Arjun Singh Election Formula: भारतीय राजनीति में एक बड़ा बदलाव दस्तक दे रहा है।
चर्चा है कि 2029 के आम चुनाव तक देश की संसद का स्वरूप पूरी तरह बदल सकता है।
केंद्र सरकार महिलाओं को लोकसभा में 33% आरक्षण देने के लिए एक ऐसे रास्ते पर चल सकती है, जिसे ‘विस्तार का रास्ता’ कहा जा रहा है।
इस रणनीति की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह फॉर्मूला आज का नहीं, बल्कि करीब 20 साल पुराना है, जिसे UPA सरकार के कद्दावर नेता अर्जुन सिंह ने शिक्षा के क्षेत्र में आजमाया था।

क्या है योजना? (लोकसभा 816)
वर्तमान में लोकसभा में 543 सीटें हैं। चर्चाओं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के केरल में दिए गए संकेतों के अनुसार, सरकार इन सीटों की संख्या बढ़ाकर 816 करने की योजना बना रही है।
यानी सदन में 273 नई सीटें जोड़ी जाएंगी। खास बात यह है कि ये सभी 273 नई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
इससे मौजूदा पुरुष सांसदों या सामान्य सीटों पर कोई खतरा नहीं मंडराएगा, बल्कि सदन का दायरा बढ़ जाएगा।

अर्जुन सिंह का वो ऐतिहासिक फॉर्मूला
2005-06 में जब देश में उच्च शिक्षा (IIT, IIM) में OBC आरक्षण की बात उठी, तो सबसे बड़ा डर यह था कि इससे सामान्य वर्ग (General Category) की सीटें कम हो जाएंगी।
तब तत्कालीन शिक्षा मंत्री अर्जुन सिंह ने एक बीच का रास्ता निकाला।
उन्होंने कहा कि हम किसी की सीटें छीनेंगे नहीं, बल्कि कुल सीटों की संख्या ही बढ़ा देंगे।

इसे पाई को बड़ा करना’ (Enlarging the Pie) कहा गया।
उस समय तय हुआ कि संस्थानों में 27% OBC आरक्षण लागू करने के लिए कुल सीटों में 54% की वृद्धि की जाएगी।
उदाहरण के लिए, अगर किसी कॉलेज में 100 सीटें थीं, तो उन्हें बढ़ाकर 154 कर दिया गया।
इससे सामान्य वर्ग की 78 सीटें वैसी ही रहीं, लेकिन प्रतिशत के हिसाब से OBC को भी उनका हक मिल गया।

अब लोकसभा में यही गणित कैसे काम करेगा?
महिला आरक्षण विधेयक (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को लागू करने में सबसे बड़ी बाधा यही है कि आरक्षित सीटें होने पर कई वर्तमान सांसदों को अपनी सीट गंवानी पड़ सकती है।
अर्जुन सिंह के फॉर्मूले से इस डर को खत्म किया जा सकता है।
- उत्तर प्रदेश का उदाहरण: वर्तमान में UP में 80 सीटें हैं। विस्तार के बाद ये 120 हो सकती हैं, जिसमें 40 सीटें महिलाओं के लिए होंगी।
- केरल का उदाहरण: यहाँ 20 सीटें हैं, जो बढ़कर 30 हो सकती हैं, जिनमें 10 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
- SC/ST आरक्षण: जो 15% और 7% आरक्षण पहले से है, उनमें भी एक-तिहाई सीटें उन्हीं वर्गों की महिलाओं के लिए सुरक्षित रहेंगी।

राजनीतिक चतुराई और ‘विन-विन’ स्थिति
BJP द्वारा इस फॉर्मूले को अपनाना एक सोची-समझी राजनीतिक चाल मानी जा रही है।
इसके दो बड़े फायदे हैं:
1. विरोध का अंत: जब मौजूदा सांसदों को पता होगा कि उनकी सीट आरक्षित नहीं हो रही है, बल्कि नई सीटें जुड़ रही हैं, तो वे इस बदलाव का विरोध नहीं करेंगे।
2. ऐतिहासिक श्रेय: मोदी सरकार इसे महिलाओं के सशक्तिकरण के एक बड़े कदम के रूप में पेश कर सकेगी, बिना किसी सामाजिक असंतोष के।

अर्जुन सिंह: वो शख्सियत जिनके नाम है यह फॉर्मूला
मध्य प्रदेश के चुरहट से आने वाले अर्जुन सिंह भारतीय राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी थे।
वे तीन बार MP के मुख्यमंत्री रहे और केंद्र में मानव संसाधन विकास मंत्री के पद पर रहे।
हालांकि उनका राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा (खासकर बाबरी मस्जिद के बाद इस्तीफा और अपनी नई पार्टी बनाना), लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में उनके द्वारा लागू किया गया ‘सीट विस्तार मॉडल’ आज भी नीति निर्धारकों के लिए एक मिसाल है।

चुनौतियां अभी बाकी हैं
भले ही यह फॉर्मूला सुनने में आसान लगे, लेकिन इसे लागू करना एक जटिल प्रक्रिया है।
इसके लिए ‘परिसीमन’ (Delimitation) होना अनिवार्य है, जो जनसंख्या के आंकड़ों पर आधारित होता है।
संविधान संशोधन की प्रक्रिया और नए राज्यों की सीटों का बंटवारा एक लंबी कानूनी और प्रशासनिक लड़ाई मांगता है।
क्या 2029 तक यह सब पूरा हो पाएगा?
यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा, लेकिन फिलहाल सरकार की मंशा ‘सबका साथ, सबका विकास’ के साथ-साथ ‘सबका स्थान’ सुनिश्चित करने की दिख रही है।
