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भाषण ट्रांसलेटर से केंद्रीय मंत्री तक का सफर: राज्यसभा का टिकट कटते ही जॉर्ज कुरियन ने क्यों छोड़ी मोदी कैबिनेट?

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

George Kurian Resigns: मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल से एक बड़ी खबर सामने आ रही है।

केंद्रीय राज्य मंत्री जॉर्ज कुरियन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।

मंगलवार को राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी एक प्रेस रिलीज में बताया गया कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सलाह पर जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है।

हालांकि, इस सरकारी बयान में इस्तीफे की किसी ठोस वजह का जिक्र नहीं किया गया है, लेकिन सियासी गलियारों में इसे लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है।

48 घंटे के भीतर मंत्री पद से विदाई

65 वर्षीय जॉर्ज कुरियन मोदी सरकार 3.0 में अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के साथ-साथ मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय में राज्य मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।

वह अगस्त 2024 से मध्य प्रदेश कोटे से राज्यसभा के सांसद थे।

ठीक दो दिन पहले, यानी 21 जून 2026 को उनका राज्यसभा का कार्यकाल समाप्त हुआ था और उसके महज 48 घंटे के भीतर ही उन्होंने मंत्री पद भी छोड़ दिया।

केरल चुनाव में झटका और बदल गए समीकरण, नहीं मिला दोबारा मौक

जॉर्ज कुरियन को दोबारा राज्यसभा न भेजे जाने और अब उनके इस्तीफे के पीछे केरल के राजनीतिक समीकरणों को सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है।

कुरियन केरल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक बेहद सीनियर और पढ़े-लिखे नेता हैं।

वह केरल के ताकतवर ईसाई समुदाय (सीरो-मालाबार कैथोलिक चर्च) से आते हैं।

जब साल 2024 में उन्हें केंद्र में मंत्री बनाया गया था, तब भाजपा की रणनीति केरल के ईसाई वोट बैंक में अपनी पकड़ मजबूत करने की थी।

कुरियन की अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब भी पीएम नरेंद्र मोदी या गृह मंत्री अमित शाह केरल के दौरे पर जाते थे, तो उनके हिंदी या अंग्रेजी भाषणों को मलयालम में ट्रांसलेट करने की जिम्मेदारी जॉर्ज कुरियन ही संभालते थे।

वह टीवी डिबेट्स में भी पार्टी का बड़ा चेहरा रहे हैं।

लेकिन हाल ही में (मई 2026) संपन्न हुए केरल विधानसभा चुनाव में भाजपा को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा।

पार्टी 140 सीटों में से केवल 3 सीटें ही जीत सकी।

माना जा रहा है कि उम्मीद के मुताबिक नतीजे न आने के कारण आलाकमान ने उन्हें दोबारा मौका नहीं दिया।

हाल ही में 12 राज्यों की 26 राज्यसभा सीटों पर हुए चुनाव में भाजपा ने रवनीत सिंह बिट्टू और जॉर्ज कुरियन दोनों के टिकट काट दिए थे।

संवैधानिक मजबूरी नहीं था इस्तीफा

इस पूरे इस्तीफे में सबसे दिलचस्प बात यह है कि कुरियन का यह कदम कोई संवैधानिक मजबूरी नहीं था।

हमारे देश के संविधान के अनुच्छेद 75(5) के तहत यह नियम है कि यदि कोई व्यक्ति संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) का सदस्य नहीं भी है, तब भी वह लगातार 6 महीने तक मंत्री पद पर बना रह सकता है।

इस लिहाज से देखा जाए तो सांसदी खत्म होने के बाद भी जॉर्ज कुरियन के पास अगले 6 महीने तक मंत्री रहने का कानूनी अधिकार था।

इस दौरान सरकार उन्हें किसी अन्य राज्य से राज्यसभा भेज सकती थी।

इसलिए उनका तुरंत इस्तीफा दे देना यह साफ करता है कि यह पार्टी का एक सोचा-समझा राजनीतिक फैसला है।

दक्षिण में भाजपा को एक और झटका

जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा दक्षिण भारत में भाजपा के लिए एक महीने के भीतर दूसरा बड़ा झटका है।

इससे पहले तमिलनाडु भाजपा के फायरब्रैंड नेता और पूर्व आईपीएस अधिकारी के. अन्नामलाई ने भी 2 जून को पार्टी से इस्तीफा दे दिया था।

अन्नामलाई ने तो भाजपा से अलग होकर अपनी नई राजनीतिक पार्टी बनाने का भी एलान कर दिया है, जो 2031 का विधानसभा चुनाव लड़ेगी।

दक्षिण के दो बड़े चेहरों के इस तरह हटने के बाद अब मोदी कैबिनेट में एक बड़े फेरबदल की सुगबुगाहट तेज हो गई है।

जॉर्ज कुरियन: एक नजर में

  • जन्म: 20 सितंबर 1960, कोट्टायम (केरल)
  • शिक्षा व पेशा: कानून में पोस्ट ग्रेजुएशन (LLM), सुप्रीम कोर्ट के वकील।
  • अनुभव: राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष।
  • राजनीतिक सफर: 1980 में भाजपा की स्थापना के समय से जुड़े। जून 2024 में केंद्रीय मंत्री बने और अगस्त 2024 में मध्य प्रदेश से राज्यसभा पहुंचे।

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