Surender Koli suicide: नोएडा के बहुचर्चित और खौफनाक निठारी कांड का मुख्य आरोपी रहा सुरेंद्र कोली एक बार फिर सुर्खियों में है।
करीब 19 साल जेल में बिताने और देश की सर्वोच्च अदालत से सभी मामलों में बरी होने के कुछ ही महीनों बाद, उत्तराखंड के हरिद्वार में उसका शव फंदे से लटकता मिला।
कोली वहां अपनी असली पहचान छिपाकर और नाम बदलकर रह रहा था।
पहचान छिपाकर जी रहा था गुमनामी की जिंदगी
जेल से रिहा होने के बाद सुरेंद्र कोली अपनी पहचान छिपाकर हरिद्वार के भूपतवाला इलाके में रहने लगा था।
उसने स्थानीय लोगों को अपना नाम ‘सदाराम’ बताया था।
लगभग 15 दिन पहले उसने सिडकुल की एक कंपनी में काम करना शुरू किया, ताकि किसी को उसकी पुरानी जिंदगी और पहचान का शक न हो।

चार दिन पहले ही उसने हरिद्वार के सप्तऋषि चौकी क्षेत्र में लाल मंदिर के पास एक छोटी सी दुकान किराए पर ली और चाय बेचने का काम शुरू किया था।
मकान मालिक और आसपास के लोगों के मुताबिक, उसने दुकान के लिए advance किराया भी दिया था।
हालांकि, इन दिनों क्षेत्र में महाकुंभ की तैयारियों के चलते अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाया जा रहा था।
पड़ोसियों का कहना है कि कोली को इस बात की चिंता सता रही थी कि उसकी दुकान हट जाएगी और किराए के पैसे डूब जाएंगे।
शुक्रवार की सुबह उसी दुकान में पंखे से लटका उसका शव बरामद हुआ।

निठारी कांड: नाले से मिली थीं खोपड़ियां और हड्डियां
निठारी कांड भारत के सबसे दर्दनाक और भयानक अपराधों में से एक माना जाता है।
साल 2005 और 2006 के दौरान नोएडा के सेक्टर-31 स्थित निठारी गांव से अचानक छोटे बच्चे और महिलाएं लापता होने लगे थे। काफी समय तक पुलिस के हाथ खाली रहे।
29 दिसंबर 2006 को जब पुलिस जांच करते हुए कारोबारी मोनिंदर सिंह पंढेर की कोठी (D-5) के पीछे पहुंची, तो वहां नाले से इंसानी खोपड़ियां, बच्चों के कपड़े और हड्डियां बरामद हुईं।
इस भयावह खुलासे ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। इसके तुरंत बाद पुलिस ने कोठी के मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर और उसके नौकर सुरेंद्र कोली को गिरफ्तार कर लिया।
जनवरी 2007 में मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच सीबीआई (CBI) को सौंप दी गई।

CBI ने कुल 16 मामलों में चार्जशीट दाखिल की, जिनमें कोली पर हत्या, अपहरण, दुष्कर्म और साक्ष्य छिपाने जैसे संगीन आरोप लगे।
13 मामलों में मिली थी फांसी, फिर कैसे हुआ बरी?
शुरुआती दौर में कोली को सीबीआई अदालत ने दोषी ठहराया और 13 अलग-अलग मामलों में मौत की सजा (फांसी) सुनाई गई।
निचली अदालतों का मानना था कि पुलिस के सामने दिया गया उसका कबूलनामा और उसकी निशानदेही पर हुई बरामदगी उसके खिलाफ पुख्ता सबूत थे।
हालांकि, जब मामला ऊपरी अदालतों में गया, तो कानूनी दांव-पेच और सबूतों की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2023 में 12 मामलों में सुरेंद्र कोली को बरी कर दिया।
कोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि लगभग 60 दिनों की लंबी पुलिस हिरासत के बाद लिया गया कबूलनामा पूरी तरह स्वैच्छिक और भरोसेमंद नहीं माना जा सकता।
इसके अलावा, जांच एजेंसियों की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े किए गए।
इसके बाद, 30 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले को बरकरार रखा। कोली के खिलाफ सिर्फ एक मामला बचा था।
अंततः 11 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने उस अंतिम मामले में भी उसे दोषमुक्त घोषित कर दिया।

लगभग 19 साल जेल की सलाखों के पीछे गुजारने के बाद सुरेंद्र कोली कानूनी रूप से पूरी तरह बरी होकर जेल से बाहर आया था, लेकिन बाहर आने के महज कुछ महीनों के भीतर ही उसकी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई।
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