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SIR पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: चुनाव आयोग की ‘विशेष जांच’ सही, वोटर लिस्ट से संदिग्ध नाम हटाने का फैसला वैध

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Supreme Court on SIR: देश की सबसे बड़ी अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम और दूरगामी फैसला सुनाया है।

कोर्ट ने चुनाव आयोग द्वारा चलाई गई ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया को पूरी तरह से कानूनी, सही और संवैधानिक माना है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुआई वाली बेंच ने साफ कर दिया कि चुनाव आयोग के पास वोटर लिस्ट को दुरुस्त करने के लिए ऐसी विशेष प्रक्रिया अपनाने का पूरा अधिकार है और इसे मनमाना या गलत नहीं ठहराया जा सकता।

इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को एक सख्त निर्देश भी दिया है।

कोर्ट ने कहा है कि जिन लोगों के नाम नागरिकता के संदेह के आधार पर वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उनकी सूची अगले चार हफ्तों के भीतर केंद्र सरकार को सौंपी जाए।

आखिर क्या है यह पूरा मामला और क्यों मचा था बवाल?

इस पूरे विवाद की शुरुआत करीब 11 महीने पहले हुई थी, जब चुनाव आयोग ने बिहार विधानसभा चुनावों से ठीक पहले वहां ‘एसआईआर’ (SIR) प्रक्रिया शुरू की।

बिहार के बाद पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी जैसे राज्यों में भी यही प्रक्रिया दोहराई गई।

वहीं असम में ‘विशेष पुनरीक्षण’ (SR) चलाया गया।

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इन सभी राज्यों को मिलाकर कुल मिलाकर लगभग 2.65 करोड़ वोटर्स के नाम वोटर लिस्ट से काट दिए गए।

इतनी बड़ी संख्या में नाम कटने के बाद विपक्षी दलों और प्रभावित लोगों में हड़कंप मच गया।

इसके खिलाफ सबसे पहले बिहार से मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जिसके बाद अन्य राज्यों से भी कई याचिकाएं दायर की गईं।

याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि चुनाव आयोग जानबूझकर एक खास प्रक्रिया के तहत लोगों को उनके सबसे बड़े लोकतांत्रिक अधिकार (वोट देने के अधिकार) से वंचित कर रहा है।

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सुप्रीम कोर्ट ने 5 जरूरी सवालों के जरिए दिया फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले पर करीब 10 महीने तक लगातार मैराथन सुनवाई की।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने पांच मुख्य सवाल तय किए और उन्हीं के आधार पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया:

1. क्या चुनाव आयोग के पास ऐसा करने का हक है?

कोर्ट ने साफ कहा कि चुनाव आयोग ने अपनी कानूनी सीमाओं के बाहर जाकर कोई काम नहीं किया है।

सिर्फ इसलिए कि यह एक विशेष और अलग प्रक्रिया थी, इसे गैरकानूनी नहीं कहा जा सकता।

चुनाव आयोग का मकसद किसी को परेशान करना नहीं, बल्कि देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना है।

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2. क्या यह प्रक्रिया सही और सटीक है?

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, एसआईआर की प्रक्रिया पूरी तरह से संतुलित है।

वोटर लिस्ट को साफ-सुथरा और सही रखना निष्पक्ष चुनाव के लिए बहुत जरूरी है और आयोग द्वारा उठाए गए कदम जरूरत से ज्यादा सख्त नहीं हैं।

3. क्या यह जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RP Act) के खिलाफ है?

अदालत ने कहा कि चूंकि यह प्रक्रिया कानूनी रूप से सही है, इसलिए यह जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के किसी भी नियम या कानून का उल्लंघन नहीं करती है।

4. क्या आयोग को दस्तावेज मांगने का अधिकार है?

वोटर लिस्ट में नाम बनाए रखने के लिए चुनाव आयोग ने 11 तरह के दस्तावेजों की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन दस्तावेजों की सूची मनमानी नहीं है।

साथ ही, अदालत ने अपने आदेश के जरिए इसमें पहचान के एक और पुख्ता माध्यम के रूप में आधार कार्ड को भी शामिल करने की बात कही।

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बिना किसी पुख्ता दस्तावेज के वोटर लिस्ट का सत्यापन करना व्यावहारिक रूप से मुमकिन नहीं है।

5. जिन लोगों के नाम कट गए, अब उनका क्या होगा?

यह इस फैसले का सबसे राहत देने वाला हिस्सा है। कोर्ट ने कहा कि जिन लोगों के नाम काटे गए हैं, उनका मामला 4 हफ्ते में नागरिकता तय करने वाले संबंधित सरकारी प्राधिकारी (अथॉरिटी) के पास भेजा जाए।

वह अथॉरिटी आगामी चुनावों से पहले उन लोगों को बकायदा नोटिस देगी, उन्हें अपनी बात और दस्तावेज रखने का पूरा मौका देगी।

अगर यह साबित हो जाता है कि वे भारत के वैध नागरिक हैं, तो उनका नाम तुरंत दोबारा वोटर लिस्ट में जोड़ा जाएगा।

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विपक्ष का क्या तर्क था?

विपक्षी दलों का मुख्य विरोध टाइमिंग और जल्दबाजी को लेकर था।

विपक्ष का कहना था कि पिछले 22 सालों में बिहार में कई चुनाव हो चुके हैं, तो क्या वे सारे चुनाव गलत थे?

अगर चुनाव आयोग को यह जांच करनी ही थी, तो इसकी घोषणा ऐन वक्त पर जून के अंत में क्यों की गई?

विपक्ष का यह भी तर्क था कि इस प्रक्रिया को चुनावों के बाद भी आराम से किया जा सकता था, इसे इतनी हड़बड़ी में करने की क्या जरूरत थी?

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हालांकि, देश की सर्वोच्च अदालत ने इन सभी राजनीतिक और तकनीकी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए चुनाव आयोग के कदम को लोकतंत्र के हित में सही ठहराया है।

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