CDSCO Medicine Samples Failed: हम सभी बीमारी के समय जल्द से जल्द ठीक होने के लिए दवाओं पर भरोसा करते हैं। लेकिन अगर वही दवाएं तय मानकों पर खरी न उतरें, तो यह चिंता का विषय बन जाता है।
भारत में दवाओं की गुणवत्ता पर नजर रखने वाली केंद्रीय एजेंसी CDSCO (Central Drugs Standard Control Organisation) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में एक बड़ा अलर्ट जारी किया है।
एजेंसी द्वारा की गई देशव्यापी जांच में कुल 221 दवाओं और कॉस्मेटिक सामानों के सैंपल क्वालिटी टेस्ट में फेल पाए गए हैं।
जांच के नतीजों के मुताबिक, इनमें से 191 सैंपल अलग-अलग राज्यों की लैब में फेल हुए, जबकि 29 सैंपल केंद्र सरकार की सेंट्रल लैब में मानकों पर खरे नहीं उतर सके।

यह जांच रिपोर्ट इसलिए भी अहम है क्योंकि जिन दवाओं के सैंपल फेल पाए गए हैं, उनमें रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली दर्द की दवाएं, डायबिटीज, बुखार, एंटीबायोटिक, बच्चों के सिरप, आंखों के ड्रॉप्स और प्रसव के दौरान इस्तेमाल होने वाले जरूरी इंजेक्शन तक शामिल हैं।
किस राज्य में कितनी दवाएं पाई गईं खराब?
दवाओं के सैंपल फेल होने के मामले में देश के अलग-अलग राज्यों से आंकड़े सामने आए हैं।
देश में दवा निर्माण का प्रमुख केंद्र माने जाने वाले हिमाचल प्रदेश में सबसे ज्यादा 63 दवाओं के सैंपल फेल मिले हैं।
राज्यवार आंकड़े इस प्रकार हैं:
राज्य / केंद्र शासित प्रदेश | फेल हुए दवाओं के सैंपल की संख्या
- हिमाचल प्रदेश/ 63
- उत्तराखंड /39
- गुजरात / 17
- महाराष्ट्र /16
- मध्य प्रदेश/ 12
- तमिलनाडु, हरियाणा / 11 – 11
- सिक्किम, उत्तर प्रदेश/ 9 – 9
- पंजाब/ 8
- तेलंगाना/ 6
- आंध्र प्रदेश /4
- दमन, केरल, पुडुचेरी /3 – 3
- जम्मू-कश्मीर /2
- पश्चिम बंगाल, बिहार, कर्नाटक, राजस्थान/1-1

मध्य प्रदेश में 12 और हिमाचल में सबसे ज्यादा प्रभाव
मध्य प्रदेश में भी दवाओं के 12 सैंपल गुणवत्ता मानकों में विफल रहे हैं। प्रदेश के औषधि विभाग (Drug Department) ने इन मामलों को गंभीरता से लिया है।
अधिकारियों का कहना है कि प्रभावित बैचों की बिक्री पर रोक लगाने और संबंधित दवा कंपनियों की जांच करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
दूसरी ओर, हिमाचल प्रदेश को देश का फार्मा हब माना जाता है। यहां बद्दी, बरोटीवाला, नालागढ़, सोलन, परवाणू, पांवटा साहिब और कांगड़ा जैसे बड़े औद्योगिक क्षेत्रों में स्थित दवा फैक्ट्रियों के सैंपल फेल हुए हैं।
हिमाचल के राज्य औषधि नियंत्रक डॉ. मनीष कपूर के अनुसार, सभी संबंधित कंपनियों को ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किया गया है और फेल हुए बैचों की सप्लाई तुरंत रोक दी गई है।

हालांकि, कई कंपनियों ने इन जांच परिणामों को चुनौती देते हुए री-टेस्टिंग (पुनः जांच) की मांग की है।
किन-किन बीमारियों की दवाओं में पाई गई खराबी?
जांच रिपोर्ट के अनुसार, जो दवाएं फेल हुई हैं वे केवल सामान्य कॉस्मेटिक उत्पाद नहीं हैं, बल्कि जीवनरक्षक दवाएं भी हैं:
* दर्द और बुखार: बच्चों के लिए इस्तेमाल होने वाला पैरासिटामोल सिरप और वयस्कों के लिए तेज दर्द कम करने वाली गोलियां।
* एंटीबायोटिक व सिरप: गले और फेफड़ों के संक्रमण में दी जाने वाली एंटीबायोटिक दवाएं और सूखी खांसी/सर्दी के सिरप।
* गंभीर बीमारियां: डायबिटीज (मधुमेह) नियंत्रण की दवाएं और किडनी की पथरी के इलाज में इस्तेमाल होने वाले उत्पाद।
* अन्य उत्पाद: प्रसव के समय लगने वाले इंजेक्शन, आंखों की दवाएं, विटामिन सप्लीमेंट और त्वचा के काले धब्बे हटाने वाले साबुन।

दवाओं में किस तरह की कमियां मिलीं?
जब किसी दवा का सैंपल फेल होता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह हमेशा जहरीली है। जांच में मुख्य रूप से निम्नलिखित तकनीकी कमियां सामने आई हैं:
* API (सक्रिय तत्व) की कमी: दवा में जो मुख्य असरदार तत्व होना चाहिए, उसकी मात्रा तय मानक से कम पाई गई।
* घुलनशीलता (Dissolution): पेट या शरीर में दवा का सही समय पर न घुल पाना।
* पीएच स्तर (pH Level) और पार्टिकल्स: कुछ लिक्विड दवाओं और इंजेक्शन में पीएच लेवल का असंतुलन तथा बारीक कणों (Particulate Matter) की मौजूदगी।
* स्टेरिलिटी (संक्रमण मुक्ति): इंजेक्शन या आई ड्रॉप्स का पूरी तरह से बैक्टीरिया/संक्रमण मुक्त न होना।

दिल्ली में मिली नकली दवा का मामला
स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, इस अभियान के दौरान राजधानी दिल्ली में एक दवा पूरी तरह से नकली (Spurious) पाई गई।
जांच में खुलासा हुआ कि यह दवा किसी नामी कंपनी का फर्जी लेबल लगाकर बनाई जा रही थी और इसका निर्माण बिना किसी वैध लाइसेंस या अनुमति के गैर-कानूनी तरीके से किया जा रहा था। इस मामले में भी कानूनी कार्रवाई की जा रही है।
NSQ (Not of Standard Quality) से घबराने की जरूरत क्यों नहीं?
स्वास्थ्य मंत्रालय और विशेषज्ञों का कहना है कि आम जनता को इस खबर से पैनिक (घबराने) होने की जरूरत नहीं है।
* केवल विशेष बैच पर लागू: NSQ का मतलब यह होता है कि सिर्फ वही विशेष ‘बैच’ मानकों पर खरा नहीं उतरा है, जिसकी जांच की गई थी।
बाजार में उपलब्ध उसी दवा के अन्य बैच सुरक्षित और प्रभावी हो सकते हैं।
* नियमित निगरानी प्रक्रिया: CDSCO और राज्य ड्रग अथॉरिटी हर महीने हजारों दवाओं की रैंडम चेकिंग करते हैं।
इस निगरानी का मुख्य उद्देश्य खराब गुणवत्ता वाली दवाओं को समय रहते बाजार से बाहर करना है ताकि मरीजों तक सही दवा पहुंचे।

मरीजों और खरीदारों के लिए जरूरी सलाह
एक सतर्क नागरिक और मरीज होने के नाते आपको दवा खरीदते और इस्तेमाल करते समय इन बातों का ध्यान रखना चाहिए:
* रसीद जरूर लें: किसी भी मेडिकल स्टोर से दवा खरीदते समय पक्की रसीद (Bill) अवश्य लें।
* बैच नंबर और एक्सपायरी देखें: दवा के पत्ते या शीशी पर लिखा Batch No. और Expiry Date हमेशा ध्यान से पढ़ें।
* भरोसेमंद दुकान से खरीदें: दवाइयां हमेशा पंजीकृत (Registered) और भरोसेमंद मेडिकल स्टोर से ही लें।
* असर न होने पर डॉक्टर से मिलें: यदि दवा की निर्धारित खुराक लेने के बाद भी बीमारी के लक्षणों में सुधार न दिखे या कोई नया साइड इफेक्ट नजर आए, तो तुरंत अपने डॉक्टर को सूचित करें।
* शिकायत दर्ज कराएं: अगर आपको किसी दवा की गुणवत्ता पर संदेह हो, तो आप अपने राज्य के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA/Drug Control Department) में इसकी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
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