MP Liquor Consumption: मध्य प्रदेश सरकार ने पिछले साल 1 अप्रैल 2025 को एक बड़ा फैसला लिया था।
राज्य के 19 ऐसे शहर, जिन्हें ‘पवित्र नगरी’ का दर्जा प्राप्त है, उनके नगरीय क्षेत्रों (City Areas) में शराब की बिक्री पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई।
मकसद था—इन धार्मिक स्थलों की पवित्रता और आध्यात्मिक माहौल को बनाए रखना।
लेकिन एक साल बाद जो सरकारी आंकड़े सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं।
कैसे पलट गई बाजी?
आम तौर पर माना जाता है कि शराबबंदी से सरकार की कमाई कम हो जाती है, लेकिन मध्य प्रदेश में इसका उल्टा असर देखने को मिल रहा है।
असल में हुआ यह कि शहरों के भीतर तो दुकानें बंद कर दी गईं, लेकिन शराब पीने वालों ने अपनी आदत नहीं बदली।
मांग जस की तस रही, बस दुकानें शहर की सीमा के बाहर यानी ग्रामीण इलाकों या ‘बॉर्डर’ पर शिफ्ट हो गईं।
इसका नतीजा यह हुआ कि इन बाहरी इलाकों की दुकानों की डिमांड इतनी बढ़ गई कि जब ठेकों की नीलामी हुई, तो शराब ठेकेदारों ने ऊंची बोलियां लगाईं।
इससे सरकार को मिलने वाले राजस्व (Revenue) में जबरदस्त इजाफा हुआ।
मैहर और मंडला में रिकॉर्ड तोड़ कमाई
आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे ज्यादा उछाल माता शारदा की नगरी मैहर में देखा गया।
यहां शराब के ठेके पिछले साल के मुकाबले 61.02% ज्यादा कीमत पर बिके। यानी सरकार की कमाई यहां आधे से भी ज्यादा बढ़ गई।
वहीं, मंडला में भी यही हाल रहा, जहां ठेकों की कीमत में 51.92% की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
रामराजा सरकार की नगरी ओरछा (निवाड़ी जिला) में भी शराबबंदी का असर दिखा।
यहां के ठेकों की कीमतों में लगभग 42% का उछाल आया।
इन आंकड़ों से साफ है कि लोग शहर से बाहर जाकर शराब खरीदने और पीने में संकोच नहीं कर रहे हैं।
उज्जैन और मंदसौर में तस्वीर अलग क्यों?
जहां एक तरफ मैहर और ओरछा में आंकड़े आसमान छू रहे हैं, वहीं महाकाल की नगरी उज्जैन और पशुपतिनाथ की नगरी मंदसौर में स्थिति थोड़ी स्थिर रही।
उज्जैन में ठेकों की कीमतों में सिर्फ 0.88% की मामूली बढ़ोतरी हुई, जबकि मंदसौर में तो 0.90% की मामूली गिरावट देखी गई।
जानकारों का मानना है कि इन शहरों में पहले से ही व्यवस्थाएं और बाजार काफी संतुलित थे, इसलिए यहां मैहर जैसा बड़ा उछाल देखने को नहीं मिला।
क्या वाकई सफल रही शराबबंदी?
इस पूरे ट्रेंड का विश्लेषण करें तो एक बात साफ है—शराब की खपत खत्म नहीं हुई है, बल्कि उसका पता बदल गया है।
शहरों के भीतर अब दुकानें नहीं दिखतीं, जिससे तीर्थयात्रियों को एक बेहतर और धार्मिक माहौल मिल रहा है
सरकार का यह उद्देश्य तो पूरा हुआ, लेकिन सामाजिक स्तर पर शराब की मांग कम नहीं हुई है।
सरकार के लिए अच्छी बात यह रही कि उसे इस पाबंदी की वजह से आर्थिक नुकसान नहीं झेलना पड़ा। बल्कि, बाहरी क्षेत्रों में बढ़ी हुई मांग ने सरकारी खजाने को और ज्यादा भर दिया है।
अब देखना यह होगा कि क्या सरकार आने वाले समय में इन ‘शिफ्ट’ हुई दुकानों को लेकर भी कोई नई रणनीति बनाती है या राजस्व की यह बढ़त ऐसे ही जारी रहेगी।
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