FSSAI action on Pepsico Fortune: देश में खाद्य सामग्री और पेय पदार्थों की गुणवत्ता पर नज़र रखने वाली मुख्य संस्था, भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने खाद्य उद्योग की कुछ सबसे बड़ी कंपनियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है।
हाल ही में डाबर इंडिया पर हुई कार्रवाई के बाद, अब अडानी विल्मर का ‘फॉर्च्यून’ (Fortune) ब्रांड, पेप्सिको (PepsiCo), रेड बुल (Red Bull), मॉन्स्टर (Monster) और रिलायंस का कैंपा एनर्जी ड्रिंक regulator के निशाने पर आ गए हैं।
नियामक ने स्पष्ट कर दिया है कि चाहे कंपनी कितनी भी बड़ी या लोकप्रिय क्यों न हो, अगर उत्पाद की गुणवत्ता में कोई कमी पाई जाती है या पैकेजिंग पर उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाले दावे किए जाते हैं, तो सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

फॉर्च्यून सनफ्लावर तेल पर क्यों लगा जुर्माना?
अडानी विल्मर (Adani Wilmar) कंपनी द्वारा बेचे जाने वाले मशहूर ‘फॉर्च्यून फ्रायोला रिफाइंड सनफ्लावर ऑयल’ (Fortune Frayola Refined Sunflower Oil) के एक सैंपल पर FSSAI ने जुर्माना ठोका है।
मामला क्या था?
गोवा स्थित मशहूर ताज फोर्ट अगुआडा रिजॉर्ट से फॉर्च्यून सनफ्लावर तेल का एक सैंपल जांच के लिए लिया गया था।
लैब टेस्ट के दौरान पाया गया कि इस तेल में विटामिन डी की मात्रा निर्धारित सरकारी मानकों से काफी कम थी।
दोबारा जांच में भी हुई पुष्टि:
कंपनी ने इस शुरुआती रिपोर्ट को चुनौती दी और री-पेप (Repel) लैब से दोबारा जांच कराने की अपील की।
हालांकि, दूसरी लैब रिपोर्ट में भी विटामिन डी की कमी की बात सही पाई गई।

कार्रवाई: दोनों जांच रिपोर्ट में कमी साबित होने के बाद, सेंट्रल लाइसेंसिंग अथॉरिटी ने कंपनी पर आर्थिक जुर्माना लगाने की मंजूरी दे दी।
यह जुर्माना गोवा के एडज्यूडिकेटिंग ऑफिसर द्वारा मैंगलोर स्थित एडब्ल्यूएल (AWL) एग्रो प्रोडक्ट्स के कारोबार पर लगाया गया है।

पेप्सिको, रेड बुल और मॉन्स्टर को राहत देने से इनकार
एनर्जी ड्रिंक के नाम पर बेचे जाने वाले हाई-कैफीन ड्रिंक्स को लेकर FSSAI का रुख बेहद सख्त हो चुका है।
नियामक ने जुलाई महीने में पेप्सिको, रेड बुल, मॉन्स्टर और रिलायंस (कैंपा एनर्जी) जैसी सभी प्रमुख कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया था।
मुख्य आदेश: FSSAI ने कंपनियों को अपने ड्रिंक्स के डिब्बे और बोतलों से ‘एनर्जी ड्रिंक’ (Energy Drink) शब्द को पूरी तरह से हटाने का आदेश दिया था।
इसके लिए कंपनियों को 90 दिनों की समयसीमा (डेडलाइन) दी गई थी।

समयसीमा बढ़ाने की मांग खारिज:
कंपनियों ने FSSAI से गुहार लगाई थी कि उन्हें अपने पुराने प्रिंटेड स्टॉक को बाजार में खपाने के लिए कम से कम 1 साल का समय दिया जाए, क्योंकि उनका कहना था कि मार्केट में पहले से मौजूद स्टॉक को बिकने में 60 से 90 दिन लग जाते हैं।
हालांकि, नियामक ने इस मांग को साफ तौर पर खारिज कर दिया और तय समयसीमा के भीतर ही पैकेजिंग बदलने का सख्त निर्देश दिया।
राज्यों में जब्ती कार्रवाई:
इस सख्ती का असर देश भर में दिखने लगा है। राजस्थान और लद्दाख जैसे क्षेत्रों में स्टिंग (Sting), कैफ एनर्जी और रेड बुल जैसे ड्रिंक्स के अभियानों और विज्ञापनों पर पहले ही रोक लगाते हुए कुछ स्टॉक को जब्त किया जा चुका है।

‘एनर्जी ड्रिंक’ शब्द पर क्यों है FSSAI को आपत्ति?
आम तौर पर जब कोई साधारण ग्राहक बाजार से ‘एनर्जी ड्रिंक’ नाम का कोई पेय पदार्थ खरीदता है, तो उसे लगता है कि यह उसकी सेहत, ताकत या स्टेमिना के लिए फायदेमंद है।
FSSAI का मानना है कि यह शब्द उपभोक्ताओं के लिए भ्रामक (Misleading) है।
वास्तविकता यह है कि इन पेय पदार्थों में बहुत ज्यादा मात्रा में कैफीन और चीनी पाई जाती है।
कैफीन की अत्यधिक मात्रा शरीर को अस्थायी रूप से तो सतर्क रख सकती है, लेकिन इसका रोजाना या अधिक इस्तेमाल स्वास्थ्य पर गंभीर और हानिकारक प्रभाव डाल सकता है।

इसीलिए FSSAI चाहता है कि कंपनियां इन्हें किसी ‘स्वास्थ्यवर्धक ऊर्जा पेय’ की तरह पेश करने के बजाय इनके वास्तविक घटक (हाई-कैफीन बेवरेज) के रूप में ही प्रचारित करें।
भारत में क्यों बढ़ रही है एनर्जी ड्रिंक्स की खपत?
मार्केट रिसर्च एजेंसी यूरोमॉनिटर (Euromonitor) की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में एनर्जी ड्रिंक्स की मांग में बेतहाशा बढ़ोतरी देखने को मिल रही है:
* सालाना वृद्धि दर: भारत में एनर्जी ड्रिंक्स की बिक्री 12.6% की वार्षिक दर से बढ़ रही है। यह वृद्धि दर अमेरिका और चीन जैसे विकसित देशों से भी अधिक है।
* बिक्री का आंकड़ा: बीते वर्ष भारत में कुल 90.7 करोड़ लीटर एनर्जी ड्रिंक्स की बिक्री दर्ज की गई थी।
* मुख्य उपभोक्ता: वर्ष 2017 में पेप्सी द्वारा बेहद कम कीमत पर ‘स्टिंग’ (Sting) लॉन्च किए जाने के बाद से इस बाजार में बड़ा उछाल आया।

इसका सबसे ज्यादा प्रचलन 15 से 19 साल के किशोरों, युवाओं और ग्रामीण इलाकों के ग्राहकों में तेजी से बढ़ा है।
यही वजह है कि नाबालिगों और युवाओं की सेहत को ध्यान में रखते हुए नियामक अब इनकी गुणवत्ता, कैफीन की मात्रा और विज्ञापनों पर पैनी नजर रख रहा है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या हैं नियम?
एनर्जी ड्रिंक्स को लेकर केवल भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई बड़े देशों में भी कड़े कदम उठाए जा रहे हैं।
* ब्रिटेन का उदाहरण: ब्रिटेन में अप्रैल 2027 से 16 साल से कम उम्र के बच्चों को एनर्जी ड्रिंक बेचना पूरी तरह से प्रतिबंधित करने की योजना पर काम चल रहा है।
इस कानून के लागू होने के बाद छोटी उम्र के बच्चों को इन ड्रिंक्स की बिक्री गैर-कानूनी मानी जाएगी।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का भी मानना है कि बढ़ते बच्चों और किशोरों के मानसिक व शारीरिक विकास के लिए अत्यधिक कैफीन बेहद नुकसानदेह है, इसलिए भारत जैसे देश में भी ऐसे नियम लागू होना समय की मांग है।
डाबर मामला: 100% शुद्धता के दावों पर लगी रोक
फॉर्च्यून और पेप्सिको से पहले, FSSAI ने डाबर इंडिया (Dabur India) के कई लोकप्रिय प्रोडक्ट्स की बिक्री पर अस्थाई रोक लगाने का आदेश दिया था।
* किन उत्पादों पर हुई कार्रवाई? डाबर के शहद, देसी घी, नारियल तेल और तिल के तेल जैसे रोज़मर्रा के उपयोग में आने वाले उत्पादों पर यह आदेश लागू हुआ था।
* वजह: डाबर अपने इन उत्पादों के विज्ञापनों और पैकेजिंग पर “100% नैचुरल” (100% Natural) और “100% प्योर” (100% Pure) जैसे दावे कर रही थी।
नियामक के अनुसार, मौजूदा खाद्य सुरक्षा नियमों के तहत कोई भी कंपनी इस तरह के निरपेक्ष (Absolute) दावे नहीं कर सकती, जब तक कि वे हर पैमाने पर पूरी तरह प्रमाणित न हों।

अदालत से मिली राहत:
हालांकि, डाबर इंडिया ने FSSAI के इस आदेश के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया।
दिल्ली हाईकोर्ट ने डाबर को इस मामले में राहत देते हुए FSSAI की रोक पर अंतरिम स्टे लगा दिया।
कोर्ट का मानना था कि कंपनी को अपना पक्ष रखने और सुनवाई का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया था।

ग्राहकों के हित में नियामक की सख्ती जरूरी
FSSAI द्वारा हाल ही में लिए गए कड़े फैसले यह साफ संदेश देते हैं कि देश में अब खाद्य सुरक्षा मानकों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
* ब्रांड्स के लिए सीख: डाबर, फॉर्च्यून, पेप्सिको, रेड बुल और रिलायंस जैसी दिग्गज कंपनियों पर हुई इस कार्रवाई से बाजार के अन्य सभी ब्रांड्स को भी सबक मिलेगा कि वे अपनी लेबलिंग और विज्ञापनों में पारदर्शिता बनाए रखें।
* ग्राहकों के लिए राहत: आम उपभोक्ताओं के लिए यह एक सकारात्मक संकेत है।
इससे बाजार में बिकने वाले खाने-पीने के सामान की गुणवत्ता में सुधार होगा और कंपनियां भ्रामक विज्ञापनों के जरिए लोगों को गुमराह नहीं कर पाएंगी।

आने वाले दिनों में नियामक की जांच प्रक्रिया और सख्त हो सकती है, जिससे भारतीय उपभोक्ताओं को बेहतर और सुरक्षित उत्पाद मिल सकेंगे।
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