Supreme Court on Patna High Court: न्याय की चौखट पर जब कानून की तकनीकी बारीकियों को संवेदनशीलता से ऊपर रख दिया जाता है, तो अक्सर ऐसे फैसले सामने आते हैं जो समाज को झकझोर देते हैं।
ऐसा ही एक मामला पटना हाईकोर्ट से सामने आया, जिसने बांका जिले के एक स्टूडियो मालिक को ‘रेप की कोशिश’ (Attempt to Rape) के आरोपों से बरी कर दिया।
हाईकोर्ट का मानना था कि आरोपी ने महिला के साथ जबरदस्ती की, उसकी मर्यादा को ठेस पहुंचाई, लेकिन इसे कानूनन ‘बलात्कार का प्रयास’ नहीं माना जा सकता।

इस फैसले की गूंज जब देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में पहुंची, तो देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत बेहद नाराज हो गए।
सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट शोभा गुप्ता ने जब इस फैसले का जिक्र किया, तो चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन की बेंच ने इस पर गहरी हैरानी जताई।
चीफ जस्टिस ने कड़े शब्दों में कहा: “जजों को संवेदनशील होना चाहिए और फैसले देने से पहले कानूनी रिसर्च करनी चाहिए।
बिना पूरी कानूनी पड़ताल के ऐसे फैसले दिए जा रहे हैं। हम पटना हाईकोर्ट के इस फैसले की बारीकी से समीक्षा करेंगे और एक विस्तृत आदेश जारी करेंगे।”

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी (NJA) की उस गाइडलाइन और रिपोर्ट को मंजूरी दे दी है, जिसमें यौन अपराधों के मामलों की सुनवाई के दौरान जजों को संवेदनशीलता बनाए रखने के निर्देश दिए गए हैं।
देश की सभी अदालतों को इन गाइडलाइंस का सख्ती से पालन करने को कहा गया है।

18 साल पुरानी घटना: क्या हुआ था उस शाम?
यह पूरा मामला साल 2008 का है। बिहार के बांका जिले के अमरपुर में ‘छाया स्टूडियो’ नाम की एक फोटो दुकान थी।
19 जनवरी 2008 की शाम करीब 4:30 बजे, एक युवती अपने पिता के साथ वहां फोटो खिंचवाने गई थी।
युवती का आरोप था कि स्टूडियो के मालिक हिमांशु उर्फ मिथिया पाठक ने फोटो खींचने के बहाने उसे अंदर के केबिन में बुलाया।
उसने लड़की के पिता से कहा कि वे बाहर कंप्यूटर स्क्रीन पर फोटो देखने के लिए इंतजार करें। जैसे ही लड़की अंदर गई, आरोपी ने केबिन का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया।

इसके बाद आरोपी ने अपने कपड़े उतार दिए और लड़की पर झपट पड़ा। उसने जबरन लड़की की सलवार उतारने की कोशिश की और उसका सीना दबाने लगा।
जब लड़की ने शोर मचाया, तो बाहर खड़े पिता ने अनहोनी की आशंका में दरवाजे को जोर से धक्का देकर खोल दिया।
पकड़े जाने के डर से आरोपी हिमांशु पिता को धक्का देकर वहां से भाग निकला। अगले दिन पुलिस ने मामला दर्ज किया।

निचली अदालत से हाईकोर्ट तक का सफर
इस मामले का ट्रायल करीब 5 साल तक चला। साल 2013 में बांका की निचली अदालत ने आरोपी हिमांशु को दोषी पाया।
कोर्ट ने उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376/511 (बलात्कार का प्रयास) और धारा 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना) के तहत 3 साल की कठोर सजा सुनाई।
आरोपी ने इस सजा के खिलाफ पटना हाईकोर्ट में अपील दायर की। यह अपील हाईकोर्ट में 13 साल तक लंबित रही।

आखिरकार, 9 जुलाई 2026 को जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने इस पर फैसला सुनाते हुए आरोपी को बरी कर दिया।
हाईकोर्ट ने किस आधार पर किया आरोपी को बरी?
जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने आरोपी को बरी करने के पीछे मुख्य रूप से तीन तकनीकी कारण बताए:
पेनेट्रेशन (शारीरिक संबंध) और मेडिकल रिपोर्ट का न होना:
हाईकोर्ट ने माना कि आरोपी ने लड़की को बंधक बनाया, उसकी सलवार खींचने की कोशिश की और शारीरिक उत्पीड़न किया।
लेकिन कोर्ट ने कहा कि यह कृत्य मर्यादा भंग करने (IPC की धारा 354) के दायरे में आता है, न कि रेप की कोशिश (IPC 376/511) में।

कोर्ट के मुताबिक, इस मामले में न तो शारीरिक संबंध (पेनेट्रेशन) बनाने का कोई स्पष्ट शारीरिक प्रयास दिखा और न ही पीड़िता की कोई मेडिकल जांच कराई गई थी, जिससे चोटों की पुष्टि हो सके।
जांच में कमियां और मुख्य गवाहों पर संदेह:
अदालत ने पाया कि मामले में 5 गवाहों में से इकलौता स्वतंत्र गवाह अपनी बात से मुकर गया था। गवाही देने वालों में सिर्फ पीड़िता के माता-पिता ही बचे थे।
कोर्ट का मानना था कि ऐसे करीबी रिश्तेदार मामले के नतीजों से सीधे जुड़े होते हैं, इसलिए वे बातों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर सकते हैं।
इसके अलावा, मामले की जांच करने वाले पुलिस अधिकारी (IO) और किसी डॉक्टर का बयान कोर्ट में दर्ज नहीं कराया गया था।

बयानों में विरोधाभास:
हाईकोर्ट ने पुराने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यौन अपराधों में पीड़िता की अकेली गवाही सजा के लिए काफी हो सकती है, लेकिन वह गवाही पूरी तरह से भरोसेमंद और बिना किसी विरोधाभास के होनी चाहिए।
इस मामले में पीड़िता के बयानों में कोर्ट को कुछ कमियां दिखाई दीं।
तैयारी और कोशिश में क्या फर्क है?
अक्सर लोग ‘रेप की तैयारी’ और ‘रेप की कोशिश’ को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन कानूनन दोनों में बड़ा अंतर है:
रेप की तैयारी (Preparation): इसमें अपराध करने की योजना बनाना, मौके की तलाश करना या साधन जुटाना शामिल है। यह वास्तविक अपराध शुरू होने से पहले का चरण है।

रेप की कोशिश (Attempt):
जब अपराधी अपनी तैयारी पूरी करके सीधे अपराध को अंजाम देने के लिए कदम आगे बढ़ा देता है, तो वह कोशिश कहलाती है।
उदाहरण के लिए, जबरन कपड़े उतारना या शारीरिक हमला करना इस श्रेणी में आता है, भले ही वह अपने इरादे में कामयाब न हो पाया हो।
इस फैसले के दूरगामी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक असर
मनोवैज्ञानिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस तरह के फैसलों के समाज पर बेहद नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं:
कानूनी प्रणाली से भरोसा उठना: महिलाओं और बच्चियों को लगेगा कि इतने गंभीर शारीरिक हमले के बाद भी अगर कोर्ट इसे सिर्फ ‘मर्यादा को ठेस पहुंचाना’ मानकर हल्का कर देगा, तो लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने का कोई फायदा नहीं है।
अपराधियों के हौसले बुलंद होना: जब गंभीर शारीरिक शोषण को केवल तकनीकी आधार पर कमतर आंका जाएगा, तो अपराधियों के मन से कानून का डर खत्म हो जाएगा।
महिला सुरक्षा और आजादी पर असर: डर के माहौल के कारण महिलाएं घर से बाहर निकलने, काम करने या पढ़ाई करने में खुद को असुरक्षित महसूस करेंगी।

आगे का रास्ता क्या है?
यह 18 साल लंबी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।
पीड़िता इस फैसले के खिलाफ पटना हाईकोर्ट की डबल बेंच (खंडपीठ) के सामने अपील कर सकती है या सीधे देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) का दरवाजा खटखटा सकती है।
चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही इस मामले पर कड़ा रुख अपनाया है, इसलिए आने वाले समय में इस फैसले की विस्तृत समीक्षा होने की पूरी उम्मीद है।
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