MP Temple Donation Controversy: अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का विवाद अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि अब मध्य प्रदेश के बड़े और प्रसिद्ध मंदिरों की दान व्यवस्था भी कटघरे में आ गई है।
हाल ही में सामने आई एक मीडिया पड़ताल ने राज्य के वीआईपी मंदिरों के मैनेजमेंट, सुरक्षा और पारदर्शिता पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आम जनता और श्रद्धालुओं के मन में अब यह सवाल उठने लगा है कि उनके द्वारा भगवान के चरणों में अर्पित की जाने वाली गाढ़ी कमाई का आखिर सही इस्तेमाल हो भी रहा है या नहीं?

आइए सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं कि मध्य प्रदेश के चार बड़े मंदिरों की जमीनी हकीकत क्या है।
1. ओंकारेश्वर मंदिर: कमाई पर पर्दा और सवालों से बचते अफसर
खंडवा के प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर मंदिर ट्रस्ट ने इतिहास में पहली बार अपनी दान पेटियों से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक की है।
प्रशासन ने बताया कि महज एक हफ्ते के भीतर दान पेटी से 24 लाख 41 हजार रुपए मिले।
वैसे तो यहाँ हर मंगलवार और शुक्रवार को दान पेटियां खोली जाती हैं, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि यह कुल कमाई का एक छोटा सा हिस्सा है।

मंदिर में ऑनलाइन मिलने वाला दान, वीआईपी या शीघ्र दर्शन (जिसके लिए प्रति श्रद्धालु 300 रुपए लिए जाते हैं और रोज करीब 6 हजार लोग आते हैं) तथा लड्डू-प्रसाद की बिक्री से होने वाली मोटी कमाई का कोई भी ब्योरा जनता के सामने नहीं रखा गया।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि दान पेटियों की गिनती के समय बड़े नोटों की हेराफेरी होती है।
जब इस बारे में मंदिर के सहायक प्रशासक उदय मंडलोई से पूछा गया, तो उन्होंने बात टाल दी।
अधिकारियों के बीच एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टालने का खेल चलता रहा, जिससे शक और गहरा गया है।

2. महाकाल मंदिर: कड़े नियम, लेकिन सोने-चांदी पर रहस्यमयी चुप्पी
उज्जैन के विश्वप्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में दान गिनने की व्यवस्था काफी आधुनिक और सख्त दिखती है।
यहाँ एक कांच का पारदर्शी कमरा बनाया गया है, जहाँ सीसीटीवी कैमरों और बैंक अधिकारियों की निगरानी में पैसे गिने जाते हैं।
गिनती करने वाले कर्मचारियों के कपड़ों में जेबें तक नहीं होतीं या उन्हें सील कर दिया जाता है।
वित्तीय वर्ष 2025-26 में महाकाल मंदिर की कुल आय 145 करोड़ रुपए से अधिक दर्ज की गई है।

लेकिन, इस पूरी तगड़ी व्यवस्था के बाद भी एक बड़ा झोल है।
मंदिर को दान में मिलने वाले सोने और चांदी का सटीक आंकड़ा आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया।
अधिकारी सुरक्षा का हवाला देकर चुप हो जाते हैं।
उज्जैन के महापौर मुकेश टटवाल ने खुद सवाल उठाया है कि तीन साल पहले सोने-चांदी की फिजिकल जांच (भौतिक सत्यापन) का वादा किया गया था, जो आज तक पूरा नहीं हुआ।
मंदिर के पास कुल कितना सोना-चांदी है, उसका वजन और बाजार भाव क्या है, यह आज भी एक रहस्य है।

3. बगलामुखी मंदिर: आस्था के नाम पर फर्जीवाड़ा
आगर मालवा के नलखेड़ा में स्थित मां बगलामुखी मंदिर में तो मामला और भी गंभीर है।
यहाँ सरकारी व्यवस्था के समानांतर एक गैर-सरकारी संस्था (एनजीओ) अवैध रूप से श्रद्धालुओं से चंदा और चढ़ावा वसूल रही थी।
जब इसकी शिकायत उच्च अधिकारियों तक पहुँची, तो कलेक्टर प्रीति यादव ने एक उच्च स्तरीय जांच समिति बैठाई।

जांच में इस फर्जी समिति के बैंक खातों और लॉकरों से भारी मात्रा में नकदी और सोना-चांदी बरामद हुआ है।
अब प्रशासन इस बात की तहकीकात कर रहा है कि आखिर किसकी शह पर यह फर्जीवाड़ा इतने दिनों से चल रहा था और इसमें कौन-कौन से सरकारी नुमाइंदे शामिल थे।

4. देवास मॉडल: जहाँ पारदर्शिता की मिसाल पेश की गई
इन तमाम गड़बड़ियों के बीच देवास की माता टेकरी (तुलजा भवानी और चामुंडा माता मंदिर) से एक सकारात्मक उम्मीद जागती है।
यहाँ की दान व्यवस्था बेहद पारदर्शी और साफ-सुथरी है।
मंदिर परिसर की 11 दान पेटियों को जब भी खोला जाता है, तो उसकी लाइव वीडियोग्राफी होती है।
मौके पर राजस्व विभाग के बड़े अधिकारी और पटवारी मौजूद रहते हैं।

देवास मॉडल की सबसे अच्छी बात यह है कि यहाँ सिर्फ आमदनी ही नहीं, बल्कि खर्च का भी पाई-पाई का हिसाब जनता के सामने रखा जाता है।
जैसे पिछले साल यहाँ 1.25 करोड़ रुपए की कमाई हुई और खर्च 1.45 करोड़ रुपए हुआ, तो प्रशासन ने खुलकर बताया कि 20 लाख रुपए का घाटा या विलंबित खर्च है, जिसे इस साल पूरा किया जाएगा।
इन चारों मंदिरों की स्थिति को देखकर साफ है कि जहाँ देवास मॉडल जनता का भरोसा जीत रहा है, वहीं महाकाल और ओंकारेश्वर जैसे बड़े मंदिरों में जानकारी छुपाने की आदत ने संदेह पैदा कर दिया है।

श्रद्धालुओं का विश्वास बनाए रखने के लिए जरूरी है कि हर मंदिर अपने खजाने का पूरा हिसाब-किताब देश के सामने पूरी ईमानदारी से रखे।
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