MP Congress Bond Formula: क्या कांग्रेस को अब अपने ही नेताओं और कार्यकर्ताओं पर भरोसा नहीं रहा?
या फिर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की चुनावी कूटनीति और ‘ऑपरेशन सेंध’ के डर ने कांग्रेस को हद से ज्यादा सतर्क रहने पर मजबूर कर दिया है?
मध्यप्रदेश में नगरीय निकाय (लोकल बॉडी) चुनावों में अभी थोड़ा वक्त बाकी है, लेकिन कांग्रेस के भीतर से जो खबरें आ रही हैं, उन्होंने प्रदेश की सियासत में हलचल तेज कर दी है।
खबर है कि कांग्रेस इस बार उम्मीदवारों को मैदान में उतारने के लिए एक ऐसा अनोखा फार्मूला तैयार कर रही है, जो भारतीय राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है।
अब कांग्रेस में टिकट पाने के लिए केवल जनता के बीच लोकप्रियता या चुनाव जीतने की क्षमता (विनेबिलिटी) ही काफी नहीं होगी।
उम्मीदवारों को पार्टी के प्रति अपनी वफादारी साबित करने के लिए एक लिखित ‘बॉण्ड’ भी देना पड़ सकता है। यह कदम राजनीतिक गलियारों में कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
टिकट से पहले वफादारी की अग्निपरीक्षा
मध्यप्रदेश में भले ही निकाय चुनाव अभी दूर दिखाई दे रहे हों, लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने अपनी रणनीति पूरी तरह बदल दी है। पार्टी इस बार फूंक-फूंककर कदम रख रही है।
रणनीति यह है कि टिकट केवल उसी को दिया जाए जो न सिर्फ चुनाव जीते, बल्कि जीतने के बाद भी पूरी मजबूती से कांग्रेस के साथ खड़ा रहे।
इसी सोच के तहत पार्टी उम्मीदवारों को चुनाव सिंबल (बी-फॉर्म) देने के साथ-साथ उनसे एक कानूनी या लिखित बॉण्ड भरवाने की तैयारी में है, जिसमें वे भविष्य में पार्टी न छोड़ने का वादा करेंगे।
पुराने जख्मों से कांग्रेस ने लिया सबक
आखिर कांग्रेस को ऐसा कदम उठाने की जरूरत क्यों पड़ी? इसका जवाब पिछले कड़वे अनुभवों में छिपा है।
पिछले नगरीय निकाय चुनावों में कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन चुनाव जीतने के कुछ समय बाद ही जबलपुर, छिंदवाड़ा और मुरैना जैसे बड़े शहरों के कांग्रेस महापौर (मेयर्स) पार्टी का हाथ छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए।
इन घटनाओं ने न केवल कांग्रेस को बैकफुट पर धकेला, बल्कि संगठन के भीतर कार्यकर्ताओं के मनोबल को भी तोड़ दिया।
यही वजह है कि इस बार पार्टी पहले से ही सुरक्षा कवच तैयार कर रही है।
16 नगर निगमों के लिए कड़ा पहरा
कांग्रेस ने राज्य के सभी 16 नगर निगमों और बड़ी नगरपालिकाओं में उम्मीदवारों की स्क्रूटनी के लिए अपने सबसे अनुभवी और वरिष्ठ नेताओं को मैदान में उतारा है।
इन कद्दावर नेताओं को साफ निर्देश दिए गए हैं:
* ऐसे चेहरों की पहचान करें जिनकी छवि बेदाग हो।
* सिर्फ हवा-हवाई लोकप्रियता नहीं, बल्कि संगठन के प्रति उनकी निष्ठा की गहराई को मापें।
* पार्टी बदलने की संभावना वाले नेताओं को रेस से पहले ही बाहर का रास्ता दिखाएं।
> **सियासी जानकारों का मानना है:** “निकाय चुनाव को हमेशा विधानसभा चुनाव का ‘सेमीफाइनल’ माना जाता है। कांग्रेस इस बार कोई ऐसा रिस्क नहीं लेना चाहती जिससे जीत का जश्न चंद दिनों में हार के मातम में बदल जाए।”
क्या एक कागज का टुकड़ा रोक पाएगा दलबदल?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा और जायज सवाल यही उठता है कि क्या कागज पर दिखाई गई वफादारी सचमुच किसी नेता के दिल और उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को बदल सकती है?
देश और प्रदेश का राजनीतिक इतिहास गवाह है कि जब नेताओं को अपनी सहूलियत देखनी होती है, तो वे दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के कड़े नियमों को भी बाईपास कर जाते हैं।
ऐसे में एक संगठनात्मक बॉण्ड सत्ता की कूटनीति, दबाव और लालच के आगे कितना टिक पाएगा, यह कहना बेहद मुश्किल है।
मजबूरी की रणनीति या खुद को बचाने की ढाल?
कांग्रेस की इस नई नीति को राजनीतिक विश्लेषक ‘डिफेंसिव’ यानी रक्षात्मक खेल मान रहे हैं।
विपक्षी दलों का हमेशा से आरोप रहा है कि भाजपा केंद्रीय एजेंसियों या सत्ता के दम पर उनके नेताओं को तोड़ लेती है।
कांग्रेस का यह कदम दिखाता है कि वह भाजपा के इस ‘ऑपरेशन’ से कितनी डरी हुई है।
लेकिन असली परीक्षा चुनाव के नतीजों के बाद ही होगी, जब यह साफ होगा कि क्या नियम-कायदे नेताओं को बांधकर रख पाते हैं या फिर सत्ता की चाशनी एक बार फिर वफादारी पर भारी पड़ती है।
इस पूरे मामले पर कांग्रेस का क्या है स्टैंड?
जब इस रणनीति के बारे में मध्यप्रदेश कांग्रेस के संगठन महामंत्री संजय कामले से बात की गई, तो उन्होंने बेहद सधे हुए अंदाज में जवाब दिया। कामले ने कहा:
“हर चुनाव से पहले संगठन को मजबूत करने के लिए तरह-तरह के विचारों और रणनीतियों पर मंथन होता है। उम्मीदवारों से बॉण्ड भरवाने या किसी अन्य व्यवस्था को लागू करने पर अभी पार्टी के शीर्ष स्तर पर विचार-विमर्श चल रहा है। अंतिम फैसला जल्द ही लिया जाएगा, जिसका मकसद सिर्फ पार्टी को मजबूती देना है।”
अब देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस का यह ‘बॉण्ड फार्मूला’ वाकई में कोई कमाल दिखा पाता है या यह सिर्फ एक कागजी कवायद बनकर रह जाता है।
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