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60 दिन की मोहलत, 14 कड़े नियम: जानिए अमेरिका-ईरान की इस ऐतिहासिक ‘डिजिटल डील’ में क्या है?

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

US Iran Peace Deal 2026: दुनिया के नक्शे पर लंबे समय से सुलग रही अमेरिका और ईरान की दुश्मनी पर आखिरकार विराम लग गया है।

दोनों देशों के बीच चल रही जंग को खत्म करने के लिए एक ऐतिहासिक अंतरिम समझौते (MoU) पर दस्तखत हो गए हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बुधवार रात फ्रांस के मशहूर वर्साय पैलेस में इस बेहद अहम समझौते पर हस्ताक्षर किए।

इस ऐतिहासिक पल के गवाह फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भी बने।

खास बात यह रही कि जहां ट्रम्प ने खुद फ्रांस में रहकर समझौते पर पेन चलाया, वहीं ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने ईरान से ही ‘डिजिटल सिग्नेचर’ (इलेक्ट्रॉनिक दस्तखत) के जरिए इस डील को मंजूरी दी।

भारतीय समय के मुताबिक, गुरुवार सुबह करीब 5:30 बजे इस समझौते का आधिकारिक ऐलान किया गया और यह तुरंत प्रभाव से लागू भी हो गया है।

ट्रम्प बोले- रास्ता आसान नहीं था

वर्साय पैलेस में जब यह समझौता हो रहा था, तब वहां का माहौल देखने लायक था। दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने से ठीक पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कुछ सेकंड के लिए रुके।

उन्होंने वहां मौजूद नेताओं और मीडिया की तरफ देखा और चिल्लाकर बोले, “यह आसान नहीं था। मैं आपको सच बता सकता हूं, इसके लिए बहुत पापड़ बेलने पड़े हैं।”

इसके बाद उन्होंने मुस्कुराते हुए समझौते के पहले पन्ने पर अपने दस्तखत किए।

पहले से तय कार्यक्रम के मुताबिक, इस समझौते पर 19 जून को स्विट्जरलैंड के लूसर्न शहर में दस्तखत होने थे। लेकिन दोनों देशों की तत्परता को देखते हुए इसे तय समय से एक दिन पहले ही पूरा कर लिया गया।

अब शुक्रवार को स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट में दोनों देशों के अधिकारियों के बीच पहली औपचारिक बैठक होगी, जिसमें मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे कतर और पाकिस्तान के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे।

समझौते का 14 पॉइंट वाला पूरा खाका

अमेरिकी मीडिया नेटवर्क CNN के हवाले से इस अंतरिम समझौते का 14 सूत्रीय मसौदा सामने आया है, जो दोनों देशों को अगले 60 दिनों तक एक कड़े अनुशासन में बांधेगा:

1. युद्ध पर तुरंत रोक: दोनों देश सभी मोर्चों पर तुरंत सैन्य कार्रवाई और युद्ध बंद करेंगे।

2. संप्रभुता का सम्मान: अमेरिका और ईरान एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देंगे।

3. 60 दिन का अल्टीमेटम: अगले 60 दिनों के भीतर दोनों देश एक स्थायी और अंतिम समझौते पर पहुंचने की कोशिश करेंगे।

4. समुद्री रास्ता खुलेगा (अमेरिका): अमेरिका 30 दिनों के भीतर ईरान की नौसैनिक नाकेबंदी पूरी तरह हटा लेगा।

5. जहाजों की आवाजाही (ईरान): ईरान भी 30 दिनों में होर्मुज स्ट्रेट से व्यापारिक जहाजों का रास्ता साफ करेगा।

6. 300 अरब डॉलर का फंड: अमेरिका और उसके मित्र देश मिलकर ईरान को दोबारा पैरों पर खड़ा करने के लिए 300 अरब डॉलर का पुनर्निर्माण फंड बनाएंगे।

7. प्रतिबंधों से आजादी: अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के जरिए ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने का काम शुरू करेगा।

8. नो न्यूक्लियर वेपन: ईरान ने साफ कर दिया है कि वह कभी भी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा।

9. यथास्थिति बरकरार: अंतिम फैसला होने तक ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे नहीं बढ़ाएगा और अमेरिका कोई नया प्रतिबंध नहीं थोपेगा।

10. तेल व्यापार को छूट: अमेरिका जल्द ही ईरानी तेल और पेट्रोकेमिकल उत्पादों की बिक्री पर लगी पाबंदियों में ढील देगा।

11. जब्त पैसा वापस मिलेगा: विदेशों में फंसी ईरान की अरबों डॉलर की संपत्ति और फंड को वापस रिलीज किया जाएगा।

12. निगरानी के लिए कमेटी: समझौते की शर्तों को दोनों देश सही से मान रहे हैं या नहीं, इसके लिए एक स्पेशल मॉनिटरिंग सिस्टम बनाया जाएगा।

13. बाकी मुद्दों पर बाद में बात: व्यापार और समुद्री रास्ते सुचारू होने के बाद ही अन्य बचे हुए विवादित मुद्दों पर चर्चा होगी।

14. UN की मुहर: इस पूरे अंतरिम समझौते के बाद जो फाइनल डील होगी, उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) से मंजूरी दिलाई जाएगी।

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फ्लैशबैक: 2015 से अब तक की कहानी

ईरान का परमाणु कार्यक्रम हमेशा से ही दुनिया के लिए सिरदर्द रहा है। ईरान कहता आया है कि वह सिर्फ बिजली बनाने (शांतिपूर्ण काम) के लिए यूरेनियम तैयार कर रहा है, जबकि अमेरिका और इजरायल को डर था कि ईरान चुपके से परमाणु बम बना रहा है।

साल 2015 में बराक ओबामा के समय एक परमाणु समझौता (JCPOA) हुआ था, जिसमें ईरान यूरेनियम को केवल 3.67% तक ही संवर्धित (Enrich) करने पर राजी हुआ था (परमाणु बम के लिए 90% से ज्यादा की जरूरत होती है)।

लेकिन 2018 में डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने पिछले कार्यकाल में अमेरिका को इस डील से बाहर कर लिया और ईरान पर सख्त पाबंदियां लगा दीं।

नतीजा यह हुआ कि ईरान भड़क गया और उसने यूरेनियम बढ़ाना शुरू कर दिया।

रिपोर्ट के मुताबिक, जून 2025 तक ईरान 60% शुद्धता वाले 400 किलो यूरेनियम का भंडार जमा कर चुका था, जो बम बनाने के बेहद करीब था।

यही वजह थी कि इस युद्ध को रोकना बेहद जरूरी हो गया था।

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क्या सीजफायर टिका रहेगा?

सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्या दोनों देशों की सेनाएं जमीन पर शांत रहेंगी? अगर किसी भी तरफ से कोई उकसावे वाली कार्रवाई हुई, तो यह पूरी मेहनत पानी में मिल जाएगी।

परमाणु चेकिंग कैसे होगी?

ईरान ने बम न बनाने की कसम तो खाई है, लेकिन क्या वह अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों (IAEA) को अपने परमाणु ठिकानों की जांच करने की पूरी आजादी देगा? यह बड़ा सवाल है।

 आर्थिक राहत का सच:

ईरान को अपनी रोती हुई अर्थव्यवस्था के लिए तुरंत पैसा चाहिए। क्या अमेरिका वादे के मुताबिक प्रतिबंध हटाएगा और 300 अरब डॉलर के फंड की शुरुआत करेगा?

होर्मुज स्ट्रेट और भारत को फायदा:

अगर होर्मुज का समुद्री रास्ता खुलता है, तो दुनिया में कच्चे तेल की कीमतें गिरेंगी। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह बहुत बड़ी राहत की खबर होगी।

अस्थायी डील बनेगी स्थायी शांति?

यह सिर्फ एक शुरुआती ढांचा (MoU) है। असली परीक्षा अगले दो महीनों में होगी जब क्षेत्रीय सुरक्षा, प्रतिबंधों की विदाई और अंतरराष्ट्रीय गारंटियों जैसे पेचीदा मुद्दों पर पक्के दस्तखत होने बाकी हैं।

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