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MP के किसानों की चमकी किस्मत: इंदौर के आलू और सिवनी के सीताफल समेत 9 फसलों को मिला GI टैग, अब दुनिया चखेगी इनका स्वाद

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

MP GI Tag 2026: मध्य प्रदेश के किसानों और कृषि क्षेत्र के लिए एक बहुत ही शानदार और बड़ी खुशखबरी आई है।

राज्य की एक या दो नहीं, बल्कि पूरी 9 कृषि उपजों (कृषि उत्पादों) को एक साथ जीआई टैग (GI Tag – Geographical Indication) यानी भौगोलिक संकेतक मिल गया है।

यह टैग मिलने का सीधा मतलब यह है कि अब मध्य प्रदेश के इन अनोखे प्रोडक्ट्स को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक कानूनी पहचान मिल गई है।

इस ऐतिहासिक फैसले से अब ये फसलें दुनिया के किसी भी कोने में अपने असली नाम और क्षेत्र की पहचान के साथ बेची जा सकेंगी।

इससे न सिर्फ नकली सामान बेचने वालों पर लगाम लगेगी, बल्कि देश-विदेश के बाजारों में मध्य प्रदेश के किसानों को अपनी फसलों का बहुत ही बेहतरीन दाम मिलेगा।

आइए जानते हैं कि इस लिस्ट में कौन-कौन से प्रोडक्ट्स शामिल हैं और उनकी खासियत क्या है।

रतलाम ने बनाया रिकॉर्ड: एक ही जिले के पास अब 4 GI टैग

इस बार की लिस्ट में सबसे बड़ा धमाका रतलाम जिले ने किया है।

रतलाम अब मध्य प्रदेश का पहला ऐसा जिला बन गया है जिसके पास अकेले 4 जीआई टैग वाले प्रोडक्ट्स हैं।

इस बार रतलाम की बालम ककड़ी और गराडू को यह खास पहचान मिली है।

आपको बता दें कि इससे पहले ‘रतलामी सेव’ और ‘रियावन सिल्वर लहसुन’ को पहले ही जीआई टैग मिल चुका था।

बालम ककड़ी की खासियत:

यह ककड़ी आम ककड़ी जैसी बिल्कुल नहीं होती। यह रतलाम के सैलाना के आदिवासी इलाकों में उगती है।

ऊपर से हरी और अंदर से पूरी तरह केसरिया रंग की यह ककड़ी साल में सिर्फ एक महीने (अगस्त से सितंबर के बीच) ही मिलती है।

 

रतलाम का गराडू:

सर्दियों के मौसम में गराडू की चाट का नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है।

बाहर से एकदम कुरकुरा और अंदर से मक्खन जैसा मुलायम यह कंदमूल रतलाम के बांगरोद और सेजावता जैसे इलाकों में होता है।

इसकी डिमांड दिल्ली, मुंबई ही नहीं बल्कि दुबई तक है।

सिवनी का ‘जंबो सीताफल’ और इंदौर का ‘मालवी आलू’

स्वाद और सेहत के मामले में सिवनी और इंदौर के इन प्रोडक्ट्स का कोई मुकाबला ही नहीं है:

सिवनी का जंबो सीताफल:

नाम की तरह ही यह सीताफल आकार में बहुत बड़ा (जंबो) होता है। आम सीताफल छोटे होते हैं, लेकिन इसका वजन 200 ग्राम से लेकर करीब 1 किलो तक भी हो जाता है।

सबसे अच्छी बात यह है कि इसे उगाने में किसी भी तरह के केमिकल या रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं होता।

इसकी भारी डिमांड के कारण अब इसके पल्प (गूदे) से आइसक्रीम, रबड़ी और मिठाइयां बनाई जा रही हैं।

इंदौर का मालवी आलू:

इंदौर सिर्फ पोहे के लिए नहीं, बल्कि अपने खास मालवी आलू के लिए भी जाना जाएगा। इस आलू में शुगर और स्टार्च की मात्रा बहुत कम होती है।

यही वजह है कि जब इस आलू से चिप्स बनाए जाते हैं, तो वे तलने के बाद भी काले नहीं पड़ते।

दुनिया भर की चिप्स बनाने वाली कंपनियों के लिए यह आलू पहली पसंद है।

डिंडोरी के आदिवासियों की शान: सिताही और नागदमन कुटकी

मोटे अनाज (मिलेट्स) के मामले में डिंडोरी जिले की दो खास किस्मों—सिताही कुटकी और नागदमन कुटकी को जीआई टैग मिला है।

सिताही कुटकी: यह एक ऐसा देसी छोटा बाजरा है जो बेहद कम पानी, सूखे और पहाड़ी बंजर जमीन में भी सिर्फ 60 दिनों के भीतर पककर तैयार हो जाता है। इससे लगभग 60 हजार आदिवासी किसान जुड़े हैं।

नागदमन कुटकी: यह किस्म अपने बेहतरीन औषधीय गुणों और हाई न्यूट्रिशन वैल्यू (ज्यादा पोषण) के लिए जानी जाती है।

इसके अलावा, इस क्षेत्र की बैगानी अरहर (जिसमें हल्की बैंगनी झलक होती है और भारी प्रोटीन होता है) तथा छत्रिय धान को भी यह टैग दिया गया है।

बुरहानपुर का मीठा केला

बुरहानपुर की पहचान वहां के केलों से है। मध्य प्रदेश की इकलौती केला मंडी यहीं पर है।

यहाँ लगभग 26 हजार हेक्टेयर से ज्यादा जमीन पर केले की खेती होती है और यहाँ का केला अपनी मिठास के लिए उत्तर भारत, कश्मीर के साथ-साथ खाड़ी देशों (Gulf Countries) में बहुत पसंद किया जाता है।

जीआई टैग मिलने के बाद अब बुरहानपुर के केले सीधे विदेशों में बड़े ब्रांड के रूप में एक्सपोर्ट हो सकेंगे।

समझें क्या होता है GI टैग और इसके फायदे?

जीआई टैग (Geographical Indication) एक तरह का कानूनी सर्टिफिकेट या पहचान है, जो किसी प्रोडक्ट को उसकी खास भौगोलिक उत्पत्ति, विशेष गुणवत्ता या पारंपरिक महत्व के आधार पर दिया जाता है।

 

इसका आवेदन चेन्नई स्थित भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री में किया जाता है, जहाँ पूरी जांच-पड़ताल और वैज्ञानिक रिपोर्ट देखने के बाद ही यह टैग मिलता है।

किसानों को होने वाले सीधे फायदे:

1. ब्रांड वैल्यू और पहचान: अब इन 9 फसलों को दुनिया भर के बाजारों में एक खास ब्रांड के रूप में पहचान मिलेगी।

2. कमाई में बंपर इजाफा: जब उत्पाद की प्रामाणिकता तय होगी, तो ग्राहकों से लेकर बड़ी कंपनियां भी किसानों को इसकी मुंहमांगी और बेहतर कीमत देंगी।

3. एक्सपोर्ट के नए रास्ते: अंतरराष्ट्रीय बाजारों में जीआई सर्टिफाइड प्रोडक्ट्स की मांग बहुत ज्यादा होती है, जिससे अब इन फसलों का निर्यात (Export) आसान हो जाएगा।

4. नकली उत्पादों पर रोक: कोई भी अन्य व्यक्ति या शहर इन नामों का इस्तेमाल करके नकली सामान नहीं बेच पाएगा। ऐसा करना अब कानूनी तौर पर अपराध माना जाएगा।

मध्य प्रदेश में इन 9 नई फसलों से पहले सीहोर के शरबती गेहूं और रीवा के सुंदरजा आम को भी यह गौरव मिल चुका है।

नए जीआई टैग मिलने से यकीनन मध्य प्रदेश के किसानों की तकदीर और कृषि व्यवस्था को एक नई उड़ान मिलेगी।

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