Sabarimala Supreme Court Hearing: भारत के न्यायिक इतिहास में कुछ मामले ऐसे होते हैं जो केवल एक कानून तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे देश की सामाजिक संरचना पर सवाल उठाते हैं।
सबरीमाला मंदिर का मामला ऐसा ही है। केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु वाली महिलाओं (रजस्वला आयु वर्ग) के प्रवेश पर सदियों पुरानी रोक को लेकर सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक बेंच सुनवाई कर रही है।

आज की सुनवाई में कोर्ट ने बेहद तीखे और गहरे सवाल पूछे, जिनका सीधा संबंध मानवीय गरिमा और ईश्वर के प्रति भक्ति से है।
कोर्ट का सवाल: छूने से देवता अपवित्र कैसे?
सुनवाई के दौरान जस्टिस अमानुल्लाह ने एक बहुत ही बुनियादी मगर गहरा सवाल उठाया।
उन्होंने पूछा कि आखिर वह कौन सा तर्क है जिसके तहत यह माना जाता है कि एक भक्त के छूने मात्र से देवता ‘अपवित्र’ हो जाते हैं?
उन्होंने टिप्पणी की कि “ईश्वर और उसकी रचना (मनुष्य) के बीच कोई अंतर नहीं हो सकता।”

कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि अगर कोई व्यक्ति कीचड़ में गिर जाए, तो वह खुद को साफ कर सकता है, शुद्धिकरण कर सकता है, लेकिन किसी को उसके ‘जन्म’ या ‘वंश’ के आधार पर स्थायी रूप से अयोग्य करार दे देना कि वह कभी अपने रचयिता को नहीं छू सकता, क्या यह संविधान के खिलाफ नहीं है?
वकील की दलील: नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं भगवान अयप्पा
मंदिर प्रशासन और परंपरा के पक्षधर वकील एडवोकेट वी. गिरी ने अपनी दलीलों में ‘आगम’ (धार्मिक ग्रंथों) और मंदिर के देवता की विशिष्टता का हवाला दिया।
उन्होंने कहा कि हर मंदिर में होने वाले रीति-रिवाज उस मंदिर की आत्मा होते हैं।
सबरीमाला के मामले में, भगवान अयप्पा ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ रूप में विराजमान हैं।

वकील के अनुसार, देवता की पूजा उनकी विशेषताओं के अनुसार ही होनी चाहिए।
उन्होंने तर्क दिया कि मंदिर में पूजा करने वाले ‘अर्चक’ (पुजारी) का एक विशेष संप्रदाय और शुद्धता की स्थिति में होना अनिवार्य है।
अगर कोई ऐसा व्यक्ति मूर्ति को छूता है जो उन नियमों का पालन नहीं करता, तो शास्त्रों के अनुसार मूर्ति अपवित्र हो जाती है और ईश्वर उसमें निवास करना बंद कर देते हैं।

संविधान और व्यक्तिगत गरिमा का टकराव
जस्टिस सुंदरेश और जस्टिस अमानुल्लाह ने इस मुद्दे को मानवाधिकारों के चश्मे से भी देखा।
उन्होंने सवाल किया कि अगर एक आस्तिक व्यक्ति, जो पूरी तरह से समर्पित है, जिसके मन में कोई खोट नहीं है, उसे केवल इसलिए मंदिर के गर्भगृह या मूर्ति के स्पर्श से रोका जाए क्योंकि उसका जन्म एक विशेष लिंग या वंश में हुआ है, तो क्या संविधान उसकी रक्षा के लिए आगे नहीं आएगा?
यह सवाल अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 26 (धार्मिक संप्रदायों के अधिकार) के बीच के संतुलन को लेकर है।

क्या एक संप्रदाय के नियम किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों को पूरी तरह से दबा सकते हैं?
वकील का पलटवार: मंदिर जाना अनिवार्य नहीं
एडवोकेट गिरी ने एक रोचक पक्ष रखा कि हिंदू धर्म में ‘मंदिर जाना’ अनिवार्य नहीं है।
कोई व्यक्ति घर पर पूजा करके भी एक ‘अभ्यासी हिंदू’ बना रह सकता है।
उन्होंने तर्क दिया कि जब कोई भक्त मंदिर जाता है, तो उसे उस मंदिर के नियमों और देवता की प्रकृति को स्वीकार करना पड़ता है।
मंदिर का रख-रखाव और पूजा की विधि ‘अछूता क्षेत्र’ है, जिसमें अदालत को दखल नहीं देना चाहिए।

7 संवैधानिक सवाल: जिन पर टिका है फैसला
सुप्रीम कोर्ट इस मामले में केवल सबरीमाला पर बात नहीं कर रहा, बल्कि सात बड़े सवालों के जवाब ढूंढ रहा है:
- धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा क्या है?
- ‘संवैधानिक नैतिकता’ क्या है?
- धार्मिक प्रथाओं में अदालती हस्तक्षेप की हद क्या हो?
- व्यक्तिगत अधिकारों और संप्रदाय के अधिकारों में संतुलन कैसे बने?
- क्या अनुच्छेद 26 के अधिकार अन्य अधिकारों से ऊपर हैं?
- ‘हिंदुओं के वर्ग’ का सही अर्थ क्या है?
- क्या कोई बाहरी व्यक्ति (जो उस धर्म का नहीं है) जनहित याचिका डाल सकता है?

इतिहास और वर्तमान का घटनाक्रम
यह विवाद 1991 में केरल हाईकोर्ट के उस फैसले से शुरू हुआ था जिसने महिलाओं की एंट्री पर रोक लगाई थी।
2018 में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने इस बैन को हटा दिया था, लेकिन उसके बाद पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं।
अब 2026 में, 9 जजों की बेंच इस पर अंतिम स्पष्टता देने की ओर बढ़ रही है।

कल आ सकता है फैसला
कल आने वाला संभावित फैसला केवल सबरीमाला के लिए नहीं, बल्कि भारत के तमाम मंदिरों, मस्जिदों और पूजा स्थलों के लिए एक नजीर (Precedent) बनेगा।
क्या परंपराएं बदलती पीढ़ी और संविधान के साथ कदम मिलाएंगी या सदियों पुरानी मान्यताएं अपने अस्तित्व को बचाए रखेंगी, यह देखना दिलचस्प होगा।
