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सिंधिया परिवार की अरबों की संपत्ति पर पेंच: जानिए क्यों अटका है ग्वालियर राजघराने के बंटवारे का फैसला!

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Scindia family property dispute: देश के सबसे प्रमुख और अमीर राजघरानों में शुमार ग्वालियर का सिंधिया परिवार एक बार फिर अपनी अरबों-खरबों रुपये की जायदाद को लेकर सुर्खियों में है।

ग्वालियर जिला अदालत में चल रहे पारिवारिक संपत्ति बंटवारे के मामले में सुनवाई फिर टल गई है।

वजह यह है कि कोर्ट द्वारा बार-बार मांगने के बावजूद परिवार की तरफ से संपत्ति की पूरी जानकारी और उसका आधिकारिक ब्योरा (इंडेक्स और नक्शा) जमा नहीं किया गया है।

पिछली दो लगातार सुनवाइयों में भी कोर्ट को संपत्ति का विवरण हासिल नहीं हो सका, जिसके चलते समझौता डिक्री (Settlement Decree) नहीं बन पा रही है।

इस वजह से मामला जस का तस अटका हुआ है और पारिवारिक बंटवारे की कानूनी प्रक्रिया लंबी खींचती जा रही है।

क्या है पूरा कानूनी मामला? (CPC का पेंच समझें)

ग्वालियर की जिला अदालत में यह विवाद पिछले काफी समय से चल रहा है।

इस मामले में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनकी तीनों बुआ—यशोधरा राजे, वसुंधरा राजे और ऊषा राजे राणा ने अदालत में एक संयुक्त आवेदन दाखिल किया है।

यह आवेदन सिविल प्रक्रिया संहिता (Civil Procedure Code – CPC) के आदेश 23 नियम 3 के तहत दिया गया है।

कानूनी नियम क्या कहता है?

जब कोई पक्ष आदेश 23 नियम 3 के तहत कोर्ट का रुख करता है, तो इसका मतलब होता है कि वे अदालत के जरिए एक वैध ‘समझौता डिक्री’ बनवाना चाहते हैं।

कानून के मुताबिक, ऐसी डिक्री तैयार करने के लिए बंटवारे में शामिल सभी संपत्तियों की एक विस्तृत सूची (इंडेक्स), उनका नक्शा और उनका मालिकाना हक संबंधी रिकॉर्ड कोर्ट में जमा करना अनिवार्य होता है।

जब तक यह संपूर्ण रिकॉर्ड कोर्ट की फाइल में दर्ज नहीं होता, तब तक अदालत समझौता डिक्री पास नहीं कर सकती।

चूंकि परिवार की तरफ से यह दस्तावेज पेश नहीं किए जा रहे हैं, इसलिए जज साहब को हर बार सुनवाई आगे बढ़ानी पड़ रही है।

क्या सिंधिया परिवार से हुई कानूनी चूक?

कानून और दीवानी मामलों के जानकारों का मानना है कि सिंधिया परिवार के पास इस विवाद को बिना सार्वजनिक किए सुलझाने का एक आसान रास्ता भी था।

अगर परिवार CPC के आदेश 23 नियम 1 के तहत आवेदन देता, तो उन्हें अपनी पूरी जायदाद का ब्योरा अदालत में सार्वजनिक करने की जरूरत ही नहीं पड़ती।

नियम 1 का मतलब होता है—’दावा वापस लेना’। इसके तहत वादी कोर्ट से अपना केस वापस ले लेता है और परिवार के सदस्य आपस में बैठकर (कोर्ट के बाहर) संपत्ति का बंटवारा कर लेते।

ऐसी स्थिति में संपत्तियों का कोई भी रिकॉर्ड कोर्ट के कागजों में दर्ज नहीं होता। लेकिन, सिंधिया परिवार ने नियम 1 के बजाय नियम 3 का रास्ता चुना।

अब चूंकि केस नियम 3 के तहत चल रहा है, इसलिए कोर्ट के पास कानूनी बाध्यता है कि वह पूरी संपत्ति का ब्योरा मांगे बिना फैसला नहीं सुना सकता।

कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, अब परिवार के पास अपनी संपत्तियों की जानकारी छिपाने या टालने का कोई सीधा कानूनी रास्ता नहीं बचा है।

संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक करने से क्यों कतरा रहा है परिवार?

सिंधिया परिवार की जायदाद देश के अलग-अलग राज्यों और शहरों में फैली हुई है।

जानकारों का कहना है कि परिवार के पास कई ऐसी प्रत्यक्ष संपत्तियां हैं जिनके बारे में सभी जानते हैं, लेकिन इनके अलावा कई अप्रत्यक्ष या छिपी हुई संपत्तियां और निवेश भी हैं।

यदि इन सभी संपत्तियों का पूरा ब्योरा अदालत के रिकॉर्ड में आता है, तो:

* टैक्स से जुड़े विवाद: आयकर विभाग या अन्य सरकारी एजेंसियों की तरफ से कर/टैक्स से जुड़ी नई जांच या कानूनी पेचीदगियां खड़ी हो सकती हैं।

 * सार्वजनिक विवाद: संपत्ति का आधिकारिक ब्योरा सार्वजनिक होने से भविष्य में नए दावेदार या अन्य कानूनी अड़चनें सामने आ सकती हैं।

इसी संभावित विवाद और भविष्य की कानूनी परेशानियों से बचने के लिए परिवार ब्योरा पेश करने में कतरा रहा है।

ग्वालियर से मुंबई तक: कितनी विशाल है सिंधिया साम्राज्य की संपत्ति?

सिंधिया राजघराने की संपत्तियों की सूची बेहद लंबी और भव्य है:

शहर/स्थान: संपत्ति का नाम / विवरण 

  • ग्वालियर: जय विलास पैलेस- करीब 12.40 लाख वर्गफीट में फैला ऐतिहासिक महल
  • उषा किरण पैलेस होटल: भव्य हेरिटेज होटल
  • रानी महल: ऐतिहासिक परिसर का हिस्सा
  • छोटी विश्रांति और हिरण वन कोठी
  • पुणे: पद्मा विलास पैलेस: बेहद आलीशान और कीमती महल
  • मुंबई: समंदर किनारे स्थित कोठियां और शहर के प्राइम इलाकों में कई प्रीमियम फ्लैट्स
  • दिल्ली: सफदरजंग रोड स्थित लेखा विहार और सिंधिया विला
  • लुटियंस और सिंधिया पार्टी इलाके में कई कीमती संपत्तियां
  • उज्जैन: शिप्रा नदी के तट पर स्थित ऐतिहासिक कालिदेह पैलेस
  • व्यापारिक कंपनियां: सिंधिया इन्वेस्टमेंट प्राइवेट लिमिटेड समेत कई अन्य व्यावसायिक होल्डिंग्स

23 दावेदार: बंटवारा क्यों बन गया है इतना जटिल?

इस अरबों रुपये की शाही जायदाद पर सिर्फ ज्योतिरादित्य सिंधिया का ही दावा नहीं है। कानूनी कागजों के मुताबिक, इस संपत्ति के कुल 23 कानूनी दावेदार सामने आ चुके हैं।

प्रमुख दावेदार:

  1.  ज्योतिरादित्य सिंधिया
  2.  यशोधरा राजे सिंधिया (बुआ)
  3.  वसुंधरा राजे सिंधिया (बुआ)
  4.  ऊषा राजे राणा (बुआ)
  5.  कनिका देवी, प्रतिमा देवी, और चित्रांगदा राजे

इतने सारे दावेदारों की मौजूदगी और सभी के हिस्सों को सही तरीके से तय करने की मजबूरी ने इस मामले को और भी ज्यादा पेचीदा बना दिया है।

आगे क्या होगा? वकील की राय

ग्वालियर जिला अदालत के वरिष्ठ अभिभाषक चैन सिंह राजपूत के अनुसार: “अगर सिंधिया परिवार धारा 23(1) का विकल्प चुनता तो ब्योरा देने से बच सकता था। परंतु धारा 23(3) के तहत कोर्ट से आधिकारिक समझौता डिक्री लेने के लिए पूरी जायदाद का इंडेक्स और नक्शा जमा करना अनिवार्य है। परिवार अब कानूनी रूप से इस जानकारी को छिपा नहीं सकता।”

अब सबकी निगाहें अदालत की अगली सुनवाई पर टिकी हैं।

देखना यह होगा कि क्या सिंधिया परिवार कोर्ट में अपनी पूरी संपत्ति का ब्योरा पेश कर समझौता डिक्री हासिल करता है, या फिर यह ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई एक बार फिर आगे टल जाती है!

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