MP Ken Betwa River Crisis: मध्य प्रदेश में आने वाले सालों में पानी का एक अनोखा और बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
अमूमन माना जाता है कि अगर बारिश अच्छी होगी, तो पानी की कोई कमी नहीं रहेगी। लेकिन वैज्ञानिकों और जानकारों की ताजा रिपोर्ट कुछ अलग ही इशारा कर रही है।
अनुमान है कि साल 2050 तक मध्य प्रदेश की तीन सबसे प्रमुख नदियों—केन, बेतवा और सोन—में पानी की भारी कमी हो सकती है।
चौंकाने वाली बात यह है कि यह संकट तब आ रहा है जब मानसून में बारिश की तीव्रता बढ़ रही है।
यह तीनों नदियां मध्य प्रदेश के लाखों लोगों के लिए जीवनरेखा (लाइफलाइन) हैं। इन इलाकों में खेती-किसानी से लेकर पीने के पानी तक की पूरी व्यवस्था इन्हीं नदियों पर टिकी है।
लेकिन अब जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) के कारण इनके वजूद पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
आखिर ज्यादा बारिश के बाद भी क्यों सूख रही हैं नदियां?
इसके पीछे मौसम और बारिश के बदलते पैटर्न को जिम्मेदार माना जा रहा है।
मध्य प्रदेश में अब मानसून के दिनों की संख्या कम हो रही है, यानी पहले जो बारिश तीन-चार महीनों में रुक-रुक कर आराम से होती थी, वह अब कुछ ही दिनों में बहुत तेज रफ्तार (भारी तीव्रता) से हो जाती है।
जब बहुत कम समय में मूसलाधार बारिश होती है, तो पानी को जमीन के भीतर रिसने (Groundwater Recharge) का मौका नहीं मिलता।
वह पानी बाढ़ का रूप लेकर तेजी से बह जाता है। नतीजा यह होता है कि जमीन के अंदर का जलस्तर नहीं बढ़ पाता।
नदियों के बहते रहने के लिए एक वैज्ञानिक प्रक्रिया जरूरी होती है, जिसे विशेषज्ञ ‘बेसफ्लो’ (Baseflow) कहते हैं।
इसका मतलब है कि मानसून खत्म होने के बाद जमीन के अंदर से रिसकर जो पानी प्राकृतिक रूप से नदियों में आता रहता है, वही नदियों को जिंदा रखता है।
जब जमीन में पानी ही नहीं जाएगा, तो बेसफ्लो कम हो जाएगा और सर्दियों व गर्मियों के मौसम में नदियां तेजी से सूखने लगेंगी।
किस नदी पर कितना और कहाँ पड़ेगा असर?
केंद्रीय जल आयोग (CWC) की रिपोर्ट के मुताबिक, तीनों नदियों पर इसका अलग-अलग असर देखने को मिलेगा:
* बेतवा बेसिन: साल 2050 तक बेतवा नदी में मानसून के बाद वाले महीनों में पानी 10 से 20 फीसदी तक कम हो सकता है। नदी का ज्यादातर पानी सिर्फ मानसून के कुछ दिनों तक ही सीमित रह जाएगा। इसका असर रायसेन, विदिशा, निवाड़ी के साथ-साथ यूपी के ललितपुर, झांसी और हमीरपुर पर पड़ेगा।
* केन बेसिन: इस रिपोर्ट में केन नदी को सबसे ज्यादा संवेदनशील और असुरक्षित माना गया है। गर्मियों के दिनों में यहाँ पानी की भारी किल्लत हो सकती है। इससे कटनी, दमोह, पन्ना, छतरपुर और यूपी का बांदा जिला प्रभावित होगा।
* सोन बेसिन: सोन नदी में मानसून के दौरान तो भयंकर पानी रहेगा, लेकिन जैसे ही मानसून बीतेगा, पानी में 15 प्रतिशत तक की गिरावट आ जाएगी। इससे अनूपपुर, शहडोल, सीधी, सिंगरौली और सोनभद्र जिलों में पानी की किल्लत बढ़ सकती है।
हाइड्रोलॉजी एक्सपर्ट डॉ. सीताराम टैगोर का कहना है कि ये नदियां विंध्य और बुंदेलखंड के पठारी जंगलों से निकलती हैं।
इन इलाकों में लगातार हो रही जंगलों की कटाई और अवैध खनन से जमीन का स्वरूप बदल रहा है, जिससे नदियों का प्राकृतिक प्रवाह बिगड़ रहा है।
चूंकि ये तीनों नदियां आगे जाकर गंगा बेसिन में मिलती हैं, इसलिए पानी घटने का यह बुरा असर सिर्फ एमपी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उत्तर प्रदेश और बिहार की नदियों (गंगा-यमुना) के बहाव पर भी पड़ेगा।
बचाव के उपाय और सरकार की तैयारी
विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिति अभी पूरी तरह से बिगड़ी नहीं है, अगर अभी से सही कदम उठाए जाएं तो नदियों को बचाया जा सकता है।
इसके लिए नदियों के उद्गम स्थल (जहाँ से नदी शुरू होती है) पर बड़े पैमाने पर पेड़ लगाने होंगे।
पुराने तालाबों और बावलियों को पुनर्जीवित करना होगा ताकि मानसून के पानी को रोक कर जमीन में उतारा जा सके।
इसके अलावा बांधों से पानी छोड़ने के लिए ऐसी तकनीक अपनानी होगी जिससे नदियों में सालभर न्यूनतम पानी का बहाव बना रहे।
इस गंभीर मामले पर जल संसाधन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS) राजेश राजौरा ने बताया कि सरकार पूरी तरह सतर्क है।
केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए नदियों के कैचमेंट एरिया (जलग्रहण क्षेत्रों) को सुरक्षित करने के लिए एक बेहद मजबूत और ठोस एक्शन प्लान तैयार किया जा रहा है।
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