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AIIMS भोपाल में फ्री हो रही जेंडर चेंज सर्जरी: लड़के बन रहे लड़कियां, भविष्य में मां बनने की उम्मीद भी जगी!

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Gender Change Surgery in Bhopal: आज का दौर बदलाव का दौर है। अब वह समय पीछे छूटता जा रहा है जब लोग अपनी आंतरिक पहचान को समाज के डर से दबाकर रखते थे।

मध्यप्रदेश में इन दिनों एक बड़ी सामाजिक क्रांति देखने को मिल रही है।

यहाँ के युवा अब अपनी ‘जेंडर आइडेंटिटी’ (Gender Identity) को लेकर न केवल सजग हो रहे हैं, बल्कि उसे अपनाने का साहस भी दिखा रहे हैं।

इसी कड़ी में एम्स भोपाल (AIIMS Bhopal) एक बड़ा केंद्र बनकर उभरा है, जहां पुरुष से महिला बनने की जटिल सर्जरी सफलतापूर्वक की जा रही है।

गांवों और छोटे कस्बों से आ रहे युवा

अक्सर माना जाता है कि जेंडर रीअसाइनमेंट सर्जरी (GRS) केवल बड़े महानगरों या अमीर घरानों तक सीमित है।

लेकिन एम्स भोपाल के आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां करते हैं।

यहाँ राजगढ़ जैसे छोटे जिलों और ग्रामीण इलाकों के युवा भी पहुंच रहे हैं।

इन युवाओं का कहना है कि वे बचपन से ही अपने शरीर में खुद को ‘अजनबी’ महसूस करते थे।

उनका शरीर पुरुष का था, लेकिन उनकी पसंद, व्यवहार और भावनाएं पूरी तरह स्त्री जैसी थीं।

सोम की कहानी: सोमेश से सोम बनने का सफर

राजगढ़ के रहने वाले सोम (नाम परिवर्तित) की कहानी भी ऐसी ही है।

सोमेश जब 10 साल के थे, तभी उन्हें एहसास हो गया था कि वे लड़कों से अलग हैं।

उन्हें लड़कियों की तरह सजना-संवरना और उनके जैसे कपड़े पहनना पसंद था।

परिवार ने भी समय के साथ सोमेश की इस भावना को समझा। आखिरकार 24 साल की उम्र में उन्होंने एक साहसी निर्णय लिया।

उन्होंने जेंडर चेंज सर्जरी का रास्ता चुना और आज वे अपनी नई पहचान के साथ एक खुशहाल जीवन जीने की ओर अग्रसर हैं।

एम्स भोपाल में बढ़ रहे मामले

एम्स भोपाल के स्त्री रोग विभाग के अनुसार, पिछले एक साल में जेंडर कन्वर्जन सर्जरी के मामलों में काफी तेजी आई है। अब तक 5 सफल सर्जरी की जा चुकी हैं।

विशेष बात यह है कि सर्जरी कराने वाले सभी युवाओं की उम्र 22 से 28 वर्ष के बीच है।

डॉक्टरों का मानना है कि यह उम्र वह पड़ाव है जहां युवा अपने करियर और पहचान को लेकर स्पष्ट होते हैं।

क्या सर्जरी के बाद मां बनना संभव है?

यह इस खबर का सबसे चौंकाने वाला और आशाजनक पहलू है।

एम्स भोपाल के प्रोफेसर डॉ. अरुण कुमार डोरा के अनुसार, चिकित्सा विज्ञान जिस तेजी से प्रगति कर रहा है, वह दिन दूर नहीं जब ट्रांसजेंडर महिलाएं भी मां बन सकेंगी।

वर्तमान में सर्जरी के जरिए केवल शारीरिक बनावट बदली जाती है, लेकिन भविष्य में ‘यूट्रस ट्रांसप्लांट’ (गर्भाशय प्रत्यारोपण) की तकनीक इसे संभव बनाएगी।

डोनेटेड एग्स (अंडे) और स्पर्म की मदद से ये महिलाएं न केवल गर्भधारण कर सकेंगी, बल्कि मातृत्व का सुख भी प्राप्त कर सकेंगी।

मुफ्त इलाज और जटिल प्रक्रिया

निजी अस्पतालों में जेंडर चेंज सर्जरी का खर्च 8 से 10 लाख रुपये तक आता है, जो एक सामान्य परिवार के लिए नामुमकिन जैसा है।

लेकिन एम्स भोपाल में यह सुविधा फिलहाल नि:शुल्क (Free of Cost) उपलब्ध है।

हालांकि, यह प्रक्रिया अत्यंत जटिल है। इसमें बॉटम सर्जरी सबसे चुनौतीपूर्ण होती है, जिसमें पुरुष जननांगों को हटाकर महिला जननांगों का निर्माण किया जाता है।

डॉक्टरों को इसके लिए विशेष ट्रेनिंग और सूक्ष्म कौशल की आवश्यकता होती है।

गलत सर्जरी का खतरा

डॉक्टरों ने चेतावनी भी दी है कि अधूरी जानकारी या सस्ते के चक्कर में गलत जगह से सर्जरी कराना जानलेवा हो सकता है।

इंदौर के एक युवक का उदाहरण सामने आया, जिसने कानपुर में सर्जरी कराई थी जो फेल हो गई।

उसे भारी दर्द और अंगों में चोट के साथ एम्स भोपाल लाया गया, जहां 8 घंटे के लंबे ऑपरेशन के बाद डॉक्टरों ने उसकी स्थिति में सुधार किया।

सर्जरी की पूरी प्रक्रिया: स्टेप-बाय-स्टेप

यह केवल एक ऑपरेशन नहीं, बल्कि एक लंबी मानसिक और शारीरिक यात्रा है:

1. काउंसलिंग: सबसे पहले मनोचिकित्सक यह सुनिश्चित करते हैं कि व्यक्ति मानसिक रूप से इस बदलाव के लिए तैयार है।

2. हार्मोन थेरेपी: सर्जरी से पहले शरीर में स्त्री गुणों (जैसे आवाज का पतला होना, स्तनों का विकास) के लिए हार्मोन दिए जाते हैं। इस दौरान नशा पूरी तरह छोड़ना पड़ता है।

3. सर्जरी: इसमें चेहरे की बनावट बदलना, ब्रेस्ट इंप्लांट और अंत में जननांगों का पुनर्निर्माण शामिल है।

4. रिकवरी: सर्जरी के बाद लंबे समय तक फॉलो-अप और दवाइयों की जरूरत होती है।

समाज की सोच बदल रही है और विज्ञान उसे सहारा दे रहा है।

एम्स भोपाल जैसे संस्थानों की यह पहल उन लोगों के लिए उम्मीद की किरण है जो अपनी पहचान की लड़ाई लड़ रहे हैं।

वह दिन दूर नहीं जब विज्ञान की मदद से ‘पहचान’ और ‘मातृत्व’ के बीच की दूरी पूरी तरह खत्म हो जाएगी।

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