Madhya Pradesh drought 2026: मध्य प्रदेश में इस साल मानसून की विदाई के बाद भी मौसम का मिजाज बदला हुआ नजर आ रहा है।
एक तरफ जहां प्रदेश के ऊपरी हिस्से में बने चक्रवाती हवाओं के घेरे (साइक्लोनिक सर्कुलेशन) की वजह से अगले 4 दिनों तक कुछ हिस्सों में बारिश की संभावना है, वहीं दूसरी ओर मालवा-निमाड़ और नर्मदापुरम संभाग के 11 जिलों में कम बारिश होने के कारण अकाल व सूखे का खतरा मंडराने लगा है।
मौसम केंद्र भोपाल के अनुसार, पन्ना, सतना, रीवा, मैहर, मऊगंज, सीधी, सिंगरौली और शहडोल जैसे पूर्वी जिलों में गरज-चमक के साथ हल्की से मध्यम बौछारें गिर सकती हैं।
इसके विपरीत, इंदौर और राजधानी भोपाल में दिन में तेज धूप खिलेगी, जबकि रातों में ठंडक का अहसास बढ़ने लगा है।
अक्टूबर का ट्रेंड: दिन में धूप, रात में ठंडक
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि मध्य प्रदेश में अक्टूबर के महीने में हर साल ऐसा ही मिला-जुला मौसम देखने को मिलता है।
इस बार 3 अक्टूबर को मानसून पूरे प्रदेश से औपचारिक रूप से विदा हो चुका है।
मानसून जाने के बाद अब आसमान पूरी तरह साफ है, जिससे दिन के समय धूप तीखी हो रही है और अधिकतम तापमान 37 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच रहा है।
हालांकि, रात होते ही तापमान में तेजी से गिरावट आ रही है। हाल ही में इंदौर में रात का न्यूनतम तापमान 17.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो प्रदेश में सबसे कम रहा।
इसके अलावा बैतूल, छिंदवाड़ा, पचमढ़ी और अमरकंटक में भी रातें काफी ठंडी दर्ज की गईं।
मानसून का लेखा-जोखा: औसत से 4% कम हुई कुल बारिश
इस साल मध्य प्रदेश में दक्षिण-पश्चिम मानसून कुल 100 दिनों तक सक्रिय रहा। 24 जून को प्रवेश करने के बाद 3 अक्टूबर को इसकी पूरी तरह से विदाई हुई।
इस दौरान पूरे प्रदेश में औसतन 35.8 इंच (908.4 मिमी) बारिश दर्ज की गई, जो सामान्य कोटे (37.3 इंच) से लगभग 1.5 इंच यानी 4 प्रतिशत कम है।
अगर क्षेत्रीय वितरण देखें तो:
* पूर्वी मध्य प्रदेश: जबलपुर, रीवा, सागर और शहडोल संभागों में सामान्य से 4 प्रतिशत अधिक पानी गिरा।
* पश्चिमी मध्य प्रदेश: इंदौर, उज्जैन, भोपाल और नर्मदापुरम संभागों में सामान्य से 12 प्रतिशत कम बारिश दर्ज हुई।
प्रदेश के 55 में से 25 जिलों ने तो अपना बारिश का कोटा पूरा कर लिया है, लेकिन 30 जिले ऐसे हैं जहां बारिश सामान्य से काफी कम रही है।
11 जिलों पर सूखे का साया: आलीराजपुर में 52% कम बरसा पानी
कम बारिश का सबसे बुरा असर मालवा-निमाड़ और नर्मदापुरम संभाग के जिलों पर पड़ा है। कुल 11 जिलों में स्थिति काफी चिंताजनक है।
इनमें आलीराजपुर सबसे नीचे है, जहां सामान्य की तुलना में 52% कम बारिश दर्ज की गई है।
सूखे के मुहाने पर खड़े प्रमुख 9 जिलों में इंदौर, उज्जैन, बैतूल, हरदा, नर्मदापुरम, रतलाम, झाबुआ, धार और आलीराजपुर शामिल हैं।
इसके अलावा शाजापुर और पांढुर्णा में भी बारिश का आंकड़ा सामान्य से काफी पीछे छूट गया है।
बारिश में आई इस भारी कमी के कारण सोयाबीन, मूंग, मक्का जैसी खरीफ फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है।
किसान चिंतित हैं क्योंकि आने वाले रबी सीजन (गेहूं और चने की बुआई) में सिंचाई और पीने के पानी का संकट गहरा सकता है।
पांढुर्णा में किसानों का गुस्सा और मुख्यमंत्री का आश्वासन
फसलों के नुकसान और पानी की कमी को लेकर किसानों में भारी निराशा है। हाल ही में पांढुर्णा दौरे के दौरान आक्रोशित किसानों ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के काफ़िले को रोक लिया था।
किसानों के हाथों में सूखी और मुरझाई हुई फसलें थीं। उन्होंने जिले को तुरंत ‘सूखाग्रस्त’ घोषित करने और कृषि ऋण (कर्ज) माफ करने की मांग रखी।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री ने गाड़ी से उतरकर किसानों से सीधी बातचीत की और उनकी समस्याएं जल्द सुलझाने का भरोसा दिलाया।
सूखा कैसे घोषित होता है? क्या है सरकारी प्रक्रिया?
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, जब किसी जिले में सामान्य से 26 प्रतिशत या उससे कम बारिश होती है, तब उसे सूखाग्रस्त घोषित करने की प्रक्रिया शुरू होती है। हालांकि, केवल बारिश के आंकड़ों से फैसला नहीं होता।
सूखा घोषित करने के लिए नियम निम्नलिखित हैं:
* संकेतकों का आकलन: बारिश की कमी, बोवाई का क्षेत्रफल, फसल की मौजूदा स्थिति, मिट्टी की नमी, भूजल स्तर और बांधों/जलाशयों में जल भंडारण की समीक्षा की जाती है।
* गिरदावरी और ग्राउंड सर्वे: पटवारी और कृषि विभाग की टीमें खेतों में जाकर नुकसान का भौतिक सत्यापन (Field Survey) करती हैं।
* कलेक्टर की रिपोर्ट: सभी आंकड़ों को मिलाकर जिला प्रशासन राज्य शासन के राजस्व और आपदा प्रबंधन विभाग को रिपोर्ट सौंपता है।
* अधिसूचना: शासन स्तर पर जांच के बाद 31 अक्टूबर तक संबंधित तहसील या जिले को औपचारिक रूप से सूखाग्रस्त/अभावग्रस्त घोषित कर अधिसूचना जारी की जाती है।
10 साल में तीसरी बार ऐसे हालात, एक्सपर्ट्स की सलाह
मध्य प्रदेश में वर्ष 2015 के बाद अब 2026 में एक बार फिर बड़े पैमाने पर सूखे के बादल मंडरा रहे हैं।
इससे पहले 2017 और 2018 में भी सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई थी।
विशेषज्ञों की सलाह है कि सरकार को अभी से ‘माइक्रो लेवल’ पर काम शुरू कर देना चाहिए।
कम बारिश वाले जिलों में जल संरक्षण, जलाशयों से पानी के विवेकपूर्ण उपयोग और सिंचाई प्रबंधन की योजना तुरंत लागू की जानी चाहिए, ताकि भीषण गर्मी की शुरुआत में पेयजल और कृषि संकट से बचा जा सके।
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