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CBSE 3-Language Policy: सुप्रीम कोर्ट का रोक से इनकार, 50 लाख छात्रों को मिली बड़ी राहत; CJI बोले- ‘भाषा सीखना कभी बेकार नहीं जाता’

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

CBSE 3 Language Policy: सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) के स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों और उनके माता-पिता के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण खबर है।

सुप्रीम कोर्ट ने CBSE की नई थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी (Three-Language Policy) पर तुरंत रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है।

यह पॉलिसी इसी मौजूदा शैक्षणिक सत्र 2026-27 से लागू हो चुकी है।

कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा कि भाषा सीखना कभी भी इंसान के लिए बेकार नहीं जाता।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच इस पूरे मामले पर आगे की सुनवाई करेगी।

आइए जानते हैं कि यह पूरा मामला क्या है और इससे आपके बच्चों की पढ़ाई पर क्या असर पड़ने वाला है।

कोर्ट में क्यों पहुंचा मामला? क्या हैं चिंताएं?

याचिकाकर्ताओं और उनके वकीलों (सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी और गोपाल शंकरनारायणन) ने कोर्ट में दलील दी कि इस नई पॉलिसी को अचानक लागू करने से छात्रों और स्कूलों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

उनकी मुख्य चिंताएं निम्नलिखित हैं:

अचानक भाषा बदलने का दबाव: वकीलों का कहना है कि जो छात्र कक्षा 5 से लगातार फ्रेंच या कोई अन्य विदेशी भाषा पढ़ रहे हैं, उन्हें अचानक कक्षा 9 में आकर कोई नई भारतीय भाषा (जैसे तमिल या अन्य) चुनने और उसकी परीक्षा देने को कहा जा रहा है, जो व्यावहारिक नहीं है।

किताबों और शिक्षकों की भारी कमी: कोर्ट में बताया गया कि स्कूलों के पास न तो नई भाषाएं पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक हैं और न ही किताबें। एनसीईआरटी (NCERT) की वेबसाइट पर भी सिर्फ तीन भाषाओं की किताबें ही उपलब्ध थीं।

नौकरी जाने का डर: अगर अचानक स्कूल अपने भाषा के विकल्प बदलते हैं, तो विदेशी भाषाएं सिखाने वाले कई शिक्षकों की नौकरी खतरे में पड़ सकती है।

इन दलीलों पर सकारात्मक रुख अपनाते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि भाषा का ज्ञान हमेशा काम आता है।

साथ ही उन्होंने आश्वस्त किया कि यदि किसी शिक्षक को नौकरी से निकाला जाता है, तो कोर्ट उन्हें वापस नौकरी पर रखवाने की ताकत रखता है।

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राहत की बात: सरकार और CBSE का ‘यू-टर्न’

विवाद बढ़ता देख CBSE ने अपनी गाइडलाइंस में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं, जिससे करीब 50 लाख छात्रों को बड़ी राहत मिली है।

अब नई नीति को अचानक थोपने के बजाय चरणबद्ध तरीके (Phased Manner) से लागू किया जा रहा है:

  • वर्तमान कक्षा: क्या बदलाव होगा? (सत्र 2026-27 के लिए) 
  • कक्षा 10: कोई बदलाव नहीं। छात्र पहले की तरह केवल दो भाषाओं के साथ ही बोर्ड परीक्षा देंगे। उन्हें तीसरी भाषा की कोई परीक्षा नहीं देनी होगी। 
  • कक्षा 9: इन्हें तीन भाषाएं पढ़नी होंगी (जिसमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं अनिवार्य हैं)। लेकिन जब ये छात्र अगले साल कक्षा 10 में जाएंगे, तो इन्हें तीसरी भाषा की बोर्ड परीक्षा नहीं देनी होगी। इसका मूल्यांकन केवल स्कूल स्तर पर होगा। 
  • कक्षा 7 और 8: इन छात्रों पर भी कक्षा 9 वाला नियम लागू होगा। तीसरी भाषा पढ़नी होगी, लेकिन 10वीं बोर्ड में इसकी परीक्षा नहीं होगी। स्कूल स्तर पर ही ग्रेड दिए जाएंगे। 
  • कक्षा 6: यही वह पहला बैच है जिस पर यह पॉलिसी पूरी तरह लागू होगी। इन्हें कक्षा 6 से तीन भाषाएं पढ़नी होंगी और जब ये छात्र कक्षा 10 में पहुंचेंगे, तो इन्हें तीसरी भाषा की बाकायदा बोर्ड परीक्षा भी देनी होगी।

क्या है नई शिक्षा नीति (NEP 2020)?

यह पूरा बदलाव देश की नई शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) के तहत किया जा रहा है, जिसे 29 जुलाई 2020 को मंजूरी दी गई थी।

भारत की शिक्षा प्रणाली में पूरे 34 साल बाद (1986 के बाद) यह ऐतिहासिक बदलाव किया गया है।

इसका मुख्य उद्देश्य छात्रों को रट्टा मारने की जगह व्यावहारिक ज्ञान, कौशल (Skills) और अपनी संस्कृति व भाषाओं से जोड़ना है।

चूंकि शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची (Concurrent List) में आती है, इसलिए केंद्र और राज्यों दोनों का इस पर अधिकार है। केंद्र सरकार ने इसे पूरी तरह लागू करने के लिए साल 2030 तक का लक्ष्य रखा है।

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