MP UCC Survey: मध्य प्रदेश सरकार इन दिनों समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) को लागू करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है।
लेकिन इस बड़े कानून को अमलीजामा पहनाने से पहले सरकार ने सूबे की आम जनता की नब्ज टटोलने का फैसला किया।
इसके लिए एक राज्य स्तरीय समिति बनाई गई, जिसने पूरे मध्य प्रदेश में ‘सार्वजनिक परामर्श’ यानी लोगों से उनकी राय और सुझाव मांगे।
इस सर्वे के जो आंकड़े सामने आए हैं, उन्होंने राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में हलचल मचा दी है।
मंगलवार, 23 जून तक समिति के पास व्यक्तिगत रूप से 9 लाख 50 हजार (साढ़े नौ लाख) से भी ज्यादा सुझाव आए।
इनमें से करीब 93 फीसदी यानी 8 लाख 90 हजार लोगों ने साफ तौर पर यूसीसी का समर्थन किया है, जबकि विरोध में सिर्फ 7% (लगभग 60 हजार) वोट ही पड़े।

इसके अलावा समाज की करीब 2,000 संस्थाओं ने भी अपने तकनीकी और संगठनात्मक सुझाव सरकार को सौंपे हैं।
सर्वे का सबसे चौंकाने वाला पहलू: मुस्लिम महिलाओं की ‘ऊंची उड़ान’
इस पूरे सर्वे का सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला मोड़ मुस्लिम समाज से जुड़े आंकड़ों में देखने को मिला।
मुस्लिम समुदाय की तरफ से समिति को कुल 44,000 सुझाव मिले। जब इन सुझावों को महिला और पुरुष के आधार पर अलग करके देखा गया, तो एक बहुत बड़ी खाई नजर आई:
- मुस्लिम पुरुष: कुल 29,000 पुरुषों ने अपनी राय दी, जिसमें से केवल 11,000 (यानी महज 38%) ही यूसीसी के पक्ष में दिखे।
- मुस्लिम महिलाएं: कुल 15,000 मुस्लिम महिलाओं ने सर्वे में हिस्सा लिया और इनमें से 10,500 (यानी पूरे 71%) ने यूसीसी का खुलकर समर्थन किया।

एक नजर में बड़ा अंतर:
जहां दो-तिहाई से ज्यादा मुस्लिम पुरुष इस कानून के खिलाफ या असहमत दिखे, वहीं इसके उलट लगभग तीन-चौथाई मुस्लिम महिलाओं ने इस कानून को अपने हक में बताया।
जानकारों का कहना है कि यह अंतर साफ तौर पर यह दिखाता है कि मुस्लिम समाज के भीतर की औरतें अब अपने अधिकारों को लेकर कितनी जागरूक हो चुकी हैं।

आखिर मुस्लिम महिलाएं क्यों चाहती हैं यूसीसी?
आम बोलचाल की भाषा में समझें तो पर्सनल लॉ के कई नियम आज भी महिलाओं के पक्ष में उतने मजबूत नहीं हैं, जितने होने चाहिए।
जानकारों और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि मुस्लिम महिलाओं द्वारा यूसीसी को इतना भारी समर्थन देने के पीछे कई बुनियादी और जरूरी वजहें हैं:
1. पैतृक संपत्ति में बराबर का हक: वर्तमान पर्सनल लॉ में बेटियों को बेटों के मुकाबले संपत्ति में कम हिस्सा मिलता है। यूसीसी आने से बेटियों को भी बेटों की तरह माता-पिता की संपत्ति में बराबर का कानूनी अधिकार मिलेगा।
2. बहुविवाह (Polygamy) पर पूरी तरह रोक: एक से ज्यादा शादी करने की प्रथा से सबसे ज्यादा मानसिक और सामाजिक प्रताड़ना महिलाओं को झेलनी पड़ती है। यूसीसी के तहत इस पर पूरी तरह से पाबंदी लगाने की वकालत की गई है।
3. तलाक के बाद गुजारा भत्ता (Alimony): तीन तलाक खत्म होने के बाद भी तलाक की प्रक्रिया और उसके बाद महिलाओं व बच्चों के भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) को लेकर कड़े और साफ नियम नहीं हैं। महिलाएं चाहती हैं कि हर धर्म की तरह उन्हें भी तलाक के बाद सम्मान से जीने के लिए कानूनी सुरक्षा मिले।
4. हलाला और इद्दत जैसी प्रथाओं से मुक्ति: निकाह हलाला और इद्दत जैसी दकियानूसी प्रथाएं महिलाओं के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाती हैं। सर्वे में इन पर रोक लगाने को लेकर महिलाओं ने अपनी सहमति जताई है।

हिंदू समाज और हर वर्ग ने दिखाया जबरदस्त उत्साह
इस सर्वे की एक और खास बात यह रही कि इसमें समाज के हर तबके ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
कुल साढ़े नौ लाख सुझावों में से 42% यानी 4 लाख सुझाव महिलाओं के थे, जबकि 58% यानी 5 लाख 50 हजार सुझाव पुरुषों के थे।
इतना ही नहीं, समाज की मुख्यधारा से अक्सर छूट जाने वाले 100 से अधिक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों ने भी अपनी राय दर्ज कराकर इस प्रक्रिया को बेहद समावेशी बना दिया।

अगर हिंदू समुदाय की बात करें तो वहां यूसीसी को लेकर एकतरफा समर्थन देखने को मिला:
- हिंदू पुरुष: 5 लाख 20 हजार पुरुषों में से 4 लाख 90 हजार (95%) इसके पक्ष में रहे।
- हिंदू महिलाएं: 3.7 लाख महिलाओं में से 3.6 लाख (97%) ने यूसीसी का हाथ थामा।
यदि सभी धर्मों की कुल 4 लाख महिलाओं के आंकड़ों को मिला दिया जाए, तो उनमें से 3 लाख 80 हजार (95%) महिलाएं एक समान कानून के पक्ष में खड़ी नजर आती हैं।
यह साफ करता है कि धर्म चाहे जो भी हो, देश की नारी कानूनी सुरक्षा और बराबरी की मांग कर रही है।

आसान शब्दों में समझिए: क्या होता है यूसीसी (UCC)?
समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) का सीधा सा मतलब होता है— ‘एक देश, एक कानून’।
फिलहाल हमारे देश में क्रिमिनल कानून (जैसे चोरी, हत्या की सजा) तो सभी के लिए एक जैसे हैं, लेकिन पारिवारिक या निजी मामलों के लिए अलग-अलग धर्मों के अपने पर्सनल लॉ हैं।
जैसे— हिंदुओं, सिखों, जैनों और बौद्धों के लिए ‘हिंदू विवाह अधिनियम’ है, मुस्लिमों के लिए ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’ है, और ईसाइयों के लिए ‘ईसाई विवाह अधिनियम’ है।
यूसीसी लागू होने के बाद, देश में रहने वाले हर नागरिक के लिए (चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या समुदाय का हो) कुछ मुख्य मामलों में एक ही कानून लागू होगा। ये मामले हैं:
- शादी की सही उम्र
- तलाक के नियम और प्रक्रिया
- गोद लेना (Adoption) और गार्जियनशिप
- वसीयत, विरासत और संपत्ति का बंटवारा

सर्वे में पूछे गए थे ये 12 बड़े सवाल, जनता ने कहा ‘हाँ’
इस पूरी परामर्श प्रक्रिया के दौरान जनता के सामने 12 मुख्य सवाल रखे गए थे, जिन पर ज्यादातर लोगों ने ‘हां’ में जवाब दिया है:

सामाजिक सुधार की नई इबारत
मध्य प्रदेश के इस सर्वे से यह साफ संदेश मिलता है कि जनता अब पुराने पड़ चुके पर्सनल कानूनों के बजाय एक आधुनिक और प्रगतिशील कानूनी व्यवस्था चाहती है।
खासकर महिलाओं का यह भारी समर्थन, चाहे वे किसी भी मजहब की हों, यह साबित करता है कि आधी आबादी अब धर्म की दीवारों से ऊपर उठकर अपने अधिकारों, आत्मसम्मान और बराबरी के हक के लिए खुलकर सामने आ रही है।
अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह इन सुझावों के आधार पर कैसा ड्राफ्ट तैयार करती है।
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