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कौन हैं हरीश राणा? जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने दी इच्छामृत्यु की अनुमति, माता-पिता ने मांगी थी बेटे के लिए मौत!

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Harish Rana Euthanasia Case: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 11 मार्च 2026 को इच्छामृत्यु के एक केस पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

गाजियाबाद के रहने वाले 32 वर्षीय हरीश राणा, जो पिछले 13 वर्षों से ‘वेजिटेटिव स्टेट’ (अचेतन अवस्था) में थे, उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने ‘पैसिव यूथेनेशिया’ यानी ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ की अनुमति दे दी है।

यह फैसला जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने सुनाया।

फैसला पढ़ते समय जजों की आंखें भी नम थीं, क्योंकि यह केवल एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि एक मरते हुए इंसान की गरिमा को बहाल करने की कोशिश थी।

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कौन हैं हरीश राणा और कैसे बदली जिंदगी?

हरियाणा के मूल निवासी हरीश राणा चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे।

उन्हें बॉडीबिल्डिंग का शौक था और वे अपनी सेहत को लेकर बेहद जागरूक थे।

लेकिन 20 अगस्त 2013 की उस काली तारीख ने सब कुछ बदल दिया।

हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के कारण हरीश के सिर में गंभीर चोटें आईं।

हादसे के बाद डॉक्टरों ने बताया कि उनके दिमाग की नसें सूख चुकी हैं।

वे ‘क्वाड्रिप्लेजिया’ के शिकार हो गए, जिसका अर्थ है शरीर के चारों अंगों और धड़ का पूरी तरह लकवाग्रस्त हो जाना।

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पिछले 13 सालों से हरीश न तो बोल सकते थे, न कुछ महसूस कर सकते थे।

बस उनकी पलकें झपकती थीं, जो उनके जिंदा होने का एकमात्र प्रमाण था।

माता-पिता का संघर्ष और अदालत की चौखट

हरीश के पिता अशोक राणा और मां निर्मला राणा ने अपने बेटे को बचाने के लिए जमीन-आसमान एक कर दिया।

चंडीगढ़ PGI से लेकर दिल्ली AIIMS और कई बड़े प्राइवेट अस्पतालों के चक्कर काटे गए।

सालों तक चले इलाज ने परिवार को आर्थिक और मानसिक रूप से तोड़ दिया।

बिस्तर पर लेटे-लेटे हरीश के शरीर पर गहरे ‘बेडसोर्स’ (घाव) हो गए थे।

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जब डॉक्टरों ने साफ कर दिया कि अब सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है, तब थक-हारकर माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई कि उनके बेटे को इस ‘लिविंग डेथ’ (जीती-जागती मौत) से मुक्ति दी जाए।

सुप्रीम कोर्ट का तर्क और शेक्सपीयर का जिक्र

सुनवाई के दौरान अदालत ने दो मेडिकल बोर्ड गठित किए थे। दोनों बोर्डों ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि हरीश के ठीक होने की संभावना शून्य है।

जस्टिस पारदीवाला ने फैसला सुनाते हुए मशहूर साहित्यकार विलियम शेक्सपीयर के नाटक ‘हेमलेट’ के संवाद “To be or not to be” (होना या न होना) का जिक्र किया।

उन्होंने कहा कि अक्सर अदालतों के सामने ऐसे सवाल आते हैं जहां ‘मरने के अधिकार’ पर विचार करना पड़ता है।

कोर्ट ने अमेरिकी धर्मगुरु हेनरी वार्ड बीचर की पंक्तियों को भी दोहराया— ईश्वर मनुष्य से यह नहीं पूछते कि वह जीवन स्वीकार करता है या नहीं, उसे जीवन लेना ही पड़ता है।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि जब इलाज का कोई लाभ न हो और मरीज केवल मशीनों के सहारे कष्ट में जी रहा हो, तो उसे गरिमा के साथ विदा होने देना ही सही फैसला है।

पैसिव यूथेनेशिया क्या है और भारत में कानून?

भारत में दो तरह की इच्छामृत्यु की चर्चा होती है:

  1. एक्टिव यूथेनेशिया (सक्रिय): इसमें जहर का इंजेक्शन देकर जान ली जाती है। भारत में यह पूरी तरह अवैध है और इसे हत्या माना जाता है।

  2. पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय): इसमें मरीज को जीवित रखने वाले बाहरी साधनों (जैसे वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब या दवाइयां) को हटा लिया जाता है, जिससे प्रकृति अपना काम करती है और मरीज की मृत्यु हो जाती है।

2018 के ‘कॉमन कॉज’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि ‘सम्मान के साथ मरना’ संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का ही एक हिस्सा है।

हरीश राणा का मामला उसी फैसले के बाद दिया गया पहला बड़ा न्यायिक आदेश है।

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AIIMS को निर्देश और भविष्य की राह

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली एम्स (AIIMS) को निर्देश दिया है कि हरीश को तुरंत भर्ती किया जाए और चरणबद्ध तरीके से उनका लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाया जाए।

कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि यह पूरी प्रक्रिया बेहद मानवीय तरीके से और मरीज की गरिमा को ध्यान में रखकर पूरी की जानी चाहिए।

साथ ही, अदालत ने केंद्र सरकार से इस संवेदनशील विषय पर एक ठोस कानून बनाने की भी अपील की है, ताकि भविष्य में परिवारों को इतनी लंबी कानूनी लड़ाई न लड़नी पड़े।

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हरीश राणा का मामला समाज के लिए एक बड़ा सवाल छोड़ जाता है कि विज्ञान और चिकित्सा की सीमाओं के बीच मानवीय संवेदनाओं का स्थान कहां है।

यह फैसला उन हजारों परिवारों के लिए एक उम्मीद की किरण है जिनके अपने सालों से ‘कोमा’ के अंधेरे में कैद हैं।

हरीश अब शारीरिक कष्ट से मुक्त होंगे, लेकिन उनका मामला भारत के न्यायिक इतिहास में हमेशा जिंदा रहेगा।

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