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दिवाली पर विष्णु जी के बजाय गणेश जी के साथ क्यों होती है देवी लक्ष्मी की पूजा? जानिए पौराणिक कथा

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Diwali Lakshmi Ganesh worship: दिवाली रोशनी, खुशियों और सुख-समृद्धि का त्योहार है।

इस दिन हर घर दीपों से जगमगा उठता है और लोग अपने घरों में माता लक्ष्मी का स्वागत करते हैं।

दिवाली की रात मुख्य रूप से माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है।

लेकिन क्या कभी आपके मन में यह सवाल आया है कि जब माता लक्ष्मी के पति भगवान विष्णु हैं, तो दिवाली के दिन विष्णु जी की जगह गणेश जी की पूजा क्यों की जाती है?

सामान्य तौर पर जहां लक्ष्मी जी होती हैं, वहां नारायण (विष्णु जी) का होना लाजमी है। लेकिन दिवाली की रात ऐसा नहीं होता।

इसके पीछे एक बहुत ही गहरा और दिलचस्प पौराणिक रहस्य छिपा है, जो सदियों से हमारी परंपरा का हिस्सा बना हुआ है।

आइए जानते हैं कि आखिर दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश की पूजा एक साथ क्यों होती है।

भगवान विष्णु का शयनकाल (चातुर्मास का समय)

शास्त्रों में ‘चातुर्मास’ यानी चार महीने के समय को बहुत खास माना गया है।

हिंदू पंचांग के अनुसार, भगवान विष्णु आषाढ़ महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी (देवशयनी एकादशी) के दिन क्षीर सागर में सोने चले जाते हैं।

वे पूरे चार महीने तक योग निद्रा में रहते हैं और सीधे कार्तिक महीने की ‘देवउठनी एकादशी’ के दिन जागते हैं।

दिवाली का त्योहार कार्तिक महीने की अमावस्या को मनाया जाता है।

इसका मतलब है कि दिवाली के समय भगवान विष्णु गहरी नींद में (योग निद्रा में) होते हैं।

चूंकि श्री हरि सो रहे होते हैं, इसलिए वे दिवाली की पूजा में सीधे तौर पर शामिल नहीं हो पाते। ऐसे में माता लक्ष्मी धरती पर अकेली नहीं आतीं।

वे अपने साथ विघ्नहर्ता भगवान गणेश को लेकर आती हैं।

अब सवाल उठता है कि गणेश जी ही क्यों? इसके पीछे एक बेहद खूबसूरत पौराणिक कथा है।

जब मां लक्ष्मी को हुआ अपने धन पर घमंड

शिव पुराण और पद्म पुराण में एक बड़ी ही रोचक कहानी मिलती है।

एक बार माता लक्ष्मी को इस बात का घमंड हो गया कि पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा दौलत और वैभव उन्हीं के पास है।

उन्हें लगने लगा कि वे ही सर्वगुण संपन्न हैं और पूरी दुनिया उनके धन के पीछे भागती है।

भगवान विष्णु बहुत अंतर्यामी हैं। वे अपनी पत्नी लक्ष्मी जी के मन का यह अहंकार तुरंत समझ गए।

लक्ष्मी जी के घमंड को तोड़ने के लिए विष्णु जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “हे देवी! भले ही आपके पास दुनिया भर का धन और वैभव है, लेकिन एक स्त्री तब तक पूरी नहीं मानी जाती, जब तक वह मां न बन जाए। संतान के बिना मातृत्व का सुख अधूरा है।”

यह बात माता लक्ष्मी के दिल पर लग गई, क्योंकि उनकी खुद की कोई संतान नहीं थी।

वे इस बात से बहुत दुखी हुईं और अपनी यह परेशानी लेकर माता पार्वती के पास कैलाश पर्वत पहुंच गईं।

माता पार्वती से मांगा एक बेटा

माता पार्वती के दो बेटे थे – कार्तिकेय और गणेश। लक्ष्मी जी ने पार्वती जी से विनती की कि वे अपने दोनों बेटों में से एक बेटा उन्हें गोद दे दें।

पहले तो पार्वती जी थोड़ा हिचकिचाईं। उन्हें पता था कि माता लक्ष्मी का स्वभाव बहुत ‘चंचल’ है। वे कभी एक जगह टिक कर नहीं रहतीं, आज यहां हैं तो कल वहां।

पार्वती जी को चिंता हुई कि अगर लक्ष्मी जी एक जगह नहीं रुकेंगी, तो उनके बेटे का ख्याल कौन रखेगा।

तब लक्ष्मी जी ने माता पार्वती को पक्का विश्वास दिलाया। उन्होंने कहा, “मैं गणेश को अपने प्राणों से भी ज्यादा प्यार करूंगी। मैं भले ही कहीं भी रहूं, लेकिन गणेश की देखभाल में कोई कमी नहीं आने दूंगी। मैं गणेश को अपना दत्तक पुत्र (गोद लिया हुआ बेटा) मानूंगी।”

मां लक्ष्मी का वह खास वरदान

लक्ष्मी जी का यह प्रेम देखकर पार्वती जी ने भगवान गणेश को उन्हें सौंप दिया। अपने बेटे के रूप में गणेश जी को पाकर माता लक्ष्मी इतनी खुश हुईं कि उन्होंने गणेश जी को एक बहुत बड़ा वरदान दे दिया।

लक्ष्मी जी ने कहा, “आज से गणेश मेरा दत्तक पुत्र है। मैं वरदान देती हूं कि दुनिया में जहां भी मेरी पूजा होगी, वहां मेरे साथ मेरे बेटे गणेश की पूजा सबसे पहले की जाएगी। जो इंसान मेरी पूजा तो करेगा लेकिन गणेश को नहीं पूजेगा, मैं उसके घर में कभी नहीं रुकूंगी। वहां मेरा वास बिल्कुल नहीं होगा।”

बस, माता लक्ष्मी के इसी वरदान के कारण आज तक दिवाली के दिन मां और बेटे (लक्ष्मी-गणेश) की पूजा एक साथ की जाती है।

धन और बुद्धि का सही तालमेल

पौराणिक कथा के अलावा इसके पीछे एक बहुत बड़ा व्यावहारिक और जीवन से जुड़ा कारण भी है।

माता लक्ष्मी धन, दौलत और समृद्धि की देवी हैं, जबकि भगवान गणेश बुद्धि, ज्ञान और विवेक (सही-गलत की समझ) के देवता हैं।

जरा सोचिए, अगर किसी इंसान के पास अचानक बहुत सारा पैसा आ जाए, लेकिन उसके पास उस पैसे को संभालने की बुद्धि न हो, तो क्या होगा?

वह उस पैसे को गलत कामों में, नशे में या जुए में उड़ा देगा।

कुबुद्धि (खराब दिमाग) वाला इंसान अपने ही धन से अपना और समाज का नुकसान कर बैठता है।

धन टिकता वहीं है, जहां उसे इस्तेमाल करने की सही अक्ल हो।

गणेश जी बुद्धि के दाता हैं। जब लक्ष्मी (धन) और गणेश (बुद्धि) एक साथ घर में आते हैं, तो इंसान को पैसा भी मिलता है और उस पैसे को सही जगह इस्तेमाल करने की सद्बुद्धि भी।

सही बुद्धि होने पर इंसान अपने धन का इस्तेमाल भलाई, व्यापार को बढ़ाने और परिवार की तरक्की में करता है।

इसलिए केवल पैसे के पीछे भागने से जीवन सफल नहीं होता, ज्ञान और बुद्धि भी उतनी ही जरूरी है।

साथ में देवी सरस्वती की पूजा क्यों?

कई लोग दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश के साथ विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा करते हैं। इसके पीछे भी यही वजह है।

सरस्वती जी ज्ञान की प्रतीक हैं। जीवन में सही निर्णय लेने के लिए ज्ञान बहुत जरूरी है।

जब धन (लक्ष्मी), बुद्धि (गणेश) और ज्ञान (सरस्वती) तीनों का तालमेल बनता है, तभी इंसान के जीवन में असली सुख, शांति और तरक्की आती है।

भगवान विष्णु के साथ पूजा का महत्व

दिवाली की रात विशेष रूप से लक्ष्मी-गणेश की पूजा होती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि विष्णु जी को भूल जाना चाहिए।

शास्त्रों के अनुसार, अगर आप माता लक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु का भी ध्यान करते हैं, तो यह बहुत शुभ होता है।

विष्णु जी ‘पुरुषार्थ’ (मेहनत और धर्म के अनुसार काम करने) के प्रतीक हैं। बिना मेहनत के धन नहीं आता।

इसलिए लक्ष्मी-विष्णु की संयुक्त पूजा जीवन में मेहनत, धन और सफलता लेकर आती है।

दिवाली पूजन की सही विधि और नियम

दिवाली की पूजा अगर सही तरीके और सच्चे मन से की जाए, तो इसका फल जरूर मिलता है।

आम बोलचाल की भाषा में इसके नियम बहुत सीधे हैं:

* सफाई और दिशा: सबसे पहले पूजा की जगह को अच्छे से साफ कर लें। घर के उत्तर या ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में एक साफ चौकी लगाएं।

* आसन: चौकी पर लाल या पीले रंग का नया कपड़ा बिछाएं।

* मूर्तियों की स्थापना: यह बहुत जरूरी नियम है कि गणेश जी को हमेशा दायीं (Right) तरफ और माता लक्ष्मी को गणेश जी के बायीं (Left) तरफ बैठाएं। यह मां और बेटे के बैठने का सही क्रम माना जाता है।

* कलश स्थापना: चौकी के पास एक कलश रखें। उसमें साफ पानी, थोड़ा सा दूर्वा (घास) और एक सिक्का डालें। कलश के ऊपर आम के पत्ते और एक नारियल रखें।

* पहले गणेश पूजा: किसी भी पूजा की तरह दिवाली पर भी सबसे पहले गणेश जी का ध्यान करें। उन्हें मोली (कलावा) बांधें, दूर्वा चढ़ाएं और उनके पसंदीदा मोदक या लड्डू का भोग लगाएं।

* लक्ष्मी पूजन: इसके बाद माता लक्ष्मी की पूजा शुरू करें। मां लक्ष्मी को कमल का फूल बहुत पसंद है, इसलिए उन्हें कमल जरूर चढ़ाएं। साथ ही खीर, बताशे और मिठाइयों का भोग लगाएं। सिंदूर और चावल (अक्षत) से उनका तिलक करें।

* दीपक और आरती: एक बड़ा दीया (घी का) जलाएं। सच्चे मन से लक्ष्मी-गणेश जी की आरती गाएं और मंत्रों का जाप करें।

* घर को रोशन करें: पूजा के बाद घर के हर कमरे, दरवाजे और कोने में दीये जलाएं। रोशनी से घर की सारी नकारात्मक ऊर्जा (Negative energy) और दरिद्रता दूर भाग जाती है।

इस परंपरा से हमें क्या सीख मिलती है?

दिवाली सिर्फ घर को सजाने और पटाखे फोड़ने का त्योहार नहीं है; यह हमारे जीवन को एक दिशा देने का भी समय है।

लक्ष्मी-गणेश की कहानी हमें सिखाती है कि परिवार में रिश्तों का सम्मान सबसे ऊपर होना चाहिए। मां और बच्चे का रिश्ता दुनिया का सबसे अनमोल रिश्ता है।

भगवान विष्णु द्वारा लक्ष्मी जी का अहंकार तोड़ना यह बताता है कि इंसान को कभी अपने पैसे, पद या खूबसूरती पर घमंड नहीं करना चाहिए। अहंकार इंसान को नीचे गिरा देता है।

भगवान गणेश के स्वरूप से मिलती है ये सीख  

गणेश जी का स्वरूप भी हमें बहुत कुछ सिखाता है। उनका बड़ा सिर यह बताता है कि हमारी सोच बड़ी होनी चाहिए और ज्ञान इकट्ठा करने की भूख होनी चाहिए।

उनके बड़े कान कहते हैं कि हमें दूसरों की अच्छी बातों को ध्यान से सुनना चाहिए।

उनकी छोटी आंखें बताती हैं कि हमारी नजर हमेशा तेज और बारीक (Focused) होनी चाहिए।

जब हम माता लक्ष्मी की चंचलता को गणेश जी के संयम और बुद्धि के साथ बांध देते हैं, तभी हमारे घर में स्थायी रूप से खुशहाली आती है।

व्यापारी लोग भी इसी दिन अपनी नई किताबों (बहीखाते) की पूजा करते हैं, क्योंकि गणेश जी शुभ-लाभ के पिता हैं और ऋद्धि-सिद्धि उनकी पत्नियां हैं।

इसलिए इस दिवाली जब आप माता लक्ष्मी और भगवान गणेश के सामने दीया जलाएं, तो सिर्फ धन की ही नहीं, बल्कि सद्बुद्धि, प्रेम और परिवार की शांति की भी कामना करें। यही सही मायनों में दिवाली मनाना है।

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