War effect on medicine: दुनिया के एक हिस्से में युद्ध छिड़ा है, लेकिन उसका दर्द भारत के मध्य प्रदेश के उन परिवारों को महसूस होने वाला है, जहाँ हर रोज दवाइयां खाई जाती हैं।
ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने न केवल तेल की कीमतों को बल्कि जीवनरक्षक दवाओं की सप्लाई चेन को भी हिलाकर रख दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगले 15 से 20 दिनों में दवाइयों की कीमतें 25 से 30 फीसदी तक बढ़ सकती हैं।

क्यों महंगी हो रही हैं दवाइयां? (चीन और कच्चे माल का खेल)
दवा बनाने के लिए जो सबसे जरूरी चीज होती है, उसे विज्ञान की भाषा में API (Active Pharmaceutical Ingredient) कहते हैं।
सरल शब्दों में कहें तो यह दवा का ‘कच्चा माल’ है।
भारत अपनी दवाइयों के लिए इस कच्चे माल का बड़ा हिस्सा चीन से मंगाता है।

युद्ध की वजह से समुद्र के रास्ते असुरक्षित हो गए हैं। जहाजों को अब लंबा रास्ता तय करना पड़ रहा है।
जो माल शंघाई से मुंबई 30-40 दिनों में पहुँच जाता था, उसे आने में अब 80 से 90 दिन लग रहे हैं।
समय बढ़ने के साथ-साथ शिपिंग की लागत भी 15 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 40 रुपये तक पहुँच गई है।
इसका सीधा असर कच्चे माल की कीमतों पर पड़ा है।

कच्चे माल की कीमतों में लगी आग
आंकड़ों पर गौर करें तो स्थिति चिंताजनक है:
- पैरासिटामोल: इसका कच्चा माल ₹225 से बढ़कर ₹575 प्रति किलो हो गया है (155% की वृद्धि)।
- प्रोफलीन ग्लाइकॉल (कफ सिरप): इसकी कीमत ₹150 से उछलकर ₹400 हो गई है (166% की वृद्धि)।
- एंटीबायोटिक और पेनकिलर: सिफाक्सिम और आइट्रप्रेड जैसे कच्चे माल की कीमतों में भी भारी उछाल आया है।
मध्य प्रदेश में लगभग 200 छोटी-बड़ी फार्मा कंपनियां हैं जो पूरी तरह से इस कच्चे माल पर निर्भर हैं।
जब लागत ही ढाई गुना बढ़ जाएगी, तो कंपनियों के पास दाम बढ़ाने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा।

बीपी और शुगर के मरीजों पर दोहरी मार
इस महंगाई की सबसे ज्यादा मार उन लोगों पर पड़ेगी जो ‘क्रोनिक’ बीमारियों से जूझ रहे हैं।
बीपी, शुगर, अस्थमा और हृदय रोग के मरीजों को हर दिन दवा लेनी पड़ती है।
- बजट का बिगड़ना: जिस परिवार में बुजुर्गों की दवा पर महीने का ₹3,000 खर्च होता था, अब उन्हें उसी दवा के लिए ₹3,800 से ₹4,000 तक चुकाने पड़ सकते हैं।
- छूट का खत्म होना: बाजार में पहला असर दिखना शुरू हो गया है। जो जेनेरिक दवाएं पहले 10 से 20 फीसदी डिस्काउंट पर मिल जाती थीं, अब केमिस्ट उन्हें पूरी एमआरपी (MRP) पर बेच रहे हैं।

सरकारी अस्पतालों में भी हो सकती है किल्लत
मध्य प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में गरीब मरीजों को मुफ्त दवाएं मिलती हैं।
ये दवाएं टेंडर प्रक्रिया के जरिए छोटी कंपनियां सप्लाई करती हैं।
कच्चे माल के दाम इतने बढ़ गए हैं कि पुराने टेंडर रेट पर दवा सप्लाई करना इन कंपनियों के लिए घाटे का सौदा हो गया है।
अगर युद्ध लंबा चला, तो ये कंपनियां हाथ खींच सकती हैं, जिससे सरकारी अस्पतालों में दवाइयों का संकट खड़ा हो सकता है।

विशेषज्ञों की सलाह: क्या करें मरीज?
दवा बाजार के जानकारों का कहना है कि मरीजों को घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन सावधानी जरूरी है।
- विकल्प तलाशें: अपने डॉक्टर से बात करें और ब्रांडेड दवाओं की जगह सस्ती और भरोसेमंद जेनेरिक दवाओं के बारे में पूछें।
- बफर स्टॉक: यदि आप नियमित दवा लेते हैं, तो कम से कम एक महीने का अतिरिक्त स्टॉक रख सकते हैं।
- जमाखोरी न करें: जरूरत से ज्यादा दवाइयां घर में न भरें, क्योंकि इससे बाजार में कृत्रिम कमी पैदा हो सकती है और दाम और ज्यादा बढ़ सकते हैं।
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