Bhopal gas tragedy cleanup: भोपाल गैस त्रासदी के 40 साल बाद भी यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (UCIL) के कारखाने की जमीन और इसके आस-पास का जमीनी पानी (Groundwater) जहरीला बना हुआ है।
अब, मध्यप्रदेश सरकार इस पुराने और गहरे जख्म को हमेशा के लिए भरने की तैयारी में जुट गई है।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के सख्त निर्देशों के बाद, राज्य सरकार ने यूनियन कार्बाइड परिसर की मिट्टी और पानी को पूरी तरह साफ करने (Remediation) और वहां खड़े जंग लगे कारखाने के ढांचे को सुरक्षित हटाने (Detoxification) की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

इसके लिए भोपाल गैस त्रासदी राहत एवं पुनर्वास विभाग ने एक्सपर्ट एजेंसियों से प्रस्ताव मांगे हैं, जिन पर 4 जून को फैसला होना है।
क्यों जरूरी है यह सफाई?
साल 1969 में भोपाल में कीटनाशक (पेस्टिसाइड) बनाने के लिए इस कारखाने की शुरुआत हुई थी।
बाद में 1979 में यहाँ घातक एमआइसी गैस बनाने का प्लांट लगाया गया। 1984 के हादसे के बाद सरकार ने इस जगह को सील कर अपने कब्जे में ले लिया था।

हादसे के बाद जो खतरनाक रासायनिक कचरा बचा था, उसे बोरियों में भरकर कारखाने के तलघर (बेसमेंट) में रख दिया गया था। सालों तक यह कचरा वहीं सड़ता रहा।
बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उस ठोस कचरे को पीथमपुर ले जाकर नष्ट तो कर दिया गया, लेकिन जो रसायन रिसकर जमीन के भीतर जा चुका था, वह वहीं रह गया।
आज भी कारखाने के आस-पास रहने वाले लोग इसी दूषित पानी और पर्यावरण के बीच जीने को मजबूर हैं। अब इसी ‘छिपे हुए जहर’ को खत्म करने की तैयारी है।

तीन चरणों (Three Phases) में चमकेगा पूरा इलाका
सरकार ने इस पूरे प्रोजेक्ट को वैज्ञानिक तरीके से अंजाम देने के लिए तीन चरणों का एक मजबूत मास्टर प्लान तैयार किया है:
1. पहला चरण: शुरुआती नाप-तौल और पुराना रिकॉर्ड (Site Assessment)
सबसे पहले विशेषज्ञों की एक टीम पूरे यूनियन कार्बाइड परिसर का बारीकी से अध्ययन करेगी। इसके लिए कारखाने के पुराने नक्शों और दस्तावेजों को खंगाला जाएगा।
देश की बड़ी वैज्ञानिक संस्थाओं जैसे नीरी (NEERI) और सीएसआईआर (CSIR) की पुरानी जांच रिपोर्टों की मदद ली जाएगी, ताकि यह समझा जा सके कि जहर जमीन में कितनी गहराई तक और किस दिशा में फैला है।

2. दूसरा चरण: मिट्टी-पानी का कड़ा टेस्ट और एक्शन प्लान (In-depth Investigation)
यह चरण सबसे महत्वपूर्ण है। इसके तहत कारखाने के अंदर और उसके आस-पास के 2 किलोमीटर के दायरे से मिट्टी के 50 और भूजल (Groundwater) के 15 सैंपल लिए जाएंगे।
इन सैंपलों की जांच मामूली नहीं होगी, बल्कि इन्हें 189 अलग-अलग पैरामीटर्स (मानकों) पर परखा जाएगा ताकि रसायनों के प्रकार का पता चल सके।
आस-पास के तालाबों और कचरा डंप करने वाली जगहों की भी जांच होगी। इसके बाद एक फाइनल ‘रेमेडियल एंड रिहेबिलिटेशन एक्शन प्लान’ (सुधार योजना) तैयार किया जाएगा।

3. तीसरा चरण: पर्यावरण और सेहत पर असर की स्टडी (EIA Study)
आखरी चरण में ‘पर्यावरण प्रभाव आकलन’ (Environment Impact Assessment) किया जाएगा।
इसमें यह देखा जाएगा कि सफाई के काम से मिट्टी, पानी और हवा पर क्या असर पड़ेगा।
साथ ही, वहाँ रहने वाले लोगों की सेहत और उनकी आर्थिक स्थिति पर इस कचरे का क्या असर हुआ है, इसका भी एक सामाजिक-आर्थिक सर्वे किया जाएगा।
सुरक्षा से नहीं होगा कोई समझौता
इतने बड़े पैमाने पर जहरीले रसायनों की सफाई करना खतरे से खाली नहीं है। इसलिए सरकार एक कड़ा ‘हेल्थ और सेफ्टी प्लान’ भी तैयार कर रही है।
इसका सीधा मकसद यह है कि जब सफाई का काम शुरू हो, तो वहाँ काम करने वाले मजदूरों, अधिकारियों या आस-पास रहने वाले स्थानीय नागरिकों की सेहत को कोई नुकसान न पहुंचे।

सारा जहरीला कचरा पर्यावरण नियमों का पालन करते हुए सुरक्षित तरीके से ठिकाने लगाया जाएगा।
जब यह पूरी जमीन और पानी साफ हो जाएगा, उसके बाद ही सरकार इस ऐतिहासिक और संवेदनशील जगह के भविष्य को लेकर कोई नया प्लान तैयार करेगी।
भोपाल के निवासियों के लिए यह कदम एक नई सुबह की उम्मीद लेकर आया है।
