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CRISP में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर प्रशिक्षणार्थियों ने बनाए अनोखे करघे, मॉडल बने आकर्षण का केंद्र

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National Handloom Day CRISP: परंपरा जब तकनीक से मिली तो करघे ने नया रूप ले लिया।

किसी ने लकड़ी को आकार देकर हथकरघा बनाया, किसी ने कार्डबोर्ड में बुनाई की संभावनाएं तलाशीं तो किसी ने पीवीसी पाइप से हल्का और उपयोगी करघा तैयार कर दिया।

सबसे अनूठा रहा दो तरफा हैंडलूम, जिस पर दो लोग एक साथ बैठकर कपड़ा बुन सकते हैं।

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर सेंटर फॉर रिसर्च एंड इंडस्ट्रियल स्टाफ परफॉर्मेंस (क्रिस्प) के हैंडीक्राफ्ट विभाग में आयोजित गतिविधि में प्रशिक्षणार्थीयों की रचनात्मकता और तकनीकी कौशल का ऐसा ही मेल देखने को मिला।

खास बात यह रही कि प्रशिक्षणार्थीयों ने महज एक सप्ताह में ऐसे वर्किंग हैंडलूम तैयार किए, जिन पर वास्तव में कपड़ा बुना जा सकता है।

इस दौरान लकड़ियों की मदद से पारंपरिक हथकरघे को नए रूप में तैयार किया गया है।

इन हैंडलूम के जरिए बैग, वॉलेट, मोजे और मफलर जैसे छोटे परिधान व उपयोगी सामान बनाए जा सकते हैं।

इसमें किसी भी तरह के धागे का इस्तेमाल कर बुनाई की जा सकती है।

हैंडलूम प्रदर्शनी के बाद आयोजित फैशन शो में विद्यार्थियों ने पारंपरिक परिधानों को नए अंदाज में प्रस्तुत किया।

रंग-बिरंगे परिधानों के जरिए भारतीय वस्त्र संस्कृति की विविधता और खूबसूरती भी देखने को मिली।

हैंडीक्राफ्ट विभाग की प्रमुख इरम परवीन ने कहा कि गतिविधि का उद्देश्य प्रशिक्षणार्थीयों को हथकरघे की पारंपरिक तकनीक से जोड़ना और उसे व्यावहारिक रूप से समझाना था।

ऐसे आयोजन रचनात्मकता के साथ भारतीय शिल्प और वस्त्र परंपरा के प्रति सम्मान भी विकसित करते हैं।

वहीं, क्रिस्प के निदेशक अमोल वैद्य ने कहा कि इस तरह की गतिविधियां विद्यार्थियों में रचनात्मक सोच, नवाचार और व्यावहारिक कौशल को बढ़ावा देती हैं।

पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक का मेल भविष्य के कुशल मानव संसाधन तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

प्रतियोगिता में 32 पार्टीसिपेंट्स की 5 टीमों भाग लिया जिसमे रवि कुमार, “धागों का ताना बाना” टीम ने उत्कृष्ट कार्यशील हैंडलूम मॉडल के लिए प्रथम स्थान हासिल किया।

विजेता टीम सहित सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित किया गया।

इस आयोजन की सबसे बड़ी सीख यही रही कि हथकरघा सिर्फ अतीत की विरासत नहीं है।

सही हाथों में पहुंचे तो वही करघा नए प्रयोग, आत्मनिर्भरता और भविष्य के कौशल का आधार भी बन सकता है।

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