसे लॉक कर देते हैं कि पुलिस के लिए उसे खोलना नामुमकिन हो जाता है।

यहीं काम आता है ‘सेलेब्राइट प्रीमियम’ (Cellebrite Premium) सॉफ्टवेयर।

यह सॉफ्टवेयर दुनिया के सबसे ताकतवर डिजिटल फॉरेंसिक टूल्स में से एक है।

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इसकी खासियत यह है कि यह किसी भी पासवर्ड लगे या लॉक फोन का डेटा निकाल सकता है।

डिलीट किए गए व्हाट्सएप मैसेज, सोशल मीडिया चैट, कॉल रिकॉर्डिंग और यहाँ तक कि आपकी लोकेशन हिस्ट्री भी इस टूल के जरिए रिकवर की जा सकती है।

साइबर पुलिस का तर्क है कि राज्य में बढ़ते साइबर क्राइम और टेरर फंडिंग जैसे मामलों को सुलझाने के लिए यह सॉफ्टवेयर बेहद जरूरी है।

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विवाद की असली जड़: शॉपिंग पहले, परमिशन बाद में!

सरकारी सिस्टम में एक तय प्रक्रिया होती है—पहले जरूरत बताई जाती है, फिर बजट मांगा जाता है, मंजूरी मिलती है और फिर सामान खरीदा जाता है। लेकिन मध्यप्रदेश पुलिस मुख्यालय में गंगा उल्टी बह गई।

साइबर पुलिस ने सॉफ्टवेयर के 8 लाइसेंस खरीद लिए और जब बिल चुकाने की बारी आई, तब फाइल गृह विभाग को भेजी गई ताकि उसे ‘बैक डेट’ या ‘कार्योत्तर अनुमोदन’ (Post Facto Approval) के जरिए पास कराया जा सके।

गृह विभाग इस बात पर उखड़ गया है। विभाग ने सीधा सवाल पूछा है कि जब ‘Book of Financial Powers 1995’ (वित्तीय शक्तियों की किताब) में पुलिस महानिदेशक (DGP) को सॉफ्टवेयर खरीदने का स्पष्ट अधिकार ही नहीं है, तो फिर यह सौदा किसके कहने पर हुआ?

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गृह विभाग के वो 5 कड़े सवाल जिन्होंने PHQ को घेरा:

  1. किस नियम के तहत बिना मंजूरी इतनी बड़ी राशि का सौदा किया गया?

  2. क्या इस खरीदी के लिए किसी तकनीकी कमेटी या एक्सपर्ट की सलाह ली गई थी?

  3. जिस बजट से यह पैसा दिया जाना है, क्या उस मद में सॉफ्टवेयर खरीदने का प्रावधान है?

  4. जब DGP के पास अधिकार नहीं थे, तो फाइल ऊपर (शासन के पास) क्यों नहीं भेजी गई?

  5. क्या इस खरीदी में पारदर्शिता बरती गई?

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सिस्टम से बड़ी ‘जरूरत’?

इस मामले पर एडीजी (साइबर) ए. साई मनोहर का कहना है कि यह जनता की सुरक्षा का मामला है।

उनका तर्क है कि अपराधियों से दो कदम आगे रहने के लिए ऐसे टूल्स का होना अनिवार्य है।

पुलिस विभाग इसे एक ‘सब्सक्रिप्शन’ बता रहा है, न कि कोई स्थाई संपत्ति, ताकि नियमों की पेचीदगियों से बचा जा सके।

लेकिन जानकारों का कहना है कि मामला केवल ‘जरूरत’ का नहीं बल्कि ‘अनुशासन’ का है।

सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी इस तरह की कार्यशैली से नाराज हैं।

इससे पहले भी 9 ट्रेनी IPS अधिकारियों की पोस्टिंग को लेकर PHQ ने बिना अनुमति आदेश जारी कर दिए थे, जिसे बाद में सरकार ने निरस्त कर दिया था।

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अब आगे क्या होगा?

वर्तमान स्थिति यह है कि सॉफ्टवेयर पुलिस के पास पहुंच चुका है, लेकिन इजराइली कंपनी को भुगतान अटका हुआ है।

अगर गृह विभाग इस फाइल को रिजेक्ट कर देता है, तो उन अधिकारियों पर गाज गिर सकती है जिन्होंने इस फाइल पर हस्ताक्षर किए थे।

यह मामला प्रदेश की प्रशासनिक मशीनरी में चर्चा का विषय बना हुआ है कि क्या ‘इमरजेंसी’ के नाम पर वित्तीय नियमों को ताक पर रखना सही है?

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