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सिस्टम की सुस्ती और मासूमों की अर्थी? मझगवां में कुपोषण का तांडव, एक बच्ची की मौत के बाद 10 और कुपोषित बच्चे मिले

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Malnutrition in MP: मध्य प्रदेश के सतना जिले के मझगवां में कुपोषण ने एक बार फिर अपना खौफनाक चेहरा दिखाया है।

22 अप्रैल को पथरा सुरांगी निवासी नत्थू प्रजापति की चार माह की बेटी सुप्रांशी की कुपोषण के चलते मौत हो गई थी।

लेकिन मामला यहीं नहीं रुका, इस घटना के बाद भी कुपोषण के 10 और केस मिले हैं।

इस घटना ने स्वास्थ्य विभाग और महिला बाल विकास विभाग के उन दावों की पोल खोल दी है, जो कागजों पर तो चमकदार दिखते हैं, लेकिन जमीन पर दम तोड़ रहे हैं।

जमीन पर मिलीं 10 और ‘सुप्रांशी’

एक मौत के बाद जब प्रशासन की नींद टूटी, तो आनन-फानन में बीएमओ डॉ. रूपेश सोनी की टीम गांव पहुंची।

जांच में जो सच सामने आया वह और भी डराने वाला है।

टीम को उसी इलाके में 10 और बच्चे कुपोषित मिले।

नयागांव की 5 महीने की मोहिनी की हालत इतनी गंभीर थी कि उसे तुरंत रीवा मेडिकल कॉलेज भेजना पड़ा।

मोहिनी का एक कान भी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है।

फिलहाल उसे एनआरसी (पोषण पुनर्वास केंद्र) में भर्ती किया गया है।

फील्ड स्टाफ की भूमिका पर सवाल

ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता डिलीवरी के बाद उनकी सुध नहीं लेते।

सुप्रांशी की दादी सुरतिया ने बताया कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के डर से ग्रामीण खुलकर अपनी बात नहीं कह पाते।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पूजा पांडेय को 2022 में भी एक बच्चे की मौत के बाद बर्खास्त किया गया था, लेकिन उनकी दोबारा नियुक्ति कैसे हुई, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।

फील्ड स्टाफ की लापरवाही का आलम यह है कि बच्चे अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर तो आ जाते हैं, लेकिन दोबारा उनका फॉलोअप नहीं होता, जिससे उनकी हालत फिर बिगड़ जाती है।

सुप्रांशी की मौत: लापरवाही का नतीजा

नत्थू प्रजापति के घर में जुड़वां बच्चों, नैतिक और सुप्रांशी की किलकारियां गूंजी थीं, लेकिन गरीबी और कुपोषण ने जल्द ही खुशियों को मातम में बदल दिया।

21 अप्रैल को दोनों बच्चों की तबीयत बिगड़ी। उन्हें मझगवां के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) ले जाया गया, जहां से उन्हें जिला अस्पताल और फिर रीवा मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया।

लेकिन अफसोस, सुप्रांशी ने रीवा पहुँचने से पहले ही दम तोड़ दिया। उसका भाई नैतिक अभी भी अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा है।

जांच में सामने आया कि बच्चों की मां, विमला प्रजापति, गर्भावस्था के दौरान खुद गंभीर रूप से एनीमिया (खून की कमी) का शिकार थीं। उनका हीमोग्लोबिन मात्र 6.3 ग्राम था।

मेडिकल मानकों के अनुसार, ऐसी स्थिति में मां और बच्चे दोनों खतरे में होते हैं।

विमला को समय पर पर्याप्त इलाज और आयरन के इंजेक्शन नहीं मिले।

अगर प्रशासन ने समय रहते मां के स्वास्थ्य पर ध्यान दिया होता, तो शायद आज सुप्रांशी जीवित होती।

गरीबी और मजबूरी का दुष्चक्र

कुपोषण की समस्या सिर्फ प्रशासनिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक भी है।

गुप्त गोदावरी मोड़ की निजमा ने अपने एक साल के बेटे प्रांशु को एनआरसी ले जाने से मना कर दिया।

उनकी दलील दिल दहला देने वाली है— “मेरे चार बच्चे हैं। अगर मैं एक को लेकर अस्पताल जाऊंगी, तो बाकी तीन क्या खाएंगे? मेरा काम छूट जाएगा तो घर कैसे चलेगा?”

यह सवाल बताता है कि सरकारी योजनाएं गरीब की मजबूरी के आगे कितनी छोटी पड़ जाती हैं।

संसाधनों का अकाल

मझगवां सीएचसी में न तो शिशु रोग विशेषज्ञ है और न ही स्त्री रोग विशेषज्ञ। पूरा अस्पताल राम भरोसे चल रहा है।

इसके अलावा, आवास योजनाओं का लाभ भी गरीबों तक नहीं पहुँच रहा।

96 घरों वाले गांव में केवल 4 लोगों को पीएम आवास मिला है। जिनके पास जमीन का पट्टा नहीं है, वे घर से वंचित हैं।

प्रशासन का ‘मास्टर प्लान’

कलेक्टर डॉ. सतीश कुमार एस ने अब पूरे ब्लॉक की मॉनिटरिंग शुरू की है।

60 गांवों को ‘हाई रिस्क’ जोन घोषित किया गया है। एसडीएम और स्वास्थ्य विभाग की टीम मिलकर एक नया सर्वे कर रही है।

दावा किया जा रहा है कि अब किसी बच्चे को कुपोषण का शिकार नहीं होने दिया जाएगा।

लेकिन सवाल वही है— क्या यह सक्रियता सुप्रांशी जैसी अन्य मासूमों को बचा पाएगी या फिर अगले किसी बड़े हादसे तक सब कुछ फिर शांत हो जाएगा?

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